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जीवन के शांत पथिक : महावीर स्वामी

डाॅ0 घनश्याम बादल

आज एक दूसरे के प्रति अविश्वास व नफ़रत की भावना के बीच महावीर व उनकी शिक्षाएं  और भी प्रासंगिक हो गई हैं । महावीर स्वामी का सबसे बड़ा मंत्र था-‘ जियो और जीने दो। उनका कहना था ” दूसरों की शांति भंग मत होने दो , तभी सच्ची शांति प्राप्त हो सकती है। आज महावीर स्वामी की जयंती पर उनके जीवनमंत्र से प्रेरणा लेने का अच्छा अवसर है  । आज के महामारी एवं हिंसा के घातक दौर में अहिंसा , दया, करुणा व मानव मात्र की भलाई के बारे में सोचने वाले महापुरुष महावीर स्वामी किसी प्रकाश पुंज से कम नहीं हैं।

चैत्र त्रयोदशी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में , सोमवार, 27 मार्च, 598 ईसा पूर्व के मांगलिक प्रभात में वैशाली के राजा सिद्धार्थ के घर  जन्मे राजकुमार वर्धमान से सभी सांसारिक सुखों को त्याग महावीर स्वामी बने  जैन धर्म के 24 वें  तीर्थंकर का जीवन त्याग और तपस्या का अनुकरणीय उदाहरण है । उनके उपदेशों के अनुकरण से ही सत्य के पक्ष में रहते हुए किसी के हक को मारे बिना , किसी को सताए बिना , अपनी मर्यादा में रहते हुए पवित्र मन से , लोभ लालच किए बिना , नियम से बंधकर सुख – दुख में समान आचरण करके ही दुर्लभ जीवन को सार्थक किया जा सकता है। त्याग , संयम , प्रेम , करुणा , शील और सदाचार की प्रतिमूर्ति थे भगवान महावीर स्वामी ने दुनिया को अहिंसा व सच के रास्ते पर लाने का अभूतपूर्व कार्य किया था अपने समय में ।

जैन धर्म के अनुयायियों का मानना है  है कि महावीर स्वामी का तीर्थंकर के रूप में जन्म उनके पिछले अनेक जन्मों की सतत् साधना का परिणाम था। कहा जाता है कि एक समय महावीर का जीव पुरूरवा भील था। संयोगवश उसने सागरसेन नाम के मुनिराज के दर्शन किये जो रास्ता भूल जाने के कारण उधर आ निकले थे। मुनिराज के धर्मोपदेश से उसने धर्म धारण किया। महावीर के जीवन की वास्तविक साधना का मार्ग यहीं से प्रारम्भ होता है। उनका जीवन एक शांत पथिक का जीवन था जो संसार में भटकते-भटकते थक गया था। अनंत बार भोगों को भोग लेने के बाद भी उसके जीव को तृप्ति नहीं हुई। अतः भोगों से मन हट गया, किसी चीज की चाह नहीं रही। परकीय संयोगों से बहुत कुछ छुटकारा मिल गया। अब जो कुछ भी रह गया उससे भी छुटकारा पाकर महावीर मुक्ति की राह देखने लगे।

30 वर्ष की आयु में ही त्रिशलानन्दन महावीर कर्मों का बन्धन काटने के लिये तपस्या और आत्मचिंतन में लीन रहने का विचार करने लगे। कुमार की विरक्ति का समाचार सुनकर माता-पिता को बहुत चिंता हुई। कुछ ही दिनों पहले कलिंग के राजा जितशत्रु ने अपनी सुपुत्री यशोदा के साथ कुमार वर्द्धमान का विवाह किया था। वर्द्धमान के इस निश्चय से माता-पिता को अपने स्वप्न बिखरते नजर आए। माता पिता व परिजनों ने राजकुमार वर्द्धमान को बहुत समझाया पर मुक्ति के राही को भोगों के लालच जरा भी विचलित नहीं कर सके । वें नहीं ही माने । अंत में माता-पिता को मोक्षमार्ग की स्वीकृति देनी पडी।

मंगशिर कृष्ण दशमी सोमवार, 29 दिसम्बर, 569 ईसा पूर्व को मुनिदीक्षा लेकर वर्द्धमान स्वामी ने शालवृक्ष के नीचे तपस्या आरम्भ कर दी। उनकी तप साधना बडी कठिन थी। लगभग 30 वर्ष तक उन्होंने सारे देश में भ्रमण कर लोकभाषा प्राकृत में धर्मोपदेश देते हुए जीवमात्र के कल्याण का मार्ग बतलाया। संसार -समुद्र से पार होने के लिये उन्होंने तीर्थ की रचना की, अतः वे तीर्थंकर कहलाए।

अपनी शिक्षाओं में महावीर स्वामी ने कहा – ‘‘प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकता है। कर्मों के कारण आत्मा का असली स्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। कर्मों को नाश कर शुद्ध, बुद्ध, निरज्जन और सुखरूप स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।’’ जीवन के सार तत्त्वों का प्रचार करते हुए भगवान महावीर अंतिम समय मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे। वहाँ के उपवन में कार्तिक कृष्ण अमावस्या मंगलवार, 15 अक्टूबर, 527 ई0 पू0. को 72 वर्ष की आयु में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया ।

आज के इस आपा – धापी व मार काट के युग में महावीर स्वामी की शिक्षाओं की महती जरुरत है । आज जब काम , क्रोध , मद मोह , लोभ व प्रतिशोध सर उठााए हैं व जप तप , त्याग , परपीड़ा पर रोने व दुःखी होने वाले लोग न के बराबर रह गए हैं तब तो महावीर और भी प्रासांगिक हो जाते हैं ।

उनके उपदेशों का तो सार ही जीव मात्र के प्रति दयाभाव रखना रहा है । अस्तेय के रूप वें लालच,जमाखोरी व चोरी की प्रवृत्ति को मानव मात्र से दूर करने व रखने का मंत्र दे देते हैं , ब्रह्मचर्य का पालन करने की उनकी सीख पर यदि मानव थोडा भी चल पाए तो समाज से बलात्कार जैसी समस्याएं जड़ से ही समाप्त हो जाएं । सार्वजनिक जीवन में रहने वालों के लिए तो महावीर एक प्रकाशपुंज हैं जो उन्हे असंपृक्त रहकर सबके भले में लगे रहने में राह दिखा सकते हैं ।

महावीर स्वामी ने जैन धर्म में जो बातें कहीं वें केवल जैन धर्म के अनुयाईयों पर ही नहीं वरन् सारे मानव समाज पर असर करती हैं ।आतंकवादव हिंसा  के दौर में अहिंसा का महत्व किसी से छुपा नहीं है । लालच व भ्रष्टाचार  आचरण के गर्त में डूबते मानव के मानवीय गुण लौटाने में अस्तेय व अचौर्य क्या नहीं का सकते उसकी मुक्ति व उत्थान के लिए ?

ब्रह्मचर्य समाज व देश तथा व्यक्ति को ताकत ही नहीं देता वरन् उसका उद्धार करता है । उसे गलत यौनाचार से बचाता है , उसका पारिवारिक जीवन शुद्ध व सात्विक करता है । अपरिग्रह उसे दया का सागर बना कर गरीबों ,दीनों , दुःखियों व वंचित लोगों की सहायता करने को प्रेरित करता है ।स्वामी महावीर की शिक्षाएं दुनिया को एक दिव्य प्रकाश व प्रेरणा देती हैं और आने वाले समय में भी देती रहेंगी ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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