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माननीयों के खिलाफ जांचों में ढिलाई पर सुप्रीम फटकार

– बाल मुकुन्द ओझा

राजनीति के अपराधीकरण पर गाहे बगाहे मीडिया में एक बार सुर्खिया बनती है और फिर यह प्रकरण ठंडे बस्ते में समा जाता है। पिछले दो दशकों के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो अपराधी सियासत के इस मामले में हम खाली हाथ ही मिलेंगे। इस बारे में अनेक बार सुप्रीम कोर्ट अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर माननीयों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को निपटने में ढिलाई पर सरकारी एजेंसियों को फटकार लगायी है। सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को तेजी से निपटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई।

चीफ जस्टिस एनवी रमणा ने लंबित मामलों को लेकर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने अधिकतर मामलों में रोक लगा रखी है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी क्यों नहीं हाई कोर्ट से रोक हटाने की मांग करती है या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही हैं। चीफ जस्टिस ने नाराजगी जताते हुए आगे कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों में 10 से 15 साल के लिए आरोपपत्र दाखिल ना करने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि सिर्फ प्रॉपर्टी अटैच करने से कुछ नहीं होगा, जांच लंबित रखने का कोई कारण नहीं है।

इससे पूर्व उच्चतम न्यायालय को सूचित किया गया कि 122 सांसद और विधायक धनशोधन के मामलों में आरोपी हैं और उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच की जा रही है। जबकि 121 अन्य के खिलाफ विभिन्न अपराधों में सीबीआई ने मामला दर्ज किया है। सांसदों के खिलाफ धनशोधन रोकथाम कानून के तहत दर्ज मामलों में से 28 मामलों में जांच लंबित है और 10 मामले निचली अदालतों में आरोप तय किए जाने के चरण में हैं। अदालत मित्र के रूप में नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया द्वारा दायर रिपोर्ट में कहा गया कि विधानसभा और विधान परिषदों के सदस्यों के खिलाफ ईडी द्वारा दर्ज किए गए 48 मामलों में जांच लंबित है। और 15 मामले आरोप तय किए जाने के चरण में हैं।

एक आधिकारिक जानकारी के अनुसार वर्तमान में 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। भाजपा के 303 में से 116,  कांग्रेस के 52 में से 29, लोजपा के सभी 5 निर्वाचित सदस्यों, बसपा के 10 में से 5, जदयू के 16 में से 13, तृणमूल कांग्रेस के 22 में से नौ और माकपा के तीन में से दो सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। 204 लंबित मामलों वाले केरल से निर्वाचित कांग्रेसी सांसद डीन कुरियाकोस दागी सूची में सबसे आगे है। आपराधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल और बिहार से चुन कर आए। केरल से निर्वाचित 90 फीसदी, बिहार से 82 फीसदी, पश्चिम बंगाल से 55 फीसदी, उत्तर प्रदेश से 56 और महाराष्ट्र से 58 प्रतिशत सांसदों पर केस लंबित है। वहीं सबसे कम नौ प्रतिशत सांसद छत्तीसगढ़ के और 15 प्रतिशत गुजरात के हैं। हलफनामों के हिसाब से 159 यानि 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है।

देश की सियासत में नेताओं और अपराध का चोली-दामन का साथ रहा है। आजादी के बाद से ही देश में जाति, धन और बाहुबल का दबदबा देखा गया। जाति और दागी सियासत धीरे धीरे बढ़ती गई और आजादी के 74 सालों के बाद भी हम इसका तौड़ नहीं ढूंढ पाए फलस्वरूप सियासत में इनका दबदबा आज भी कायम है। देश में ऐसी कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं, जो पूरी तरह से दागी मुक्त हो।  यानी उनके किसी भी एक नेता पर अपराध के मामले दर्ज नहीं हों। पिछले 74 सालों में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और जिस तरह देश में आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।

लेखक राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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