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गतल साबित हुआ टू नेशन थ्योरी अपनाने से शांति का दावा

– सारांश कनौजिया

भारत और पाकिस्तान का जब विभाजन हुआ, तो उसका आधार धर्म था। मुस्लिमों के लिये पाकिस्तान और हिन्दुओं के लिये हिन्दुस्थान अर्थात भारत। हिन्दुत्व को मानने वाले किसी एक विशेष पूजा पद्धति को नहीं मानते, इसलिये ऐसे सभी लोगों ने इस विभाजन का विरोध किया। पहले गांधी जी ने भी विभाजन को स्वीकार नहीं किया था, लेकिन बाद में वो तैयार हो गये। उन्होंने कहा कि वो शांति चाहते हैं, लेकिन विभाजन के कारण आज भी कोई शांति से नहीं है। न भारत, न पाकिस्तान और न ही बाद में बना बांग्लादेश।

टू नेशन अर्थात दो राष्ट्र, इस सिद्धांत की नींव कब और कैसे पड़ी, इसको समझने के लिए 1947 से पहले के भारतीय इतिहास में जाना होगा। अंग्रेज सरकार क्रांतिकारियों के हमलों से बहुत परेशान थी। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने कांग्रेस बनाकर भारतीयों को भाषणों के माध्यम से अपना गुस्सा निकालने के लिये एक प्लेटफार्म तो दिया, लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस का एक गुट गरम दल के नाम से बन गया। गरम दल वाले क्रांतिकारियों के साथ मिलकर संघर्ष करने के पक्षधर थे। इसलिए अंग्रेजों को कांग्रेस पर से अपना नियंत्रण खोने का डर सताने लगा था। यही कारण है कि इन अंग्रेजों ने भारतीयों को हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर विभाजित करने का एक प्रयास 1905 में बंग-भंग के रुप में किया। एक वर्ष तक चले संघर्ष के बाद अंग्रेजों को अपना आदेश वापस लेना पड़ा, लेकिन वो आंशिक रुप से अपने उद्देश्य में सफल हो गये।

अंग्रेज अब इस चिंगारी को हवा कैसे दी जाये, इस पर विचार कर रहे थे। कांग्रेस में अंग्रेजों के कुछ प्रिय नेताओं के माध्यम से 1915 में गांधी जी को भारत बुलवाया गया। गांधी जी राजनीति के अच्छे जानकार थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन को भारत में असहयोग आंदोलन के नाम से चलाया। जिसके कारण वो तत्कालीन मुस्लिम नेताओं के प्रिय बन गये। 1921 से लेकर अपनी मृत्यु तक गांधी जी ने दंगों में मुस्लिमों के द्वारा हिन्दुओं की हत्या, लूटपाट या हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी किसी भी घटना में किसी मुस्लिम को सजा दिलाने का प्रयास नहीं किया। उलटे स्वामी श्रद्धानंद की हत्या करने वाले मुस्लिम व्यक्ति का खुलेआम बचाव किया और इस हत्या पर शोक व्यक्त करने से ही इंकार कर दिया। इन सबसे कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं को बहुत बल मिला।

1920 में मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और उन्होंने दो राष्ट्र का सिद्धांत मजबूती से रखना शुरु कर दिया। 1947 तक गांधी जी इस पर असहमति व्यक्त करते रहे। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का मन बना लिया, तो जिन्ना सहित गांधी जी के कई प्रिय मुस्लिम नेताओं ने हिन्दुओं का नरसंघार बड़े पैमाने पर करना शुरु कर दिया। पूरे देश में हिन्दुओं के साथ कत्लेआम और बलात्कार की घटनाएं आम होने लगी। तब पं. जवाहरलाल नेहरु सहित कई कांग्रेसी नेताओं ने गांधी जी से कहा कि आप भी दो राष्ट्र के सिद्धांत को मंजूरी दे दीजिये और इन लोगों को अपना मनचाहा भूभाग अलग करने पर सहमत हो जायें। गांधी जी ने भी इस पर अपनी सहमति दी, उनका मानना था कि हिन्दू और मुस्लिम एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। यदि विभाजन स्वीकार नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में हिन्दू और मुसलमानों की हत्याएं होगी। इसलिये यदि हिन्दू और मुस्लिम दोनों को शांति से रहना है, तो यह विभाजन अनिवार्य है।

गांधी जी का शांति का दावा विभाजन स्वीकार होने के तुरंत बाद ही गलत सिद्ध हुआ। पाकिस्तान विभाजन को स्वीकार करते ही जो क्षेत्र भारत से अलग हुआ, वहां हिन्दुओं पर अत्याचार बहुत तेज हो गये। क्योंकि गांधी जी ने जिस विभाजन को स्वीकार किया था, उसके अंतर्गत जिन्ना पाकिस्तान का वायसराय बना, लेकिन भारत का वायसराय एक अंग्रेज ही बना रहा। इस कारण उसने हिन्दुओं को पाकिस्तान से सुरक्षित निकालने के लिये कोई प्रयास नहीं किया। यद्यपि यह भी सत्य है कि हिन्दुओं के इस नरसंघार की प्रतिक्रिया भारत के कुछ हिस्सों से भी हुई थी।

अंग्रेज 1905 में जो नहीं कर सके, गांधी जी की सहमति मिलते ही वह 1947 में हो गया। बंगाल का विभाजन कर उसके एक भाग को पूर्वी पाकिस्तान बना दिया गया। गांधी जी का मानना था कि इस विभाजन के बाद पाकिस्तान में मुस्लिम और हिन्दुस्थान में हिन्दू शांति से रह सकेगा। गांधी जी सहित भारत में जो मुस्लिम नेता या उनके समर्थक अन्य कांग्रेसी नेता रह गये, उन्होंने भारत को कभी हिन्दुस्थान बनने नहीं दिया। जहां तक पाकिस्तान में मुस्लिमों का सवाल है, तो वो भी कभी शांति से नहीं रह सके। शिया-सुन्नी विवाद, अहमदी मुसलमानों को इस्लाम का हिस्सा न मानना, भारतीय भूभाग से पाकिस्तान आये मुस्लिामों को मुजाहिर मानना हो या फिर अपने ही पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से का  संसाधनों के दोहन के लिये शोषण करना।

ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे, जिनसे यह साफ हो जाता है कि पाकिस्तान में मुस्लिम और हिन्दुस्थान में हिन्दू आज भी अपने कई अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहा है। पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश के रुप में अलग देश बनना भी इसी अशांति का एक हिस्सा है। जो मुस्लिम भारत में रह गये, उनमें से कई अक्सर ही भारत के टुकड़े करने के नारे लगाते रहते हैं। हाल ही में एक नेता ने भारत में 4 पाकिस्तान बनाने की बात कही थी। टू नेशन थ्योरी को स्वीकार करते हुए जिस शांति की बात गांधी जी ने कही थी, वह आज पाकिस्तान, हिन्दुस्थान और आज के बांग्लादेश के हिन्दुओं को तो नसीब नहीं हुई। पिछले कुछ सालों में जरुर हिन्दुस्थान और बांग्लादेश के हिन्दुओं की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन ऐसी स्थिति लाने में भी लगभग 7 दशक लग गये। इसलिये टू नेशन थ्योरी को असफल और गलत ही कहा जायेगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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