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करगिल विजय दिवस— 26 जुलाई

जम्मू कश्मीर भारत के संविधान के प्रथम अनुच्छेद में १५ वें स्थान पर अंकित है . सांस्कृतिक रूप से जम्मू कश्मीर सदियों से भारत का अंग रहा है. स्वतंत्रता से पूर्व भारत लम्बे समय तक अंग्रेजो का गुलाम रहा . १५ अगस्त १९४७ को हम स्वतंत्र हुए अंग्रेजो ने आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों स्तर पर  भारत का शोषण  किया. इस दोहन और शोषण का दौर लगभग डेढ़ सौ साल चला . अंततः  वर्ष १९४७ में अँगरेज़  भारत से गए पर जाते -२ उन्होंने ब्रिटिश  भारत का विभाजन किया. आस्तित्व में आया नया डोमिनियन  पाकिस्तान. विभाजन ब्रिटिश भारत का हुआ था लेकिन देसी रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे  भारत या पाकिस्तान में से किसी भी एक देश में जा सकते थे. देसी रियासतें किस डोमिनियन का हिस्सा बनेंगीं  यह अधिकार केवल और केवल उस रियासत के राजा या नवाब को दिया गया था . अपने इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने २६ अक्तूबर १९४७ को जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में कर दिया था, जिसे माउन्टबेटन ने 27 अक्तूबर १९४७ को स्वीकार कर लिया था.

पाकिस्तान के आस्तित्व में आने के बाद इस उम्मीद में था कि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में आ जाएगा . लेकिन पाकिस्तान का यह सपना केवल सपना ही रह गया . जब पाकिस्तान को लगा कि महाराजा हरी सिंह जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में करेंगे तो उसने २२ अक्तूबर १९४७ को जम्मू कश्मीर पर पहला आक्रमण किया. जम्मू कश्मीर के भारत में अधिमिलन के पश्चात जब भारतीय सेना जम्मू कश्मीर पहुँची  तब तक राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया . भारतीय सेना ने राज्य के बहुत से हिस्सों से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा. तब ब्रिटिश षड्यंत्र के चलते ३१ दिसंबर १९४८ को भारत के ततकालीन प्रधानमंत्री पाकिस्तान के हमले के विरोध में युनाइटेड नेशंस में ले गए . नेहरु वहाँ  पर अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के भ्रमजाल में फँस  गए.  परिणामस्वरूप आज जम्मू कश्मीर का एक बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया जिसे हम पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के नाम से जानते है . मीरपुर , भिम्बर , कोटली , बाघ , मुज्जफराबाद , गिलगित और बल्तिस्तान आदि क्षेत्र पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में आते है .

 

पाकिस्तानी सेना की ग़लतफ़हमियाँ  और उसके परिणाम

जावेद अब्बास पाकिस्तानी सेना का एक आफिसर था. जब यह आफिसर कमांड एंड स्टाफ कॉलेज  में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर था तो उसे रिसर्च का एक काम सौंपा गया था जिसे उसने तीन साल में पूरा किया था . रिसर्च प्रोजेक्ट का नाम था “ इंडिया – ए  स्टडी इन प्रोफाईल “. इस स्टडी के अनुसार पाकिस्तानी सेना का मानना है कि भारत की अपनी समस्याए है और उन समस्याओं का लाभ उठा कर भारत की विशाल और शक्तिशाली सेना को कंट्रोल में किया जा सकता है . यह स्टडी १९९० में प्रकाशित हुई थी  लेकिन पाकिस्तानी सेना की मनःस्थिति  पहले से ही कुछ अलग नहीं थी . १९४७ के बाद से पाकिस्तान और विशेषकर पाकिस्तानी सेना जम्मू कश्मीर को अपना अधूरा अजेंडा मानती रही है और भारत के जम्मू कश्मीर में कोई न कोई समस्या खड़ी  करने की कोशिश करती रहती है. अयूब खान पाकिस्तानी सेना के पहले जनरल थे जिन्होंने इस्कंदर मिर्ज़ा को सत्ता से बाहर कर पाकिस्तान पर कब्ज़ा किया था .

अयूब खान भारत के लोगो को बीमारी  ग्रस्त मानता था . उसकी सोच थी कि भारत इतना कमजोर है, भारतीयों का मनोबल इतना कमजोर है कि वो मजबूत प्रहार नहीं सह सकते और बिखर जाते है. इसी ग़लतफ़हमी का शिकार होकर अयूब खान ने भारत पर आक्रमण किया था. तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने अयूब खान को पूरा विश्वास दिलाया था कि भारत अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर आक्रमण नहीं करेगा . अयूब खान और उसकी पाकिस्तानी सेना इतनी गफलत में थी कि ३ सितम्बर १९६५ में जब भारतीय सेना लाहौर के बाहरी इलाको तक पहुँच चुकी थी और पाकिस्तानी सेना के जवान सुबह के समय रूटीन एक्सरसाइज कर रहे थे . भारत की जवाबी कार्यवाही से अयूब खान इतने घबरा गए थे कि अपने कैबिनेट की बैठक में अयूब खान ने कहा था- “ ५ मिलियन कश्मिरियो के लिए पाकिस्तान अपने १०० मिलियन लोगो को कभी खतरे में नहीं डालेगा. “ इस हार के बाद अयूब खान कभी अपनी इमेज नहीं सुधार पाया .

जिस गलत फ़हमी का शिकार अयूब खान था उसी ग़लतफ़हमी का शिकार याहया खान भी था. १९७१ में याहया खान को किसी ज्योतिषी ने कहा था कि  वो आने वाले १० साल तक पाकिस्तान के हेड ऑफ़ स्टेट बने रहेंगे . यह बात सुनकर याहया खान बहुत खुश था लेकिन इस बात से अनजान था कि दस वर्षो तो छोड़िये वो आने वाले दस दिनों में अपने पद  हटा दिया जाएगा. स्वप्रशंसा में याहया खान और उसकी टीम इस कदर तक डूबी हुई थी कि जब उस से पूछा गया कि वो भारत का मुकाबला कैसे करेंगे तो उनका जवाब था- “ मुस्लिम लड़ाकों  की ऐतिहासिक उच्चता के बल पर “ यह जवाब उस तत्वहीन राष्ट्रपति का था  जिसे जब पता चला कि भारतीय फौजों ने ईस्ट पाकिस्तान पर हमला बोल या है तो उसका जवाब था- “ मैं ईस्ट पाकिस्तान के लिए क्या कर सकता हूँ ? मैं केवल प्रार्थना कर सकता हूँ. “

सत्ता के नशे में चूर इस पाकिस्तानी सेना का स्तर देखिये कि पाकिस्तान के नेवल चीफ को पाकिस्तानी एयर स्ट्राइक के बारे में पाकिस्तानी रेडियो से पता चला जब वह सुबह अपने काम के लिए अपनी कार से निकले थे . लेफ्टिनेंट जनरल ऐ के नियाजी को को एयर स्ट्राइक्स के बारे में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस सुनते हुए पता चला था . जैसे अयूब खान ने कश्मीरियों को कोसा था ठीक वैसे याहया खान ने कहा था कि- “ वह बंगालियों के लिए वेस्ट पाकिस्तान को खतरे में नहीं डाल सकता “.

 

कारगिल युद्धपाकिस्तानि सेना के दिमाग  की उपज

१९६५ और १९७१ में पाकिस्तानी घमंड चूर -२ हुआ लेकिन पाकिस्तानी सेना की कुपित मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया था .  १९९९  में कारगिल से पहले भी दो बार भारत पर कारगिल से हमला करने का प्रपोजल बनाया गया था और पाकिस्तान में राजनीतिक आकाओ को पूरा प्लान भी प्रस्तुत किया गया था लेकिन दोनों बार यह प्लान रिजेक्ट हो गया था . एक बार ज़िया  उल हक के समय. और दूसरी बार बेनज़ीर  भुट्टो के समय . भुट्टो के सामने जब यह प्लान रखा गया तब पाकिस्तानी सेना का  डीजीएमो था परवेज़ मुशर्रफ , यह वो ही व्यक्ति था जो कारगिल के समय पाकिस्तानी सेना का प्रमुख था.

कारगिल युद्ध के जिम्मेवार चार लोग थे

दो बार कारगिल का प्लान रोका जा चुका  था लेकिन 1999 में जब कारगिल पर दोबारा हमले का प्लान बनाया गया तो परवेज़ मुशर्रफ़  पाकिस्तानी सेना का प्रमुख था . मुशर्रफ़ के आलावा  लेफ्टिनेंट जनरल  जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान ,  लेफ्टिनेंट जनरल महमूद खान और मेजर जनरल जावेद हसन. इन चारो के अलावा लेफ्टिनेंट कर्नल जावेद अब्बास भी कारगिल युद्ध के लिए जिम्मेदार है जिसकी स्टडी इन्डिया – अ स्टडी इन प्रोफाइल से परवेज़ मुशर्रफ़  बहुत प्रभावित था, उसे लगता था कि वो भारत पर हमला करेगा और भारत बिखर जाएगा. पाकिस्तानी सेना इस वहम में भी थी कि वो भी अब भारत की तरह परमाणु शक्ति है और इस दबाव में भारत जवाबी  हमला नहीं करेगा . लेकिन १९६५ और १९७१ की तरह पाकिस्तानी आंकलन १९९९ में भी पूरी तरह से गलत साबित हुआ .

 

पाकिस्तानी हमले का उद्देश्य

कारगिल पर पाकिस्तानी  हमले के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे

नेशनल हाईवे एक की सप्लाई बंद करवाना . यह हाईवे श्रीनगर को लेह से जोड़ता है . पाकिस्तानियों को लगता था कि सप्लाई बंद होने से  भारतीय सेना बहुत जल्दी किसी भी तरह का जवाबी हमला नहीं कर पायेगी . पाकिस्तानियों को लगता था कि भारत में इतनी क्षमता नहीं है कि वो पाकिस्तानी सेना को उनकी जगह से हटा पाए. इसके  अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि कारगिल हमले का वृहद् पक्ष, एक दूसर पहलू भी था था जोकि राज्य के सबसे छोटे हिस्से कश्मीर से जुड़ा हुआ था जिसका खुलासा आज तक  नहीं हो पाया क्योंकि कारगिल हमले के बाद भारतीय सेना इतना मुहतोड़ जवाब देगी इसकी कल्पना पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को नहीं थी . इस वृहद् पक्ष के अनुसार अफगानिस्तान में तालिबान प्रमुख मुल्ला महसूद रब्बानी से कश्मीर में जेहाद लड़ने के लिए पाकिस्तान ने २० से ३० हजार लड़ाको की माँग  की थी . रब्बानी ने  ५० हजार लड़ाकों  का वायदा कर दिया था . पाकिस्तानी आर्मी के अधिकारी इस प्रस्ताव से बेहद खुश थे .

कारगिल को लेकर परवेज़ मुशर्रफ़ बेचैन था . १९६५ के युद्ध से पहले कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी सेना थी, सुरक्षा और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जगह पर थी . लेकिन १९६५ और १९७१ के युद्ध में भारत ने यह महत्वपूर्ण  चोटियाँ  अपने कब्ज़े में ले ली थी . मुस्शारफ इन चोटियों को वापिस लेना चाहता था. कश्मीर को ऐसा अंतर्राष्ट्रीय मसला बनाना जिसे लेकर परमाणु युद्ध की आशंका है और जिसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है. नियंत्रण रेखा की पवित्रता को भंगकर कारगिल के अनियंत्रित क्षेत्रों को कब्जे में लेना

भारत की जवाबी कार्यवाही

पाकिस्तान को भारत की जवाबी कार्यवाही का अंदाजा बिलकुल भी नहीं था . परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी हार स्वीकार करते हुए  यह कहा था कि “  भारत ने न केवल सैन्य बल्कि अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी से भी  पाकिस्तान को करारा जवाब दिया . कारगिल हमले के बाद थोड़े समय के लिए भारतीय राजनितिक नेतृतव और सेना दोनों थोड़ा  असमंजस में रहे लेकिन फिर डट कर पाकिस्तानी हमले का जवाब दिया . एक-२ कर कारगिल की चोटियों को खाली कराया जाने लगा . 13 जून, 1999 को तोलोलिंग चोटी को भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान  के कब्जे से छुड़ा लिया, जिससे आगे के युद्ध में उन्हें बेहद मदद मिली। जल्दी ही 20 जून, 1999 को प्वांइट 5140 भी उनके कब्जे में आने से तोलोलिंग पर उनका विजय अभियान पूरा हो गया। चार जुलाई को एक और शानदार विजय दर्ज की गई, जब टाइगर हिल को घुसपैठियों से मुक्त कर दिया गया। पाकिस्तान घुसपैठियों को खदेड़ना जारी रखते हुए भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे। बटालिक की प्रमुख चोटियों से पाकिस्तानी सेना को भगा कर उन्हें दोबारा भारत के कब्जे में ले लिया गया।

भारत की १४ रेजिमेंट्स ने शक्तिशाली बोफोर्स से कारगिल में घुसपैठ कर बैठे पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाना शुरू कर दिया था . भारत ने एलओ सी के भीतर वायुसेना के विमानों से भी हमले शुरू कर दिए . पाकिस्तान  अपनी वायुसेना का प्रयोग नहीं  कर पाया क्योंकि पाकिस्तान ने  दुनिया के सामने झूठ  बोला था कि कारगिल में कश्मीरी मुजाहिद्दीन अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं . यदि पाकिस्तान अपनी वायुसेना का उपयोग करता तो पूरी दुनिया के सामने उसका झूठ पकड़ा जाता . पाकिस्तान ने  बहुत बड़ी संख्या में अपने सैनिक खोये . पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री पूरी तरह से खतम  हो गयी थी . कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान के विदेश  सचिव रहे शमशाद अहमद खान ने कारगिल युद्ध के बारे में कहा कि दुनिया के किसी भी विदेश विभाग के लिए ऐसा  समय सबसे ख़राब होता है  हमने पूरी क्षमता से अपना काम किया किन्तु पूरी दुनिया ने हमें इस युद्ध का दोषी घोषित कर दिया था. पूरी दुनिया का दबाव हम पर था उन्होंने हमें युद्ध के मैदान से पीछे हटने के लिए कहा और हमारे राजनैतिक नेतृतव ने पीछे हटने का सही फैसला लिया “

पाकिस्तानी सेना में लेफ्टिनेंट जनरल ( सेवानिवृत) अली कुली खान ने कारगिल युद्ध में हुई हार को पाकिस्तानी इतिहास की सबसे बुरी हार घोषित कर दिया था जिसमे अनगिनत मासूम लोग मारे गए थे “. कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना की भी कई सच उजागर हुए जिसमे एक बड़ा खुलासा यह हुआ कि बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सेना के अधिकारी नशे की लत में डूबे हुए हैं .

 

कारगिल युद्धहर मोर्चे पर पाकिस्तान की किरकिरी

कारगिल युद्ध ने पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में पूरी तरह से बेनकाब कर दिया था . तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख दोनों एक दूसरे  पर आरोप लगाते रहे. नवाज़ शरीफ का स्टैंड है कि उन्हें कारगिल हमले के बारे में कुछ नहीं पता था , दूसरी तरफ मुशर्रफ़ का कहना है की नवाज़ शरीफ को सब पता था . अब नवाज़ शरीफ को पता था या नहीं दोनों ही सूरत में पाकिस्तान की किरकिरी होती है . यदि पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ को इस हमले का नहीं पता था तो यह बात और पुख्ता हो जाती है कि “पाकिस्तान के पास सेना नहीं है बल्कि सेना के पास एक पाकिस्तान है”. तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री का भी कहना है कि देश का विदेश मंत्री होने के बाद भी उन्हें 17 मई की सुबह कारगिल हमले के विषय में जानकारी प्राप्त हुई और उनसे कभी भी इस स्थिति  के  डिप्लोमेटिक स्तर पर क्या परिणाम होंगे इसके बारे में कभी भी नहीं पूछा  गया .

पाकिस्तानी सेना में इस कदर अफरा तफरी थी कि पाकिस्तान के तत्कालीन एडमिरल फैसुद्दीन बुखारी ने मुशर्रफ़  से सीधे -२ पूछ लिया था कि मुझे इस आपरेशन की कोई जानकारी नहीं है परन्तु मैं पूछता हूँ कि इतने बड़े मोबिलाइजेशन  का क्या उद्देश्य है ? हम एक उजाड़ सी जगह के लिए युद्ध करना चाहते है जिसे हमें वैसे भी सर्दियों के समय खाली करना पड़ेगा . मुशर्रफ़ के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था . पूरी दुनिया के साथ -२ पाकिस्तान के साथी चीन ने भी पाकिस्तान को कारगिल की चोटियों से अपनी सेना वापिस बुलाने के लिए कहा  था . शुरुआत में पाकिस्तान लगातार कह रहा था कारगिल के पहाड़ो में मुजाहिदीन लड़ रहे है लेकिन वैश्विक दबाव में जब पाकिस्तान को अपने सैनिक वापस बुलाने पड़े तो वह पूरे विश्व के सामने बेनकाब हुआ कि पाकिस्तान  मुजाहिदीनो को कंट्रोल कर सकता है. इस से पूरे विश्व में एक बात स्पष्ट होने लगी कि पाकिस्तान कश्मीर में मुजाहिदीनो के नाम पर आतंक फैला रहा है .

परवेज़ मुशर्रफ़  कारगिल को अपनी सैनिक विजय मानता है किन्तु सत्य यह है कि पाकिस्तान ने अपने सैनिको को कारगिल की ऊँचाइयों  पर मरने के लिए छोड़ दिया था . कई जवानो की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट्स से पता चला उनके पेट में घास थी यानी कि जवानों के पास खाने को भी कुछ नहीं था . परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी किताब में लिखा कि मिलिट्री ने जो अर्जित किया , डिप्लोमेसी में हमने वो गँवा दिया . लेकिन दूसरी तरफ नवाज ने एक इंटरव्यू में बोला कि जब तक मैं अमेरिका के पास मदद मांगने गया और अमेरिका मदद करने को तैयार हुआ, तब तक भारतीय फौजें  कारगिल से  लगभग सब जगह से पाकिस्तानियों को निकाल चुकी थी और तेजी से आगे बढ़ रही थी ऐसे मे मैने पाकिस्तानी सेना के सम्मान को बचाया.

मुशर्रफ़  का कहना है कि उसने नवाज़ से नहीं कहा था कि  वो अमेरिका से बातचीत करे . लेकिन दूसरी ओर नवाज़ ने कहा कि जब वह अमेरिका जा रहे थे तो मुशर्रफ़ उनको एअरपोर्ट छोड़ने आया और उसने अमेरिका से बात करने को कहा ताकि पाकिस्तानी सेना के जवान कारगिल की चोटियों से सुरक्षित निकल सके, जहाँ अब भारतीय फौजे आगे बढ़ रही थी. पाकिस्तान जब से आस्तित्व में आया तब से किसी भी तरह की जवाबदेही वहाँ  तय नहीं की जाती है . जिस आर्मी चीफ ने इतना बड़ी ग़लती की, वह पाकिस्तान का राष्ट्रपति बना एक और सेना अधिकारी जिसके नेतृत्व  में यह लड़ाई लड़ी गयी उसे प्रमोशन मिला..

 

कुल मिलकर कहा जा सकता है कि पाकिस्तानफैनेटिक  फोर “ ( चार सेना के अधिकारी जिन्होंने कारगिल प्लान बनाया था ) की फैंटसी का शिकार रहा  और इस तरह एक असफल देश का शातिर प्रयास भी अफसल रहा .

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