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15 अगस्त 1947 से पहले का भारत – प्रथम संस्करण

15 अगस्त 1947 से पहले का भारत – प्रथम संस्करण  

 

– सारांश कनौजिया

 जब हम भारत की स्वतंत्रता के इतिहास की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान अंग्रेजों की गुलामी के काल पर जा कर रूक जाता है। किन्तु भारत इससे पहले भी गुलाम रहा है। विभिन्न इस्लामिक धर्मांध राजाओं ने दूसरे देशों से आकर हम पर हमला किया और हमें गुलाम बनाये रखने का प्रयास किया, हमें उस कालखंड की भी थोड़ी सी चिंता कर लेनी चाहिए। क्योंकि अंग्रेज हम पर इतने वर्षों तक क्यों शासन कर पाए इसका मूल कारण उसी काल में है। इसी उद्देश्य से मैं आपके समक्ष 15 अगस्त 1947 से पहले के भारत के कुछ अंश लेखों के रूप में अपने शब्दों में लेकर आया हूं।

 

गणेश शंकर विद्यार्थी की साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग में हुई थी हत्या

आज हम गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्यतिथि मना रहे हैं। हम सभी उन्हें एक महान पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रुप में जानते हैं। क्रांतिकारी विचारों से ओत-प्रोत होने के कारण उनकी संघर्ष गाथा, विशेष रुप से उनकी हत्या की चर्चा बहुत कम होती है। मैं अपने पिछले लेखों में बता चुका हूं कि भारत का पहला दंगा मोपला, केरल में 1921 में हुआ था। इस दंगे में 2000 हिन्दुओं की हत्या कर दी गयी और 20 हजार से अधिक हिन्दू बेघर हो गये। हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार भी सैकड़ों की संख्या में हुए। इसके बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में एक ओर महात्मा गांधी की स्वीकार्यता बढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर हिन्दुओं को दंगों में मारने, लूटने व हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ रही थीं। इन दंगों में सामान्यतः कोई व्यक्ति विशेष लक्ष्य नहीं होता था, किंतु गणेश शंकर विद्यार्थी को लक्ष्य बनाकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों की भीड़ ने मार डाला। उनकी हत्या कर दी। यही कारण है कि मैं गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या को साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग कह रहा हूं। अंग्रेजों का भारत में शासन स्थापित होने के बाद मेरी अभी तक की जानकारी के अनुसार यह पहली बड़ी माॅब लिंचिंग की घटना थी।

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म इलाहबाद (प्रयागराज) में हुआ था। 1908 में वो कानपुर आ गये और इसी शहर को उन्होंने अपनी कर्मभूमी बना लिया। भारत के सर्वांगीण विकास के लिये अंग्रेजों का भारत को छोड़कर जाना आवश्यक है। यह विचार विद्यार्थी जी के मन में प्रयागराज से ही था, जो कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य से बिल्कुल उलट था। कांग्रेस अंग्रेजी शासन को स्वीकार करते हुये भारतीयों को और अधिक अधिकार देने की वकालत करती थी। इसी कारण गणेश जी की निकटता क्रांतिकारी विचारों का समर्थन करने वाले लोगों से अधिक हुई। यही विचार बाद में उनकी हत्या का कारण भी बना। गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से अपना साप्ताहिक समाचार पत्र प्रताप निकाला। वो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। इस कारण उनकी निकटता कांग्रेस से भी रही। वे एक प्रकार से कांग्रेस के गरम दल के सदस्य थे। यह गुट कांग्रेस में रहते हुये क्रांतिकारी विचारों को भी समान रुप से महत्व देता था।

1920 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र प्रताप को दैनिक कर दिया। आर्थिक सहायता न के बराबर मिलने के बाद भी उनका यह निर्णय साहसिक था। लेकिन इसी बीच 1920 में ही बाल गंगाधर तिलक का देहांत हो गया और कांग्रेस पूरी तरह से महात्मा गांधी के हाथ में जाने लगी। तिलक के प्रति सम्मान के कारण जहां एक ओर विद्यार्थी जी कांग्रेस के आंदोलनों में सक्रिय रहते थे, वहीं विचारों से वे क्रांतिकारियों के निकट लगते थे। इसी कारण कांग्रेस से उन्हें प्रताप के संचालन में कोई विशेष सहयोग नहीं मिला। 1921 में मोपला, केरल से शुरु हुई साम्प्रदायिक दंगों की आग कानपुर तक पहुंच गयी। 25 मार्च 1931 में मुस्लिमों की एक भीड़ ने गणेश शंकर विद्यार्थी को शहीद कर दिया।

आखिर इन दंगों की शुरुआत 1921 से ही क्यों हुई? दरअसल 1920 में मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से अलग हुये और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने। गांधी जी हमेशा हिन्दू-मुस्लिम विवाद होने पर हिन्दुओं को ही समझाते थे और शांति बनाये रखने के लिये कहते, लेकिन जिन्ना इतने से संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें मुस्लिमों के लिये और अधिक अधिकार व बिना रोक-टोक इस्लामिक नियमों के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता चाहिए थी। डॉ. हेडगेवार सहित कांग्रेस के कई नेता जिन्ना की इन बातों से सहमत नहीं थे। यही कारण है कि उन्होंने 1920 में ही मुस्लिमों के लिये अलग राष्ट्र की मांग के लिये वातावरण बनाना शुरु कर दिया। इसी विचारधारा के कारण 1921 में केरल के अंदर दंगे हुए, बाद में ये दंगे कानपुर तक पहुंचे और अंततः 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन हुआ। गांधी जी अंत तक जिन्ना को साथ जोड़े रखने का प्रयास करते रहे, लेकिन इसका लाभ नहीं हुआ।

गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने की थी। इस दंगे या कहें कि साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग की निंदा करने की जगह गांधी जी ने विद्यार्थी की शहादत पर कहा था कि यह बलिदान में बहा खून दो समुदायों के बीच दरार को जोड़ने वाली सीमेंट की तरह काम करेगा। यह शहादत पत्थर में भरे गए जहर को धोएगी। आश्चर्य है कि हिंसा का सदैव विरोध करने वाले गांधी जी इस्लाम के कट्टर अनुयायियों के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं बोल सके। बल्कि इस हत्या को दो सम्प्रदायों के बीच नफरत को समाप्त करने के लिये जरुरी बता डाला।

भारतीय इतिहास में हुई गलती कांग्रेस, आज भी एक समस्या

राहुल गांधी ने इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाये गए आपातकाल को गलत निर्णय बताया। इसके बाद से एक बार फिर कांग्रेस के द्वारा लिये गये उन निर्णयों पर चर्चा शुरु हो गयी है, जिन्होंने भारत को नुकसान पहुंचाया। मेरा मानना है कि कांग्रेस की स्थापना ही एक बहुत बड़ी गलती थी, जिसने देश का विभाजन करवाया और आज भी विभाजनकारी शक्तियों के साथ उसका हाथ है। भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में हुआ। समय से पहले शुरु हो गये इस आंदोलन को अंग्रेजों ने कुचल दिया, लेकिन वो बहुत ही भयभीत हो गये। यह सशस्त्र आंदोलन यदि तय समय पर शुरु होता तो शायद अंग्रेजों को संभलने का समय भी नहीं मिलता।

इस बात को अंग्रेज सरकार समझ चुकी थी। इसलिये वो देश में स्वतंत्रता के लिये कोई भी सशस्त्र आंदोलन नहीं चाहती थी। इसके बाद एक अंग्रेज अधिकारी ए ओ ह्यूम ने 28 दिसंबर 1985 को कांग्रेस की स्थापना की। वरिष्ठ इतिहासकार कृष्णानंद सागर के अनुसार कांग्रेस के गठन से पहले ह्यूम ने कई वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों व पूर्व अधिकारियों से इस पर विस्तृत चर्चा की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि ह्यूम कांग्रेस में अंग्रेज अधिकारियों का मार्गदर्शन भी चाहते थे, लेकिन बाद में यह तय हुआ कि वार्षिक अधिवेशन एक रूप में भारतीयों को अंग्रेजों पर भड़ास निकालने का कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा, इसलिये प्रत्यक्ष रुप से अंग्रेज अधिकारियों का इससे जुड़ना ठीक नहीं है। इस प्रकार कांग्रेस की स्थाना ही भारत के खिलाफ एक षडयंत्र का हिस्सा था।

इस षडयंत्र को एक और घटना से समझा जा सकता है। एओ ह्यूम ने जिस कांग्रेस की स्थापना की थी, वो सिर्फ वार्षिक अधिवेशन कर अंग्रेजों को कोसती थी और उसके बाद फिर भारत की जनता को अंग्रेज शासन के हवाले छोड़ देती थी। बाद में कई देशभक्त भी इससे जुड़ गये। ऐसे में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज मुखर होने लगी। कुछ कांग्रेस के नेता सशस्त्र आंदोलन करने वाले क्रांतिकारियों को समर्थन देने लगे। अंग्रेजों को डर लगने लगा कि कहीं उनकी बनायी हुई कांग्रेस ही 1857 जैसे सशस्त्र स्वतंत्रता आंदोलन का कारण न बन जाये। इसके बाद अंग्रेज भक्त कांग्रेसियों के सहयोग से गांधी जी को भारत लाया गया। 1924 में महात्मा गांधी को कांग्रेज का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने देशवासियों को क्रांतिकारियों से जुड़ने के स्थान पर अहिंसक आंदोलन चलाने के लिये मनाया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस क्रांतिकारी विचारों के भी समर्थक कांग्रेसियों में से एक थे। जब नेताजी 1939 में दुबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिये गए, तो गांधी जी ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उनका इस्तीफा करवा दिया। क्योंकि कांग्रेस किसी भी क्रांतिकारी विचारों के समर्थक को अपना अध्यक्ष नहीं बनाना चाहती थी। इसका नुकसान हमें स्वतंत्रता के समय देश विभाजन के रुप में चुकाना पड़ा। यह कांग्रेस की एक और बड़ी गलती थी।

कांग्रेस क्रांतिकारियों के बारे में क्या विचार रखती थी, उसकी देशभक्ति को समझने के लिये यह जानना बहुत जरुरी है। भगत सिंह को जब फांसी दी जाने वाली थी, तब कुछ क्रांतिकारी विचारों के समर्थक कांग्रेसियों ने गांधी जी से हस्तक्षेप कर इस फांसी को रुकवाने का अनुरोध किया। गांधी जी ने भगत सिंह को हिंसा फैलाने वाला बताकर मना कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद एक कांग्रेसी नेता से मिलकर सहायता मांगने गये। उन्हें बदले में मुखबरी मिली। अंग्रेजों को आजाद की वास्तविक स्थिति का पता बता दिया गया और फिर क्या हुआ सब जानते हैं। कांग्रेस ने स्वतंत्रता के समय अंग्रेजों के साथ समझौता किया था कि अंग्रेजों की आतंकवादी सूची में शामिल लोग बाद में भी मिलते हैं, तो उन्हें अंग्रेज सरकार को सौप दिया जायेगा। ये सूची वास्तव में उस समय जीवित होने की संभावना वाले क्रांतिकारियों की लिस्ट थी। इसे भी उसकी जानबूझकर की गई गलती मान सकते हैं।

भारत में हिन्दुओं के खिलाफ सांप्रदायिक दंगों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व से मिलता है। कांग्रेस ने तुष्टीकरण के लिये इन दंगों को हमेशा आपसी झड़प बताकर इसकी गंभीरता को कम करने का प्रयास किया। जब अब्दुल राशिद नाम के एक आतंकी ने अपनी दूषित मानसिकता के कारण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिन्दू धर्म गुरु स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी, तो गांधी जी ने इसे जायज बताते हुये अब्दुल राशिद को अपना भाई और निर्दोष बताया। वास्तव में श्रद्धानंद सरस्वती क्रांतिकारी विचारों के समर्थक थे और हिन्दुओं के खिलाफ होने वाले सांप्रदायिक दंगों की खुलकर निंदा करते थे। सच आने वाली पीढ़ियां न समझ सके, इसलिये हिन्दुओं के विरुद्ध मोपला में सांप्रदायिक दंगों को अंग्रेजों के खिलाफ किये गए विद्रोह के रुप में इतिहासकारों से प्रचारित करवाया गया। मैं इसे भी कांग्रेस की गलती मानता हूं क्योंकि 1921 में हिन्दुओं के विरुद्ध हुये इन दंगों को छिपाने का प्रयास ही बाद में धर्म के आधार पर पाकिस्तान विभाजन का आधार बना। यह तुष्टिकरण आज भी जारी है और इसे छुपाने के लिए हिन्दू आस्था स्थलों के दौरे भी साथ-साथ चल रहे हैं।

1925 में तत्कालीन कांग्रेस विदर्भ के बड़े नेता डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का संगठन बना लिया। इससे पहले कांग्रेस ने अंग्रजों को भारत छोड़ने के लिये कभी नहीं कहा था। वह हमेशा अंग्रेजों की गुलामी को स्वीकार करते हुये बेहतर जीवन की मांग करती थी। कांग्रेस का अहयोग आंदोलन भी वास्तव में खिलाफत आंदोलन का भारतीय प्रारुप था, जो उसने तुष्टीकरण के लिये शुरु किया था। गांधी जी ने 1921 में अंग्रेजी वस्त्रों को त्यागकर धोती पहन ली। कुछ इतिहासकारों के अनुसार गांधी जी ने पूर्ण स्वराज्य लाने के लिये एक वर्ष का समय मांगा था। इसके लिये धन संग्रह भी पूरे देश में किया गया। उस समय करोड़ों रुपये का चंदा इकट्ठा हुआ, तब एक रुपये रखने वाला व्यक्ति भी अमीर माना जाता था। इस चंदे का हिसाब न देना पड़े इसके लिये वस्त्रों का त्याग कर लोगों को धोखा देने का प्रयास किया गया। इसे भी कांग्रेस की गलती या धोखेबाजी कह सकते हैं।

इस तरह यह सिद्ध हो जाता है कि अपनी स्थापना से स्वतंत्रता तक कांग्रेस ने देश को सिर्फ धोखा देने का प्रयास किया कि वो एक देशभक्त पार्टी है। हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कांग्रेस में कई देश भक्त जैसे बाल-लाल-पाल, डॉ. हेडगेवार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आदि भी हुये, जिन्होंने हमें वास्तविक स्वतंत्रता दिलाने का प्रयास किया। हां यह जरुर कहा जा सकता है कि कांग्रेस की गलतियों के कारण हमें देरी से स्वतंत्रता मिली और देश का विभाजन भी हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी कांग्रेस ने गलतियां करना नहीं छोड़ा। सबसे बड़ी गलती 1948 में जम्मू-कश्मीर के भारत विलय में देरी था, जिसका परिणाम यह है कि आज जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का एक बड़ा भाग पाकिस्तान और चीन के पास है। वास्तव में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी कांग्रेस की अंग्रेज भक्ति नहीं गयी थी, बल्कि और मजबूत हो गयी थी। यही कारण है कि स्वतंत्र पाकिस्तान का पहला वायसराय जिन्ना था, जबकि स्वतंत्र भारत का पहला वायसराय एक अंग्रेज।

नेहरु ने 26 जनवरी 1963 को आरएसएस को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करके भूल सुधार का प्रयास किया, लेकिन राहुल गांधी उसी आरएसएस को बुरा-भला कहते रहते हैं। अब या तो नेहरु गलत थे या फिर राहुल गलत हैं, दोनों ही परिस्थितियों में यह कांग्रेस की गलती है।नेहरु-गांधी परिवार से अलग भी लाल बहादुर शास्त्री संघ की सहायता ले चुके हैं। कुछ लोगों ने तो पी.वी. नरसिम्हाराव को संघ से सहानुभूति रखने वाला कहा था। ऐसे में राहुल गांधी का संघ के सहयोगी संगठन विद्या भारती के बारे में दिया गया हालिया बयान या तो उनकी नासमझी कहा जा सकता है या फिर कांग्रेस की गलती। वास्वत में स्वतंत्रता के बाद नेहरु-गांधी परिवार को छोड़कर अन्य किसी को कांग्रेस में ऊपर उठने ही नहीं दिया गया। इसलिये आज कांग्रेस के कई नेता गांधी परिवार को ही पार्टी का जन्मसिद्ध मालिक मान चुके हैं। इस गलती के कारण देश को एक मजबूत विपक्ष नहीं मिल पा रहा है।

स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती और महात्मा गांधी

देश में ऐसे अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुये जो पहले कांग्रेस के साथ जुड़े या उसे अपना समर्थन दिया लेकिन बाद में वैचारिक मतभेद होने के कारण एक अलग राह बना ली। इनमें सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह व डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जैसे अनेक नाम शामिल हैं। ऐसे ही एक महान धार्मिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे स्वामी श्रद्धानंद। महात्मा गांधी इनसे इतने असहमत थे, कि स्वामी जी की हत्या के बाद हुई कांग्रेस की बैठक में उनके हत्यारे की ही वकालत करने लगे थे और गांधी जी ने उनकी हत्या को भी सही सिद्ध करने का प्रयास किया था।

स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के बचपन का नाम मुंशीराम विज था। उनका जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब में हुआ था। वे आर्य समाज के विचारों से प्रभावित संत थे। प्रसिद्ध गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना उन्होंने ही की थी। ऐसे ही विभिन्न अन्य शिक्षण संस्थानों की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य हिन्दू मान्यताओं का प्रचार-प्रसार था। जबकि गांधी जी हिन्दू मान्यताओं और हिन्दुओं के गौरवशाली इतिहास के शिक्षण को घृणा फैलाने वाला कार्य मानते थे। गांधी जी को अंग्रेजी शिक्षण पद्धति से कोई समस्या नहीं थी। हिन्दू समाज में फैले हुये जातिगत भेदभाव के विरुद्ध स्वामी जी के कार्यों को देखकर 1922 में डॉ. भीमराव राम आंबेडकर ने उन्हें अछूतों का महानतम और सच्चा हितैषी बताया था।

स्वामी जी ने सर्वप्रथम जालंधर में आर्य समाज के जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय वो वकालत करते थे। किंतु दयानंद सरस्वती की 1883 में हत्या के बाद श्रद्धानंद जी ने स्वयं को पूरी तरह आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। उनका जीवन इस बात का भी उदाहरण है कि आर्य समाज हिन्दू धर्म की बुराईयों के विरुद्ध है न की हिन्दुत्व के सिद्धांत के। इस कारण स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिये हिन्दुओं के संगठन पर जोर देते थे। गांधी जी इस विचार से असहमत थे। गांधी जी को संदेह था कि मुस्लिम समाज स्वयं को हिन्दुस्थान से जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर रहा, इसके लिये हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात कर, उसे जोड़े रखना बहुत जरुरी है। हिन्दुत्व के विचार का प्रचार-प्रसार इसमें बाधक है।

ऐसा नहीं है कि स्वामी जी और गांधी जी के बीच यह मतभेद हमेशा से थे। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करते हुये सुधारों की वकालत कर रहे थे, तो भारत में उनकी जो सकारात्मक छवि बन रही थी, उससे श्रद्धानंद जी भी प्रभावित थे। उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल कांगड़ी के विद्यार्थियों ने उस समय 1500 रुपये एकत्रित करके गांधी जी को भेजे थे। स्वतंत्रता से पूर्व 1 रुपये भी बहुत बड़ी राशि होती थी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि गांधी जी के भारत आने के बाद ऐसा क्या हुआ, जो स्वामी जी से महात्मा गांधी नाराज हो गये?

इसके उत्तर के लिये विदर्भ प्रांत के एक तत्कालीन बड़े कांग्रेसी नेता डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार की चर्चा करना चाहता हूं। डॉ. हेडगेवार चाहते थे कि कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य के अंतर्गत अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये कहे। जबकि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका की तरह ही हिन्दुस्थान में भी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करते हुये सुधारों की वकालत कर रहे थे। गांधी जी के स्वराज्य का अर्थ था कि अंग्रेज प्रमुख बने रहे और उनके आधीन रहते हुये हिन्दुस्थानी हिन्दुस्थान का काम देखें। गांधी जी के इन विचारों से डॉ. हेडगेवार सहित कई अन्य कांग्रेसी सहमत नहीं थे। इस कारण कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। जब गांधी जी हिन्दुस्थान आये और कांग्रेस से जुड़े, तो उनके वास्तविक विचारों से स्वामी श्रद्धानंद अवगत हुये। गांधी जी 1924 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती हिन्दुस्थान का पुराना गौरवशाली हिन्दू इतिहास याद दिलाने का प्रयास निरंतर कर रहे थे। उनका मानना था कि यदि हम इतिहास के वास्तविक महापुररुषों से सीख लेंगे, तो हमें स्वतंत्रता भी मिलेगी और हम सदैव स्वतंत्र बने भी रहेंगे। स्वामी जी को इसके लिये क्रांतिकारियों का सहयोग लेने में भी कोई दिक्कत नहीं लगती थी, जबकि गांधी जी क्रांतिकारियों को हिंसावादी मानते थे। गांधी जी की तुलना में स्वामी जी के विचार डॉ. हेडगेवार से अधिक मिलते थे। गांधी जी ने मोपला सहित हिन्दुओं के विरुद्ध हुये सांप्रदायिक दंगों के विरोध में एक भी मुस्लिम आतंकवादी की निंदा नहीं की, जबकि स्वामी जी ने इन सबका मुखर होकर विरोध किया। इस कारण कई मुस्लिम नेताओं को स्वामी जी खतरा लगने लगे। 23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक आतंकवादी ने स्वामी जी की हत्या कर दी।

यह हत्या दुखद थी। कांग्रेस में कुछ लोग इस हत्या को साम्प्रदायिक सौहार्द की भावना के विरुद्ध मानते थे। लेकिन गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के इतर कितने प्रसन्न थे, यह बात स्वामी जी की हत्या पर उनकी प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है। यंग इंडिया में प्रकाशित वर्ष 1926 को की एक रिपोर्ट के अनुसार गांधी जी ने 26 दिसंबर 1926 को गुवाहाटी में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में स्वामी जी की हत्या पर शोक सभा को संबोधित करते हुये कहा था कि मैं अब्दुल रशीद को भाई मानता हूं। मैं उन्हें स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ। एक दूसरे के विरुद्ध घृणा पैदा करने वाले लोग इस हत्या के दोषी हैं। इसलिये हमें आंसू नहीं बहाने चाहिए। मैं स्वामी श्रद्धानंद की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती की हत्या हमारे दोष को धो देगी। इससे हृदय निर्मल होगा।

स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने कांग्रेस द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों में भाग लिया था। इनमें से कांग्रेस नेता के रुप में डॉ. हेडगेवार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को श्रद्धानंद सरस्वती ने संबोधित भी किया था। इसके बाद भी अहिंसा के पुजारी के रुप में प्रसिद्ध महात्मा गांधी के स्वामी जी के बारे में जो विचार थे, वो गांधी जी की अहिंसा के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाते हैं।

शरत चंद्र बोस : एक कांग्रेसी, जो क्रांतिकारियों के अधिक निकट था

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरत चंद्र बोस की आज पुण्यतिथि है। वो उन कुछ गिने-चुने कांग्रेसी नेताओं में से एक थे, जिनकी आस्था जितनी अहिंसा में थी, उतनी ही क्रांतिकारी विचारो में भी। ऐसा मैं ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कह रहा हूं। कांग्रेस का क्रांतिकारियों के बारे में क्या विचार था, इसे एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। जब भगत सिंह को फांसी होने वाली थी, तो कुछ कांग्रेसी महात्मा गांधी के पास आये, उन्होंने अनुरोध किया कि यदि गांधी जी हस्तक्षेप करें, तो एक युवक (भगत सिंह) की फांसी रुक सकती है। उसने जोश में कुछ कार्य किये हैं, जिससे अंग्रेज सरकार नाराज है, लेकिन इस आयु में ऐसा हो जाता है। इस पर कांग्रेस के ही अन्य नेताओं ने तर्क दिया कि यदि हम हिंसा करने वाले किसी व्यक्ति का साथ देंगे, तो हमारी अहिंसा की छवि खराब हो सकती है और गांधी जी से इसी विचार पर सहमति मिल गयी। कांग्रेस व महात्मा गांधी ने भगत सिंह फांसी को सही माना।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय ऐसे विचारों को प्रतिपादित करने वाली कांग्रेस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये। दूसरी बार गांधी जी के दबाव डालने के बाद सुभाष बाबू को पद छोड़़ना पड़ा। उनके बड़े भाई बैरिस्टर शरत चंद्र बोस भी 1936 से 1947 तक कांग्रेस की अखिल भारतीय समिति के सदस्य रहे। बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने 1947 में कांग्रेस छोड़ दी। शरत जी कांग्रेस में कई बड़े पदों पर रहे। इसके बाद भी वो अपनी असहमति सदैव व्यक्त करते रहे। शायद इसी कारण इतिहास में उनका अधिक विवरण नहीं मिलता है। जिसने भी भारत को स्वतंत्रता मिलने से पहले कांग्रेस या महात्मा गांधी के विचारों से असहमति व्यक्त की, कुछ अपवादों को छोड़कर उन सभी के बारे में आपको अधिक जानकारी नहीं मिलेगी या फिर कांग्रेस विरोध की बाते इन देशप्रेमियों की जीवनी से हटा दी जायेंगी।

शरत चंद्र बोस ने 1914 में इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई पूरी की और बैरिस्टर बन गये। महात्मा गांधी की तरह ही उन्होंने भी अपने प्रारंभिक जीवन में वकालत की और फिर भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गये। महात्मा गांधी का कार्यक्षेत्र पहले गुजरात और फिर दक्षिण अफ्रीका रहा, जबकि शरत जी का कार्यक्षेत्र बंगाल रहा। शरत चंद्र बोस के बारे में ऐसा कहा जाता है कि उस समय किसी भी क्रांतिकारी का मुकदमा उनके पास आता था, तो वो हर संभव प्रयास करते थे कि भारत के उस देशभक्त को सजा न हो या कम से कम हो। क्रांतिकारियों से उनका यह लगाव कांग्रेस की नीतियों के बिल्कुल उलट था।

ऐसा नहीं है कि शरत चंद्र बोस की अहिंसा में कोई आस्था नहीं थी, किंतु वे महात्मा गांधी की तरह सिर्फ अहिंसा के भरोसे देश की स्वतंत्रता को नहीं छोड़ना चाहते थे। उनका मानना था कि दोनों प्रकार से प्रयास करते रहना चाहिए। इसलिये जहां वो एक ओर कांग्रेस द्वारा चलाये गये भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुये, तो वहीं उन्होंने आजाद हिंद फौज जैसे विकल्पों को भी पूरा प्रोत्साहन दिया। तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स टेगार्ट सहित कई अंग्रेजों का ऐसा मानना था कि सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचारों के पीछे प्रेरणा शरत जी की ही है। इस संबंध में शरत जी द्वारा 18 सितंबर 1941 को लिखे एक पत्र का विवरण भी मिलता है, जिसमें वो 10 हजार लोगों की सशस्त्र सेना होने का दावा करते हैं और इंग्लैंड विरोधी देशों के सहयोग से इनकी संख्या 50 हजार तक बढ़ाने के लक्ष्य की जानकारी भी देते हैं।

1947 में शरत चंद्र बोस ने कांग्रेस छोड़ दी, लेकिन उनकी कांग्रेस से नाराजगी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने 15 अगस्त 1947 को बनी अंतरिम पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्यमंत्री पी.सी. घोष के विरोध में विपक्षी दलों का एक मोर्चा बनाने का प्रयास भी किया था। स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरु भी उनके इन प्रयासों से पूरी तरह अवगत थे। नेहरु पर यह आरोप भी लगे कि वो शरत जी की जासूसी करवाते थे, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वो कांग्रेस के विचारों से अलग क्या कर रहे हैं? या फिर उनके किस कार्य से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है? नेहरु को हमेशा डर रहता था कि शरत जी के कारण कांग्रेस को लोग देश विरोधी न समझने लगे। स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज और बाद में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शरत जी को पसंद नहीं करते थे। इसलिये नेहरु पर लगे इन आरोपों को साबित करने के लिये साक्ष्य देना मुश्किल लगता है।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय से भ्रमजाल का निर्माण करता रहा है भारतीय वामपंथ

आज न भारतीय स्वतंत्रता दिवस है, न ही गणतंत्र दिवस। फिर स्वतंत्रता आंदोलन की बात क्यों? दरअसल कुछ लोगों की प्रवृत्ति इस प्रकार की होती है, जो कभी नहीं बदलती। भारत में वामपंथ का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। इस विचारधारा ने हमेशा ही भारत विरोधियों का साथ दिया है। चाहें वह स्वतंत्रता आंदोलन का समय हो या भारत-चीन युद्ध या फिर वर्तमान किसान आंदोलन। इसके कुछ उदाहरण मैं आप सभी के सामने रखना चाहता हूं। इसके लिए इन वामपंथियों ने समय-समय पर ऐसे भ्रमजाल का निर्माण किया की उसे समझ पाना बहुत मुश्किल रहा।

बात स्वतंत्रता आंदोलन से निकली है, तो उदाहरण भी वहीं से शुरु करता हूं। भारत में वाम दलों की शुरुआत कानपुर में 1925 से मानी जाती है। कुछ वामपंथी 1920 में एक अन्य स्थान पर इसकी स्थापना होने का दावा करते हैं। अतः ऐसा माना जा सकता है कि 1920-25 के बीच वामपंथ की शुरुआत भारत में हुई। वामपंथी दलों ने मजदूर हित की बात भारत में शुरु की तो उस समय के अंग्रेजों से विरोध हो गया। इस कारण भारत में वामपंथ को पहली बार पहचान मिली। अंग्रेजों का विरोध सभी देश भक्त कर रहे थे।

अतः भगत सिंह जैसे कुछ क्रांतिकारियों के मन में वामपंथ को जानने की इच्छा हुई और उन्होंने इसके प्रेरणाश्रोत लोगों पर अध्ययन किया। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था कि वामपंथ ने क्रांतिकारियों का साथ दिया। तत्कालीन वामपंथी सुभाष चंद्र बोस के विरोधी थे। ये लोग कांग्रेस और महात्मा गांधी की विचारधारा से भी सहमत नहीं थे, इसलिये उनका विरोध करते थे। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कई नेताओं ने देश को अपने अनुसार न चलता देखकर संविधान सभा में भी भाग नहीं लिया था।

अंग्रेजों के साथ कांग्रेस का एक अनुबंध हुआ था, जिसके अनुसार तत्कालीन क्रांतिकारियों की एक सूची तैयार हुई थी। इसमें उन सभी क्रांतिकारियों के नाम थे, जिनके जीवित होने की संभावना थी। इसमें सबसे अधिक चर्चित नाम सुभाष चंद्र बोस का था। इन्हें आतंकवादी मानते हुये तय हुआ था कि यदि स्वतंत्रता के बाद भी भारत सरकार को ये लोग मिलते हैं, तो इन्हें अंग्रेजों को सौपना पड़ेगा। इस कारण स्वतंत्रता के बाद क्रांतिकारी किसी भी प्रकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाये।

आरएसएस पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर उसे प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिसे बाद में हटा भी लिया गया। इस कारण उसके सहयोग से बने राजनीतिक दल जनसंघ को जनता का उतना समर्थन प्रारंभ में नहीं मिला। यही कारण था कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (भाकपा) ही एक मात्र चुनौती कांग्रेस के सामने रह गयी। उस समय सोवियत संघ में वाम विचारधारा अपने चरम पर थी। सोवियत संघ जिसका सबसे बड़ा देश अब रुस है, प्रारंभ से ही भारत का सहयोगी था। इस कारण वो कांग्रेस और वाम दलों में कोई टकराव नहीं चाहता था।

सोवियत संघ की मध्यस्थता के बाद भी पं. नेहरु ने 1957 में लोकतांत्रिक ढंग से बनी भाकपा की केरल सरकार को 1959 में बर्खास्त कर दिया। सोवियत संघ के दबाव के कारण भाकपा मुखर होकर विरोध भी नहीं कर सकी। इससे एक बात और स्पष्ट हो चुकी थी। भाकपा का नियंत्रण प्रारंभ से ही भारत के बाहर से होता रहा है। 1960 के दशक के समय सोवियत संघ और चीन की कम्यूनिस्ट पार्टियों में गहरे मतभेद उभरे।

 

चौरी चौरा – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक आंदोलन

मैंने बचपन में पढ़ा था ‘……… देदी हमें आजादी बिना बरछी बिना ढाल….’। मन में प्रश्न आया क्या पूरे स्वतंत्रता संग्राम के लिये अहिंसा का सिद्धांत मानने वाले लोगों को ही श्रेय दिया जाना ठीक है। गीत पढ़कर तो उनको ही श्रेय जाना चाहिए, ऐसा लगा। इसके बाद पढ़ा कि पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में हुआ। नेता जी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंस फौज के साथ भारत को स्वतंत्र देश के रुप में कई देशों से मान्यता दिला चुके थे। भारत छोड़ो आंदोलन तो 1942 में प्रारम्भ हुआ था, लेकिन नेता जी का आंदोलन 1945 में उनके गायब होने तक चलता रहा। 1857 या 1945 दोनों ही सशस्त्र आंदोलन थे। अंग्रेजों को भी सबसे अधिक डर क्रांतिकारियों से लगता था, इसीलिये उन्होंने 1947 में तत्कालीन सभी क्रांतिकारी जिनके जीवित होने की संभावना थी, उनको आतंकवादी घोषित कर भारत सरकार से उन्हें मिलने पर सौपने का अनुबंध किया था। इन बातों से ऐसा लगता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इतिहास ने महान क्रांतिकारियों को वो स्थान नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थी। 1922 में चौरी-चौरा में जो हुआ, उसे एक घटना मात्र मानना ठीक नहीं है। इसे स्वतंत्रता का एक आंदोलन या उसका भाग कहा जाना चाहिए।

4 फरवरी 1922 में उस समय गोरखपुर जिले का भाग रहा उत्तर प्रदेश का चौरी-चौरा क्रांतिकारी आंदोलन की ऐतिहासिक घटना का साक्षी बना। दुर्भाग्य से आज भी इसका वर्णन विकीपीडिया और कई स्थानों पर चौरी-चौरा कांड के रुप में होता है। कांड शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है। हमारे कुछ धार्मिक ग्रंथों में कांड का अर्थ घटना से होता है, तो वहीं वर्तमान समय में कांड का अर्थ साजिशन अंजाम दी गई घटना के संदर्भ में किया जाता है। कुछ जगहों पर इस आंदोलन को कुछ दुस्साहसिक लोगों द्वारा किया गया एक कार्य बताया गया है। कुछ स्थानों पर ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिये पुलिस चौकी पर हमला किया था, जिससे वो अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न कर सकें।

क्या इन क्रांतिकारियों का उद्देश्य पुलिस वालों को मारने का था, नहीं। वास्तव में प्रदर्शनकारियों का एक दल अहिंसात्मक रुप में अपना विरोध कर रहा था। पुलिस वालों ने इन्हें रोकने का प्रयास किया, जब इन देशभक्तों ने बात नहीं मानी, तो गोली चला दी गई, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गयी। इसके बाद आंदोलन में शामिल युवा जो क्रांतिकारी विचारों से भी ओत-प्रोत थे, उन्होंने भी प्रतिक्रिया की और पुलिस चौकी ही फूंक दी। अंग्रेजों को इस प्रकार के प्रतिशोध की अपेक्षा नहीं थी। अंग्रेज डर गये, इससे पहले की अंग्रेजों का यह भय उन पर इंग्लैंड वापस जाने के लिये दबाव बनाता, महात्मा गांधी ने पूरा आंदोलन ही वापस ले लिया और अंग्रेज फिर से भयमुक्त हो गये।

 महात्मा गांधी ने गोली चलाने वाले अंग्रेजों पर कार्रवाई की मांग नहीं की, लेकिन अंग्रेजों ने बदला लेने की ठान ली थी। पुलिस चौकी फूंकने के आरोप में 172 लोगों पर मुकदमा चलाया गया। मदन मोहन मालवीय ने किसी प्रकार 151 लोगों को फांसी की सजा से बचा लिया, लेकिन 19 लोगों को फिर भी फांसी हो गयी। गांधी जी या कांग्रेस ने इन 19 लोगों को बचाने के लिये कोई प्रयास नहीं किया। मालवीय जी व्यक्तिगत रुप से जितना कर सकते थे, उन्होंने प्रयास किया।

मैंने अपने एक लेख में बताया था कि खिलाफत आंदोलन को ही भारत में असहयोग आंदोलन के रुप में चलाया गया था। इसे तुर्की के सुल्तान और खलीफा के समर्थन में चलाया गया था। महात्मा गांधी के कारण इसे कांग्रेस ने स्वीकृति दी थी, किंतु अब गांधी जी इसे समाप्त करना चाहते थे। यदि बिना कोई ठोस कारण दिये इस आंदोलन को समाप्त किया जाता तो इससे एक तरफ खिलाफत आंदोलन चलाने वाले मुस्लिम नेता नाराज होते, तो वहीं दूसरी ओर पूरे देश में असहयोग आंदोलन के नाम पर मिला समर्थन विरोध में बदल सकता था। यही कारण है कि चौरी-चौरा के क्रांतिकारी कदम की निंदा करते हुए खिलाफत आंदोलन (असहयोग आंदोलन) समाप्त करने की घोषणा गांधी जी ने की। आज देश इस आंदोलन का शताब्दी वर्ष बना रहा है। आशा करता हूं कि इतिहास में की गई ऐसी और भी भूलों को सुधार कर हम सभी क्रांतिकारियों को उनका उचित सम्मान दिलायेंगे।

 

महात्मा गांधी ने भारत में असहयोग आंदोलन के नाम से चलाया था खिलाफत आंदोलन

30 जनवरी को मोहनदास कर्मचंद गांधी उपाख्य महात्मा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हो गयी। देश में क्रांतिकारियों को अपना आदर्श मानने वाले बहुत से लोग महात्मा गांधी से असहमत हो सकते हैं, लेकिन इस कारण उनकी हत्या को सही नहीं कहा जा सकता। वैसे तो महात्मा गांधी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा रहा, लेकिन मैं यहां उनकी भारत वापसी के बाद चलाये गए एक आंदोलन का विशेष रुप से उल्लेख करना चाहता हूं। ऐसा इसलिये क्योंकि इसी आंदोलन ने भारत-पाकिस्तान विभाजन और तुष्टीकरण की नींव हमारे देश में रखी। किसी भी बात को रखने के लिये तर्क आवश्यक होते हैं। जिस समय गांधी जी की दुभाग्यपूर्ण हत्या हुई, उस समय मेरा जन्म नहीं हुआ था और न ही मैं इतिहासकार हूं। यही कारण है कि मैंने इस लेख का आधार वरिष्ठ इतिहासकार और गांधी जी के समय जो लोग जीवित थे, उनसे वार्ता कर चुके कृष्णानंद सागर के कुछ लेखों को आधार बनाकर उन्हें अपने शब्दों में ढालने का प्रयास किया है।

खिलाफत आंदोलन उस समय इस्लाम में महत्वपूर्ण पद खलीफा को समाप्त करने के विरुद्ध चलाया गया एक अभियान था। गांधी जी इससे क्यों जुड़े, इसके पीछे बहुत से कारण बताये जाते हैं। गांधी जी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात की। जब 1921 में उनसे सवाल किया गया कि भारत में मुस्लिमों के अतिरिक्त अन्य संप्रदाय भी रहते हैं, फिर सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात ही क्यों? इस पर गांधी जी ने उत्तर दिया कि हम मुस्लिमों के मन में आत्मीयता लाना चाहते हैं। यह उत्तर सवाल खड़े करता है कि क्या 1921 में मुस्लिम स्वयं को भारत से अलग मानते थे, जो उनमें आत्मीयता उत्पन्न करने के लिये अलग से एक नारा देने की आवश्यकता पड़ी।

खिलाफत आंदोलन क्या था और क्यों भारत में इसे असहयोग आंदोलन के नाम से चलाया गया? इसको समझना भी आवश्यक है। इस्लाम को मानने वाला एक वर्ग तुर्की के सुल्तान को खलीफा मानता था अर्थात पृथ्वी पर इस्लाम का सबसे बड़ा और पूज्यनीय व्यक्ति। तुर्की में ही इसे लेकर विरोध शुरु हो गया और एक वर्ग ने खलीफा के पद को मानने से इनकार कर दिया। ऐसे में सुल्तान समर्थकों ने इसे धार्मिक रंग देने का प्रयास किया और इस सत्ता विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिये खिलाफत आंदोलन चलाया। जैसा आज भी होता है कि विश्व में कहीं भी इस्लाम के विरुद्ध कुछ भी होता है तो उसकी प्रतिक्रिया भारत में भी होती है। वैसा ही उस समय भी हुआ। भारत में तुर्की के सुल्तान का समर्थक करने के लिये कुछ लोगों ने खिलाफत आंदोलन को खड़ा करने का प्रयास किया। सुल्तान का विरोध करने वालों पर आरोप यह था कि वे अंग्रेजों के समर्थन से इस विद्रोह को चला रहे हैं। इसलिये भारत में खिलाफत आंदोलन अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा हो रहा था। भारत में यह आंदोलन 1918 में शुरु हुआ और इसी आंदोलन से निकले कुछ नेताओं के कारण बाद में भारत-पाकिस्तान विभाजन हुआ। कुछ मुस्लिम नेताओं को भारत के साथ जोड़े रखने के लिये उन्हें उच्च पद या अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी, जो बाद में तुष्टीकरण का आधार बना।

गांधी जी के जीवनीकार लुई फिशर के अनुसार 1919 में पहली बार गांधी जी को भी खिलाफ आंदोलन के समर्थन में होने वाले कार्यक्रम के लिये निमंत्रण मिला था। विदेशी कपड़ों की होली जलाने का सुझाव सर्वप्रथम इसी कार्यक्रम में आया था। इस बैठक में उपस्थित मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी उपस्थित थे। इन बैठकों के बारे में गांधी जी के जीवनीकार बी.आर. नंदा ने भी विस्तार से लिखा है। कई खलीफा ऐसे हुये जिन पर आरोप लगे कि उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले, हिन्दू मंदिरों को तोड़ने वाले आक्रांताओं को गाजी का दर्जा देकर सम्मानित किया। अकबर को भी हिन्दू राजा को मारने के बाद ही गाजी की उपाधि मिल सकी थी और उसकी महानता के गुणगान शुरु हुये थे। ऐसे में हिन्दू खलीफा के समर्थन में आंदोलन करेंगे, इस पर संदेह था। यही कारण है कि गांधी जी ने भारत में खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन के रुप में चलाने का निर्णय लिया। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विदेश कपड़ों की होली जलाना (स्वदेशी का विचार) और असहयोग आंदोलन (खिलाफत आंदोलन) की नींव खिलाफत आंदोलन के समर्थन में पड़ी थी । खिलाफत आंदोलन और भारत का स्वतंत्रता आंदोलन दोनों ही अंग्रेजों के विरुद्ध थे। इस कारण गांधी जी को लगा कि वो इसके लिये कांग्रेस को मना लेंगे। प्रारंभ में कांग्रेस के अंदर इस पर सहमति नहीं बन सकी, लेकिन बाद में गांधी जी के लगातार प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस ने इसे अपना पूरा समर्थन और सहयोग देने का निर्णय लिया।

अधिकांश आंदोलन की रुपरेखा 1920 में बन चुकी थी। ये आंदोलन किस प्रकार भारत-पाकिस्तान विभाजन और मुस्लिम तुष्टीकरण का आधार बना, इसका उदाहरण एक वर्ष बाद ही 1921 में धार्मिक दंगों से मिलने लगा था। 1921 में केरल के अंदर मोपला के दंगे हुए। यहां खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने वाले मोपला मुस्लिमों ने हिन्दुओं की हत्या, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार और लूटपाट जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। उस समय सर्वेण्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की एक रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में लगभग 1500 हिन्दू मारे गये और 20,000 हिन्दुओं का धर्मांतरण कर दिया गया। क्योंकि यह आंदोलन पहले अंग्रेजों के विरुद्ध शुरु हुआ था और बाद में इसने हिन्दू विरोधी रुख ले लिया। इसलिये अंग्रेजों का विरोध करने के कारण गांधी जी ने अपने एक लेख में इन मोपला मुस्लिमों को वीर मोपला कहकर संबोधित किया था। हर जुर्म होने से पहले अपनी दस्तक देता है। गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस दस्तक को अनसुना करते हुए दंगों को आपसी लोगों के बीच हुई हिंसक झड़प मानकर इसकी निंदा की और परिणाम 1947 में सामने आ गया।

उपरोक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन को जारी रखने के लिये इसे असहयोग आंदोलन के रुप में चलाया और क्रांतिकारियों के एक प्रयास को हिंसा का नाम देकर पूरा आंदोलन वापस लेने वाले गांधी जी ने हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को तुष्टीकरण के लिये नजरअंदाज कर दिया। गांधी जी को मानने वाले नेताओं ने बाद में उनके ऐसे ही बयानों व कार्यों को आधार बनाकर अपनी राजनीति की और आज भी वो इस तुष्टीकरण को सही मानते हैं।

स्वतंत्रता से पूर्व भी कांग्रेस में रहे हैं गहरे मनभेद

कांग्रेस आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसा कांग्रेस में दशकों से बने हुए उसके वरिष्ठ नेताओं का मानना है। किन्तु कांग्रेस में मनभेद की यह कहानी उसके जन्म के कुछ वर्षों बाद ही शुरू हो गई थी। मतभेद हर राजनितिक दल में होते हैं। दो व्यक्तियों के बीच मतभेद होना सामान्य बात माना जाता है, लेकिन कांग्रेस में ये मतभेद स्थापना के कुछ वर्षों बाद ही मनभेद में बदलने लगे थे। बहुत कम लोगों को पता होगा कि इन्हीं मनभेदों के कारण स्वतंत्रता पूर्व हुए कांग्रेस के एक अधिवेशन में जूता तक चल गया था। वास्तव में अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए जूता चलाने की शुरूआत वहीं से हुई थी। हम इस प्रथा का समर्थन नहीं करते, लेकिन यह वास्तविकता है।

कांग्रेस में मनभेद को समझने के लिए इसकी स्थापना और भारत की स्वतंत्रता से पूर्व हुए घटनाक्रमों को समझना होगा। विकिपीडिया के अनुसार 1883 में ए.ओ. ह्यूम नामक अंग्रेज ने कोलकाता विश्वविद्यालय के छात्रों को लिखे एक खुले पत्र में एक ऐसे निकाय को बनाने की बात की, जो भारतियों के हितों को अंग्रेज सरकार के सामने रख सके। वास्तव में यह अंग्रेजी सत्ता को स्वीकारते हुए सरकार में अधिक भागीदारी की बात थी, जिस प्रकार आज गठबंधन सरकारें चलती हैं ।

इस लेख में हम स्वतंत्रता के पहले की कांग्रेस के बारे में चर्चा कर रहे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद से अंग्रेज सशस्त्र विद्रोह की कल्पना से भी डरने लगे थे, इसलिए वे चाहते थे कि भारतीय किसी भी सशस्त्र आंदोलन का साथ न दें। कांग्रेस को सत्ता में भागीदार बनाकर उन्होंने ऐसा ही करने का प्रयास किया और यहीं से मनभेद की शुरूआत हो गई। कुछ वर्षों के बाद ही कांग्रेस के साथ कई ऐसे लोग जुड़ गए, जो भारत को अंग्रेजों से पूरी तरह मुक्त कराना चाहते थे। प्रारंभ में इन लोगों की आवाज को दबा दिया गया। यहीं से मतभेद, मनभेद में परिवर्तित होने लगे। कांग्रेस ने भारतियों का ध्यान क्रांतिकारियों से हटाकर खुदपर करना शुरू कर दिया लेकिन उसके अंदर ही नरम दल और गरम दल नाम से दो खेमें दिखायी देने लगे। नरम दल में वे लोग थे, जो अंग्रेजों के आधीन रहते हुए भारतीय हितों की बात करने के पक्षधर थे। ये लोग क्रांतिकारियों से किसी भी प्रकार के संपर्क या उन्हें सहयोग देने के मुखर विरोधी थे। दूसरी ओर गरम दल के लोग थे। ये लोग अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना चाहते थे। इनका मानना था कि क्रांतिकारी भी भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वे अछूत नहीं हैं।

वरिष्ठ इतिहासकार कृष्णानंद सागर अपने एक लेख में लिखते हैं कि 1907 में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में होना था, लेकिन गरम दल के लोगों के विरोध की संभावना के कारण इसका स्थान बदलकर सूरत कर दिया गया। गरम दल के लोग इस अधिवेशन का अध्यक्ष लोकमान्य तिलक को बनाना चाहते थे, लेकिन तिलक को सूरत अधिवेशन में बोलने तक नहीं दिया गया। कृष्णानंद सागर के अनुसार इस सभा में किसी प्रतिनिधि ने जूता फेका जो सुरेंद्रनाथ बनर्जी को छूता हुआ फिरोज शाह मेहता को लगा। इतिहासकार का दावा है कि इस अधिवेशन में कुर्सियां फेकी गईं और डंडे चले। मेरी जानकारी के अनुसार यह पहला अवसर था, जब कांग्रेस के अंदर नेतृत्व का इतना अधिक विरोध हुआ हो।

स्वतंत्रता पूर्व कांग्रेस के अधिवेशनों में अध्यक्ष का चुनाव होता था। ऐसे ही अधिवेशनों में कुछ गरम दल के लोग भी अध्यक्ष बने, जिनमें 1920 में विशेष सत्र में लाला लाजपत राय थे, जिन्हें इसी वर्ष हटाकर दूसरा अध्यक्ष चुन लिया गया। 1938 में सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1939 में बोस को पुनः अध्यक्ष चुन लिया गया, लेकिन तथाकथित नरम दल के लोगों को यह बात हजम नहीं हुई और उन्होंने षड़यंत्र करके बोस को इस्तीफा देने के लिए विवश कर दिया। इसके बाद बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। कई इतिहासकारों का यह भी दावा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भी पहले अपनी बात कांग्रेस नेतृत्व को समझानी चाही, लेकिन जब उनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया तो उन्होंने अलग गैर राजनीतिक संगठन बना लिया।

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों के आधीन रहकर सत्ता सुख भोगने के लिए हुई। जो भी व्यक्ति इसके बीच में आया, कांग्रेस ने उसकी आवाज बंद कर दी। यही कारण है कि मतभेद, मनभेद में बदलते चले गए। अंतर सिर्फ इतना है कि तब कांग्रेस सत्ता का भाग थी, इसलिए उसने सफलतापूर्वक अपने अन्दर के मनभेद पर विजय प्राप्त कर ली और आज विपक्ष में होने के कारण उसके सामने संकट खड़ा हो गया है।

गांधी जी : जिन्हें इतिहास ने महान बनाया

दे दी हमे आजादी बिना बरछी, बिना ढाल, सागरमति के संत तूने कर दिया कमाल। गांधी जी के लिए, उनकी प्रशंसा में उपरोक्त शब्द कहे गए हैं। भारत के इतिहास में, बचपन से विद्यार्थियों को यही पढ़ाया जाता रहा है कि हमें आजादी गांधी जी के प्रयासों से मिली। इसीलिए उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि भी दी गई है। किन्तु क्या आजादी में सिर्फ गांधी जी और कांग्रेस का ही योगदान था, इस पर महात्मा गांधी की जयंती पर चर्चा जरुरी है। तभी हम अपने वास्तविक नायकों को पहचान सकेगे। यद्यपि हम गांधी जी के लिए किसी भी प्रकार के अपशब्दों के प्रयोग का समर्थन नहीं करते और न ही उनकी हत्या को सही मानते हैं।

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। तब तक भारत में 1857 की क्रांति हो चुकी थी। यह एक सशस्त्र आन्दोलन था। अंग्रेजों का विरोध पहले भी हुआ करता था लेकिन 1857 को पहली बार इतने बड़े स्तर पर अंग्रेजी सेना के अंदर से विद्रोह हुआ था। शायद इसीलिए इसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। तब तक कांग्रेस की स्थापना भी नहीं हुई थी। इसके बाद 2 बड़ी घटनाये हुईं। 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई और 1888 में गांधी जी बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन पहुंचे, यहीं से गांधी जी के विचारों का प्रकटीकरण शुरू हो गया।

इतिहासकार कृष्णानंद सागर के अनुसार गांधी जी गए तो पढ़ाई करने थे लेकिन वहां की जीवनशैली और अंग्रेजों से इतने अधिक प्रभावित हो गए कि उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति की चिंता न करते हुए अंग्रेजों की तरह ही वेशभूषा और रहन-सहन शुरू कर दिया। कुछ समय के बाद उनके पास पैसे खत्म होने लगे, उन्होंने अंग्रेजों की नकल करना तो छोड़ दिया लेकिन वे तब तक दिल से अंग्रेज बन चुके थे और इसकी छाप उनके आगे के पूरे जीवन में दिखाई दी।

गांधी जी अपनी पढ़ाई पूरी कर भारत वापस लौट आये। यहां उन्हें वकालत में कोई सफलता नहीं मिली। अचानक उन्हें एक व्यापारी के द्वारा दक्षिण अफ्रीका जाकर उनकी फर्म के लिए काम करने का प्रस्ताव मिला। 1893 में वे दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए। अभी तक उनका संपर्क कांग्रेस से नहीं हुआ था। उधर कांग्रेस में दो फाड़ होते नजर आ रहे थे। एक पक्ष जो अंग्रेजों के आधीन रहते हुए सत्ता की मलाई प्राप्त करते रहना चाहता था और स्वयं को किसी विपक्षी दल के रूप में दिखाने के प्रयास को ही ठीक मानता था, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर से ही कुछ मुट्ठी भर लोग अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग भी करने लगे थे।

ऐसा माना जाता है कि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने वहां रह रहे अश्वेतों, विशेष रूप से भारतियों के जीवन को सुधार दिया। क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ था या वास्तविकता कुछ और थी। इतिहासकारों ने यहीं से गांधी जी को एक नायक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया, जो आगे चलकर गांधी जी के कांग्रेस में प्रवेश का आधार बना। गांधी जी ने कभी भी दक्षिण अफ्रीका को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए कोई आन्दोलन नहीं किया। वे हमेशा अंग्रेजों के बनाए नियमों के आधार पर अश्वेतों के लिए अधिकार की बात करते थे। वास्तव में लंदन में रहने के दौरान गांधी जी के मन में अंग्रेजों की छवि बनी थी कि वे बहुत न्यायप्रिय और अच्छे व्यक्ति होते हैं, इसलिए यहां भी उनका यही मानना था कि कुछ अंग्रेजों की गलतियों के लिए सभी को जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता।

भारत में कांग्रेस के अंदर अंग्रेज विरोधी दल सशक्त हो रहा था। विशेष रूप से बंग-भंग आंदोलन के बाद अंग्रेजों को लगने लगा था कि उन्होंने जिस उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना करवाई है, वह असफल हो जायेगा। यही वजह थी कि उन्हें ऐसे व्यक्ति की जरुरत थी, जो दिल से अंग्रेज हो और शरीर से भारतीय। जिसकी छवि भारतियों के मन में अच्छी हो, जो भारतियों के मन में अंग्रेजी सत्ता की स्वीकार्यता को स्थापित कर सके। अंग्रेजों को गांधी जी में सभी गुण दिखे, जिसे वो भारत में खोज रहे थे। यही वजह है कि गांधी जी को अंग्रेज समर्थक कांग्रेसियों से भारत बुलाया गया। गांधी जी 1915 में भारत वापस आ गए। यहां भी उन्होंने प्रारंभ में अंग्रेजों का साथ देने का ही प्रयास किया लेकिन बाद में जनभावनाओं के कारण कई सालों बाद मजबूरन अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा स्वीकार करना पड़ा।

कुछ इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से क्रांतिकारियों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को नजरअंदाज कर दिया ताकि कोई भी व्यक्ति गांधी जी के बराबर का त्यागी पुरुष न लगे। शहीद भगत सिंह बचपन में गांधी जी के समर्थक थे, लेकिन जलियावाला बाग काण्ड पर गांधी जी की निष्क्रियता से काफी दुखी हुए और क्रांति का रास्ता अपनाया। यदि इस हमले पर मात्र दुःख व्यक्त करने की जगह गांधी जी आंदोलन करते तो यह अंग्रेजों का विरोध होता, जो कांग्रेस नहीं चाहती थी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को साजिशन कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, वजह बने गांधी जी। उस समय बाल गंगाधर तिलक व लाला लाजपत राय जैसे महापुरुषों की भूमिका और उनके समर्थकों के प्रभाव को कम करने के लिए गांधी जी को इनके विकल्प के रूप में प्रोजेक्ट किया गया।

क्या कारण था कि क्रांतिकारियों को चुन-चुन कर शहीद करने वाली अंग्रेज सरकार गांधी जी को गिरफ्तार तो करती थी, लेकिन इस बात का भी विशेष ध्यान रखती थी कि उन्हें एक लाठी भी न लगे। गांधी जी पर अंग्रेजों की ऐसी ही विभिन्न मेहरबानियों से स्पष्ट है कि उनके और अंग्रेजों के बीच एक समझौता था कि हम सबके सामने लड़ेंगे लेकिन एक-दूसरे को नुकसान से हमेशा बचायेंगे। अंग्रेजों के भारत से जाने के पीछे दो बड़े कारण थे, पहला क्रांतिकारियों और कांग्रेस के गरम दल के लोगों का बढ़ता प्रभाव और दूसरा द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश शासन का कमजोर होना। यदि क्रांतिकारी न होते तो शायद देश कभी स्वतंत्र नहीं हो पाता। ऐसे में क्या गांधी जी का जन्मदिन मनाना देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान नहीं होगा।

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में हिन्दुत्व

हिन्दुत्व क्या है? एक पूजा पद्धति या एक संस्कृति या एक सभ्यता या फिर जीवन जीने की पद्धति? जितने लोग, उतनी परिभाषाएं। इसलिए हिन्दुत्व की क्या सही परिभाषा है, उसका निर्णय करने के लिये पहले हिन्दुत्व को समझना होगा। यदि इसके लिये स्वामी विवेकानंद हिन्दुत्व के बारे में क्या सोचते थे, यह पता हो, तो समस्या का समाधान मिल सकता है।

स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में दिये गए अपने भाषण में कहा था कि मैं यहां आपका धर्म परिवर्तन करने नहीं आया हूं। बल्कि आप जिस मान्यता को मानते हैं, उसे और बेहतर करने आया हूं। हम मानते हैं कि ईश्वर के कई रुप हो सकते हैं। उसे कई नामों से जाना और पहचाना जा सकता है। यह सभी जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद हिन्दू आध्यात्मिक गुरु थे। इसलिये यह भी स्पष्ट है कि वो जिस विचार की बात कर रहे थे, वही वास्तविक हिन्दुत्व है। अर्थात हिन्दू कभी धर्मांतरण में विश्वास नहीं रखता। हम सबकी मान्यताओं का सम्मान करते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां ईश्वर को एक और उस तक पहुंचने के अनेक रास्ते बताये गए हैं।

इससे एक बात स्पष्ट है कि विवेकानंद के अनुसार हिन्दुत्व कोई पूजा पद्धति नहीं है। अलग-अलग प्रकार से पूजा करने वाले, अलग-अलग भगवानों को मानने वाले सभी हिन्दू हो सकते हैं। उन्होंने शिकागो में जो भाषण दिया था, उसकी शुरुआत भाईयों और बहनों से की थी, जबकि शायद उस समय वहां एक भी हिन्दू नहीं था। यदि रहा भी होगा, तो उनकी संख्या न के बराबर होगी। अधिकांश अमेरिकी ईसाई ही वहां आए थे। हम अपने परिवार के लोगों के साथ इस प्रकार का संबोधन करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हिन्दुत्व पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानता है। वसुधैव कुटुम्बकम जिसे हम अपनी संस्कृति और सभ्यता का मंत्र मानते हैं, वास्तव में वह हिन्दुत्व का एक सिद्धांत है।

स्वामी विवेकानंद के द्वारा रामकृष्ण मठ की स्थापना की गई। इस मिशन का उद्देश्य क्या है? यह समझ में आ गया, तो हिन्दुत्व को समझना भी सरल हो जाएगा। रामकृष्ण मिशन या मठ के आचार्य हिन्दुत्व को एक जीवन दर्शन के रुप में लेते हैं और इसी रुप में इसका प्रचार करते हैं। कुछ लोगों ने स्वामी विवेकानंद को हिन्दुत्वों की सनातन परंपरा का विरोध करने वाला सिद्ध करने का प्रयास किया। किंतु स्वामी विवेकानंद के ही एक और वक्तव्य से यह सिद्ध हो जाएगा कि वो हिन्दुत्व और हिन्दुओं के बारे में क्या सोचते थे? उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि एक हिन्दू का धर्मांतरण सिर्फ हमारी एक संख्या कम नहीं करता, बल्कि हमारे लिये एक दुश्मन पैदा करता है। मतलब साफ है, वो उन लोगों के घोर विरोधी थे, जो हिन्दू मान्याताओं का विरोध करते हैं, जो हिन्दुत्व को गलत सिद्ध कर, अपने सम्प्रदाय को ही सर्वोच्च बताने का प्रयास करते हैं।

उनके विचारों को यदि मैं अपने शब्दों में परिभाषित करने का प्रयास करुं, तो शायद हिन्दुत्व सबको साथ लेकर चलने का एक प्रयास है, जहां कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। हिन्दुत्व धर्म है और धर्म कर्म होता है, अच्छे कर्म। इसे हम एक आदर्श जीवनपद्धति कह सकते हैं।

हिन्दू राजा सुहेलदेव की वीरता का अपमान करती एक गाजी की दरगाह

उत्तर प्रदेश के बहराइच के राजा रहे सुहेललदेव के बारे में जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि गाजी किसे कहते हैं और बहराइच का हिन्दू धर्म में क्या स्थान है? गाजी एक उपाधि है, जिसे गैर मुस्लिमों पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति को दिया जाता था। अकबर से लेकर जितने भी अत्याचारी मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन व हत्या की उन सभी को गाजी की उपाधि मिली। इन लोगों ने या इनके सेवकों ने हिन्दू बहन बेटियों को अपना गुलाम बनाकर उनके साथ बलात्कार किया और जब मन भर गया, तो हत्या भी कर दी।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार बहराइच वह स्थान है, जहां कभी ब्रह्मा जी ने ऋषियों के साथ तपस्या की थी। उस समय पड़ा नाम बिगड़ते-बिगड़ते आज बहराइच बन गया है। सुहेलदेव इसी बहराइच के वीर हिन्दू राजा थे। उनकी वीरता को समझने के लिये हमें उस गाजी के इतिहास को जानना होगा, जिसको हराकर राजा सुहेलदेव ने अपना नाम हमारे दिलों में अंकित किया।

आपमें से कई लोगों ने महमूद गजनवी के बारे में सुना होगा। जिन लोगों को भी इतिहास का थोड़ा भी ज्ञान हैं, वो गजनवी को एक आक्रांता के रुप में जानते हैं। इसी आक्रांता का भांजा था सैयद सलार मसूद गाजी। वह भारत को मुस्लिम देश बनाना चाहता था। इस उद्देश्य से गाजी 1033 के लगभग सिंध व पंजाब में कत्लेआम करता हुआ, उत्तर प्रदेश तक पहुंचा। यहां उसे राजा सुहेलदेव ने बहराइच में मार गिराया। हिन्दू मान्यता के अनुसार हम मृत्यु के बाद अपने दुश्मन की देह का भी पूरा सम्मान करते हैं। इसी कारण हिन्दुओं का नरसंघार करने के बाद भी गाजी को राजा सुहेलदेव ने ज्ञात इस्लामी मान्यताओं के अनुसार दफना दिया। उनकी इसी उदारता का लाभ आज तक लिया जा रहा है और आगे भी लिया जायेगा।

कुछ समय के बाद तुगलक वंश के राजा फिरोज तुगलक ने हिन्दू महिलाओं के साथ सामुहिक बलात्मकार जैसे कृत्यों को करने वाले सैयद सलार गाजी को इस्लाम का सच्चा अनुसरणकर्ता बता उसका महिलामंडल किया और बहराइच में ही उसकी दरगाह बना दी। इस दरगाह को बनाने के लिये एक प्राचीन सूर्य मंदिर को तोड़कर उसका स्थान चुना गया। यहां भी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात हुआ। आश्चर्य की बात यह है कि हिन्दुओं पर इतने अत्याचार करने वाले गाजी के नाम पर उसी बहराइच में हर वर्ष धार्मिक मेला लगता है, जहां हिन्दू सम्राट सुहेलदेव ने उसे उसके कुकर्मों का दण्ड दिया था।

बहराइच में लगने वाले इस वार्षिक उर्स (इस्लामिक धार्मिक उत्सव या मेला) में उत्तर प्रदेश के साथ ही बिहार से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इनमें से अधिकांश हिन्दू मान्यताओं को मानने वाले लोग होते हैं। इस आक्रांता का तथाकथित हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने वाले इतिहासकारों ने इतना गुणगान किया कि आज हजरत सैयद सलार गाजी उर्स प्रसिद्ध है। यहां हम एक बात और ध्यान दिलाना चाहते हैं कि सलार को पीर या हजरत की उपाधि मिली है, वह इस्लाम में धार्मिक गुरु को दी जाती है। एक हत्यारा और बलात्कारी आज धार्मिक गुरु बन चुका है।

जिस मुस्लिम आक्रांता को सिंध, पंजाब और उत्तर प्रदेश के अन्य राजा-महाराजा नहीं रोक सके, उसे और उसकी पूरी सेना को सुहेलदेव ने मौत के घाट उतार दिया, इससे उनकी वीरता प्रमाणित होती है। उन्होंने अपनी उदारता दिखाते हुए हिन्दू धार्मिक मान्यताओं का परिचय दिया और एक गाजी को कब्र में दफनाया, इससे उन्होंने अपने हिन्दुत्व प्रेम का परिचय दिया। इन सबके बाद भी हमने इस वीर और धार्मिक राजा को क्या दिया? उनकी ही हत्या की मंशा से आए आक्रांता को याद करने के लिये दरगाह और हर वर्ष इस गाजी की याद में, उसका गुणगान करने के लिये उर्स। सुहेलदेव के इस अपमान को हम कैसे सहन कर सकते हैं?

यदि अकबर महान, तो महाराणा प्रताप कौन?

आज के दिन ही 1597 को देश का एक वीर सपूत शहीद हो गया था, जिसे हम महाराणा प्रताप के नाम से जानते हैं। मुगल शासक अकबर की नजर हमेशा से महाराणा प्रताप के साम्राज्य पर थी। अकबर ने महाराणा प्रताप को आधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भी भेजा था, जिसे स्वाभीमानी राजा ने अस्वीकार कर दिया। मुगल सेना ने महाराणा प्रताप को हटाकर उनके राज्य पर कब्जा कर लिया, लेकिन महाराणा ने घास की रोटी खाकर भी संघर्ष जारी रखा। यह स्वाधीनता की लड़ाई थी। इसे हिन्दू-मुस्लिम के नजरिये से न देखे, तो भी एक आक्रांता और स्वाधीनता के लिये संघर्ष करने वाले वीर सपूत की लड़ाई के रुप में तो देख ही सकते हैं। इसके बाद भी अकबर को एक उदारवादी राजा, अजीमोशान शहंशाह जैसे तमाम तबके दिये जाते हैं। इस आक्रांता का महिमामण्डल करते हुए कई आधुनिक भारतीय मिल जाएंगे।

महाराणा प्रताप की वीरता और त्याग के किस्से संभवतः आपने भी सुने या पढ़े होंगे। उनके इस तपोमय जीवन पर कई धारावाहिक और फिल्में भी बनी हैं। इसके बाद भी यदि हमसे कहा जाए कि महाराणा प्रताप और अकबर में से किसी एक का चुनाव करें, तो कुछ तथाकथित देशभक्त अकबर की महानता का बखान करने लगते हैं और उसे शांतिदूत की तरह प्रचारित करते हैं, वहीं महाराणा प्रताप के बलिदान को सत्ता के लिये किया जाने वाला संघर्ष तक बता डालते हैं। यही कारण है कि हम इतिहास के उस पहलु को आपके सामने रखना चाहते हैं, जिसने महाराणा प्रताप को अकबर के विरुद्ध संघर्ष के लिये प्रेरित किया होगा।

जिस तरह आज चीन अपनी विस्तारवादी नीति के लिये जाना जाता है। मुगल शासक भी एक आक्रांता की तरह भारत आये और अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत भारतीय साम्राज्यों को अपने आधीन करने लगे। अकबर उनसे थोड़ा अलग था। उसने यह दिखाने का प्रयास किया था कि वो उदारवादी है, जिससे उसे हिन्दुओं की सहानुभूति और समर्थन हासिल हो सके। इसके बाद उसने हिन्दू राजाओं पर अपने राज्य में शामिल होने के लिये दबाव बनाना शुरु कर दिया। महाराणा प्रताप जैसे महाराजा जिन्होंने अकबर की बात नहीं मानी, उनको युद्ध कर येन-केन प्रकारेण सत्ता से हटा दिया।

हम महाराणा प्रताप को वीर योद्धा और अकबर को आक्रांता क्यों कह रहे हैं? इसको समझने के लिये अकबर के द्वारा लिये गये कुछ निर्णयों की जानकारी होना जरुरी है। अकबर की सेना ने जब वीर योद्धा हेमू को हरा दिया, तब अकबर ने इस निहत्थे वीर का सिर कलम कर उसे काबुल भेज दिया। एक गैर मुस्लिम की हत्या करने के लिये उसे गाजी की उपाधि दी गयी। यह उसकी क्रूरता का पहला उदाहरण कहा जा सकता है। एक निहत्थे युद्धबंदी की हत्या सिर्फ इसलिये क्योंकि उसे गाजी की उपाधि मिल सके।

महिलाओं के बारे में अकबर क्या सोचता था, यह जानना भी जरुरी है। जहां एक ओर अकबर ने 38 राजपूत राजकुमारियों का विवाह मुगल घराने में करवाया, वहीं अनगिनत महिलाओं को गुलामी स्वीकार करने के लिये विवश किया। अकबर को एक विवाहिता रानी दुर्गावती पसंत आ गयी, तो उसने उन्हें हासिल करने के लिये युद्ध की घोषणा कर दी। एक महिला से शादी करने की लालसा रखने के कारण युद्ध करने वाला अकबर किस प्रकार महान हो सकता है। दूसरी ओर मुगल महिलाएं खानदान से बाहर शादी न कर सकें, इसके लिये नियम सबसे पहले अकबर ने ही बनाया था। यदि गतली से किसी मुगल महिला ने हिन्दू युवक से प्रेम कर लिया, तो उसकी सजा सिर्फ मौत होती थी।

ऐसा नहीं है कि अकबर की क्रूरता का शिकार हिन्दू राजा ही हुए। जब अकबर ने बंगाल का रुख किया, तो वहां इतना कत्लेआम किया कि एक मीनार कटे सिरों की बन जाये। वहां के तत्कालीन राजा दाऊद खान ने मरने से पहले जब पानी मांगा, तो अकबर ने उसे जूते में भरकर पानी दिया। अकबर मृत्यु के बाद भी भारत सदियों तक गुलाम बना रहा। इस कारण अकबर की क्रूरता की ज्यादातर कहानियां कभी सबके सामने नहीं आ पायीं। कई इतिहासकारों ने स्वयं को सेक्युलर साबित करने के लिये अकबर को महान बताना शुरु कर दिया। महराणा प्रताप जो अकबर के समकालीन थे, उन्हें इन सभी बातों की जानकारी थी, यही कारण रहा कि वो जीवनभर हिन्दुओं को अकबर के अत्याचारों से बचाने के लिये संघर्ष करते रहे और अपने प्राणों की आहुति दे दी।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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