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खेल दिवस : ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से अब आशा जगा रहे हैं खेल

डॉ०  घनश्याम बादल

आज देश हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती खेल दिवस के रूप में मना रहा है तो मौका है कि हम आत्ममंथन करके खेलों के विकास के लिए सोचें व कुछ बड़ा करें। इस बार टोक्यो ओलंपिक में भारत में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके 7 पदक प्राप्त किए और स्वर्ण रजत तथा कांस्य तीनों तरह के पदक जीतने में इस बार हम  कामयाब रहे हैं । पर 140 करोड़ लोगों के दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश के लिए क्या महज 7 पदक पर्याप्त कहे जा सकते हैं?

एक तरफ हम दुनिया की छठी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गए हैं पर खेलों में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। एक तरफ दुनिया में क्यूबा , कोरिया, जापान , बुल्गारिया, रोमानिया, इटली ही नहीं वरन् कई छोटे – छोटे व गरीब देश हैं जो भारत से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं । वहीं ओलंपिक व विश्व खेलों में अमेरिका , चीन , रूस व ब्राजील जैसे देश खेल जगत की विश्वशक्ति बने हुए हैं पर हम कहां हैं ?

नज़रिए ने बिगाड़ा ‘खेल’:

हम पिछले तीन ओलंपिक या शुरु के कुछ ओलंपिक खेलों में ज़रुर गिनती के पदक जीत सके हैं अन्यथा तो हम खेलों में हम फिसड्डी देश के रूप  ही जाने जाते रहे हैं । पर ,एक मज़ेदार बात यह भी है कि हम भले ही फिसड्डी रहे हों पर हमारे पास हॉकी के जादूगर , क्रिकेट के भगवान , बैडमिंटन के विश्व चैंपियन , युगल टेनिस के विंबलडन विजेता, स्नूकर व बिलियर्ड के वर्ल्ड चैंपियन भी रहे हैं यानि व्यक्तिगत स्तर पर हमने काफी उपलब्धियां पाई भी हैं पर, एक देश के रूप में खेलों में हम बेहद पीछे खड़े दिखते हैं । खेलों के प्रति हमारा नज़रिया ही इस क्षेत्र में दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण रहा है । हमारे यहां तो ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ,खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ की कहावत रही है , रोजी रोटी कमाने में खेल यहां यूजलेस माने जाते रहे हैं , जिसके चलते खिलाड़ी होने का मतलब नालायक होना बन गया , ऊपर से खर्चे की मार ने खेलों कों उपेक्षित कर दिया ।

मानसिकता तो बदल रही है पर

पर , अब ऐसा नहीं है । पढ़-लिखकर भले ही नवाब न बन पाएं पर अगर आप खेलों  में चमक गए तो फिर तो आपकी बल्ले बल्ले है। आज खेलों में शौहरत पैसा , इज्जत तो हैं ही एक सोशल स्टेटस तथा सेलिब्रेटी का रुतबा भी है । ज़ाहिर जब इस क्षेत्र में इतना कुछ है तो युवा पीढ़ी खेलों में कैरियर बना रही है । इसके चलते अब मां बाप की सोच में भी परिवर्तन आ रहा है वें भी बच्चों के अब केवल पढ़ाई के पीछे भागने पर जोर नहीं देते बल्कि अपने होनहार बच्चे में सचिन , विराट , वाइचुंग भुटिया , मैरीकोम , मिताली या जसपाल अथवा अभिनव बिंद्रा , सायना, बिजेंद्र सिंह , राजवर्धन सिंह राठौर  और सानिया देख रहे है। यकीनन इससे खेलों की दुनिया का स्कोप बढ़ा है । पर , अब भी हमें खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए बहुत कुछ करना होगा ।

कूटनीति के शिकार होते परंपरागत खेल:

बेशक , क्रिकेट में हम आज एक आइकॉन हैं , एक समय राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद बर्बाद हो चुकी हॉकी भी पिछले दिनों से आस जगा रही है । लेकिन जिस तरह से हमारे परंपरागत खेल यूरोपीय देशों की कूटनीति के शिकार हो कर अंतर्राष्ट्रीय , ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलो सें से गायब हो रहे हैं उससे जूझने के लिए हमें जागना और अड़ना लड़ना होगा ।

चाहिएं समर्पण ईमानदारी:

आज कई खेलों के खिलाड़ी काफी अमीर और लोकप्रिय हैं , अब खेलों में पैसे की भी कमी नहीं है , पर, राजनीति , पक्षपात पूर्ण चयन , क्षेत्रीयतावाद व दूसरी अनेक वजहों से खराब प्रदर्शन भी जारी  है । आज खेलों के लिए उचित योजना , नीति , समर्पण व ईमानदार प्रयासों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है ।  अभी भी स्कूल स्तर पर हमें अच्छे खिलाड़ी तराशने का लक्ष्य हासिल करना बाकी है । आज भी अधिकांश स्कूलों का लक्ष्य अच्छी किताबी शिक्षा देना ही है जिसका मतलब छात्रों के लिए केवल अच्छे अंक ,प्रतिशत या ग्रेड़ तक सीमित है वें उसी में अपना भविष्य तलाशते हैं, यहां योग्यता का अर्थ केवल एकेडेमिक एक्सीलेंस बन गया है क्योंकि उसी से कैरियर बनता या बिगड़ता है , उच्च पदों से पैसा कमाने का सीधा संबंध है । जबकि खेल व खिलाड़ी केवल मनांरजन करने के सबब समझे जाते हैं , खेलों के बल पर रोजगार पाने वाले बिरले ही भाग्यशाली निकलते हैं अन्यथा आज भीे खेलों में खिलाड़ी युवावस्था गुजरते ही गरीबी , बेरोजगारी , अभावों के अंधेरे में खोने को विवश हैं । उस सोच व हालातों का बदलना होगा अगर खेल में भारत को महाशक्ति बनना है तो ।

कैच देम यंग:

अगर खेलों को बढ़ावा देना है तो हमें नाइजीरिया, ताइवान, जमैका , क्यूबा , मैक्सिको व गरीब अफ्रीकी देषों के खेल स्ट्रक्चर को अपनाना होगा। वहीं खेेलों के लिए अमेरिका , चीन , जापान , जर्मनी , व यूरोपीय देषों जैसी सुविधाएं जुटानी होंगी । अगर हम अधिक जनसंख्या को अपनी कमजोरी न बनाकर उसे ताकत में तब्दील कर पाएं हम भी विश्व में खेल ताकत के रूप में उभर सकते हैं । खेलो में आगे आने का अचूक मंत्र है ‘कैच देम यंग’ यानि छोटी उम्र में ही खेलों में रुचि रखने वाले , स्वस्थ व दृढ़ इच्छाशक्ति वाले बच्चों को चुनना , उन्हे योग्य प्रशिक्षकों से अच्छे से अच्छा प्रशिक्षण दिलवाना , सुविधाएं मुहैया कराकर अच्छा कैरियर विकल्प देना होगा। रोजगार की गारंटी भी खेलों की दुनिया में प्रतिभाशाली बच्चों को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहती है । इस नीति की कामयाबी के लिए जरुरी है कि शिक्षा में खेलों का ‘वेटेज अकादमिक के बराबर रहे । बच्चे का मूल्यांकन करते वक्त खेल में उसके योगदान व उपलब्धि का महत्व बढाना होगा । और कैच देम यंग की पॉलिसी पर चलना होगा ।

प्रोत्साहन रोजगार आवश्यक :

हमें उम्दा व विश्व स्तरीय अकादमियां बनाने के साथ ही एक उन्हे दूसरे से ‘लिंक अप’ करना होगा ।  ऐसे संस्थान बनाने होंगें जो दूसरे संस्थान से आए युवा खिलाड़ियों की मदद व प्रशिक्ष्ण दें । खेलों में खास उपलब्धि वाले बच्चों को विद्यालय , क्लस्टर , संभाग , व राष्ट्रीय स्तर पर नकद पुरस्कार भी उन्हे प्रोत्साहित करेंगें । । इस क्षेत्र में पुराने व अनुभवी खिलाड़ियों की सेवाएं लेने से उन्हे भी रोजगार मिलेगा व बच्चों का अच्छे व अनुभवी कोच उपलब्ध होंगें । खेलों सबसे महत्व पूर्ण है स्टेमिना व मानसिक दृढ़ता और भारत के गांवों में मज़बूत शरीर के बच्चे आसानी से उपलब्ध हैं ।  वहां की कठिन परिस्थितियों के चलते वें मानसिक रूप से भी दृढ़ होतें हैं इस नज़र से देखें तो आज भी भारतीय खेलों का भविष्य गांवों में छुपा है । बस, वहां से प्रतिभाएं  ढूंढने व पहचानने की ज़रुरत है । वैसे शहरों में भी कम खेल प्रतिभाएं नही हैं वहां से भी प्रतिभाशाली बच्चों को कम उम्र में ही पहचान कर उन्हे अच्छी कोचिंग देने से भी खेलों को एक नई जान व ऑक्सीजन मिलेगी ।

 

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं.

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