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केरल में चर्च द्वारा ईसाई जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कार

– डॉ. प्रेरणा चतुर्वेदी

केंद्र सरकार देश में ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ लागू करना चाहती है ,क्योंकि देश के सीमित संसाधनों के बीच ‘जनसंख्या विस्फोट’ आंंतरिक राष्ट्रीय खतरा बनकर उभरता जा रहा है । ऐसे में उत्तर प्रदेश और असम सरकार जनसंख्या नियंत्रण पर कठोर कानून बनाने की जोर -शोर से तैयारी भी कर रही है । वहीं केरल राज्य में चर्च द्वारा  जनसंख्या वृद्धि का आह्वान राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति एक गंभीर खतरा बन कर उभर सकता है। भारत में ईसाई धर्म को अल्पसंख्यक माना गया है । पूरे देश में जहां इसका अनुपात 2.30% है वहीं केरल में इसका अनुपात 18.38 प्रतिशत है । ज्ञातव्य है कि, भारत में केरल ही वह पहला राज्य है ,जहां सबसे पहले ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ और इस्लाम बाद में । केरल में 300 वर्ष पूर्व 99% हिंदू थे। वहीं आज 55% से भी कम हिंदू हैं। 16वीं सदी में पुर्तगालियों के साथ आए रोमन कैथोलिक धर्म प्रचारकों के माध्यम से उनका सम्पर्क पोप के कैथोलिक चर्च से हुआ। परन्तु भारत के कुछ ईसाईयों ने पोप की सत्ता को अस्वीकृत करके ‘जेकोबाइट’ चर्च की स्थापना की।

केरल में कैथोलिक चर्च से संबंधित तीन शाखाएं दिखाई देती हैं। सीरियन मलाबारी, सीरियन मालाकारी और लैटिन- रोमन । कैथोलिक चर्च की लैटिन शाखा के भी दो वर्ग हैं- गोवा, मंगलोर, महाराष्ट्रियन समूह, जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था, तथा तमिल समूह अपनी प्राचीन भाषा-संस्कृति से जुड़ा रहा। काका बेपतिस्टा, फादर स्टीफेंस (ख्रीस्ट पुराण के रचयिता), फादर दी नोबिली आदि दक्षिण भारत के प्रमुख ईसाई प्रचारक थे । अभी हाल ही में केरल में एक कैथोलिक गिरजाघर ने 5 या उससे अधिक बच्चों वाले परिवार के लिए आर्थिक और शैक्षिक, स्वास्थ्यकारी -कल्याणकारी योजनाओं द्वारा लाभ देने की बात कही है  ।केरल में इस समुदाय को बढ़ावा देने के लिए केरल के कोट्टायम जिले के सिरो -मालाबार कैथोलिक गिरजाघर के पाला डायोसिस के फैमिली अपोस्टोलेट के अनुसार –‘ईयर ऑफ द फैमिली सेलिब्रेशन’ के तहत गत सोमवार को बिशप जोसेफ कलरंगट की ऑनलाइन बैठक में इससे संबंधित घोषणा की गई । फैमिली अपोस्टोलेट के फादर कुट्टियानकल ने बताया कि ,—“आर्थिक मदद अगस्त से शुरू की जा सकती है” ।

इसके तहत 5 या अधिक बच्चों वाले परिवार को हर महीने 1500 रुपये दिए जाएंगे और यह सुविधा वर्ष 2000 के बाद शादीशुदा जोड़ों को ही मिलेगी । इसमें  कहा गया कि ईसाई परिवार में चौथे बच्चे के जन्म पर मुफ्त इलाज दिया जाएगा ।साथ ही चर्च इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्रों को छात्रवृत्ति भी देगा। ईसाई समुदाय को इस प्रकार की कल्याणकारी योजना का लाभ देने के पीछे इसका तात्कालिक लक्ष्य महामारी से प्रभावित परिवारों को मदद पहुंचाना बताया जा रहा है। किंतु निश्चय ही इसका दीर्घकालिक लक्ष्य जनसंख्या वृद्धि कर देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा  के प्रति खतरा और ईसाई समुदाय द्वारा सरकार पर धर्मगत नियंत्रण करना है । किंवदंतियों के अनुसार ,केरल के तटीय नगर क्रांगानोर में ईसा मसीह के 12 शिष्यों में से एक सेंट थॉमस ईस्वी सन् 52 में यहां पहुंचे  और सर्वप्रथम कुछ ब्राह्मणों को ईसाई बनाया । तत्पश्चात वहां के आदिवासियों को धर्मांतरण किया। भारत में प्रोटेंस्ट धर्म का आगमन सन् 1706 में हुआ । ब्रिटिश काल में दक्षिण भारत ,पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई धर्म के लाखों प्रचारकों ने सरकारी सहायता द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य के बहाने ईसाई धर्म को फैलाया ।

स्वतंत्रता पश्चात सेवाभाव की आड़ में मदर टेरेसा उर्फ अगनेस गोंझा बोयाजिजू ने गरीबों की सहायता और इलाज के बहाने संस्था की स्थापना करके बड़ी संख्या में धर्मांतरण किया । सरकारी तंत्र से भी व्यापक रूप से ईसाई धर्म प्रचार को सहायता मिली ।आज अरुणाचल प्रदेश में 30% ईसाई, नागालैंड में 93%, मिजोरम में 90% , त्रिपुरा में 98% मणिपुर में 48% और मेघालय में 70% हिंदू धर्मांतरित होकर ईसाई बन चुके हैं । चंगाई सभा ,धनबल और सेवा का मायाजाल फैलाकर भारत में ईसाई धर्म फैलाया जा रहा है । आज उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब में बड़े पैमाने पर हिंदुओं का धर्मांतरण जारी है । विदेशी पैसों से धर्मांतरण देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा बनता जा रहा है। यद्यपि भारतीय संविधान में धार्मिक जनता का उल्लेख है । जिसमें निज धर्म का प्रचार -प्रसार भी सम्मिलित है । लेकिन इस अधिकार की सीमाएं भी हैं, जो धर्मांतरण कर रहे लोगों को समझ नहीं आ रहा ।

सन 1954 में ‘इंडियन कनवर्जन( रेगुलेशन एंड रजिस्ट्रेशन) बिल पेश किया गया। सन 1960 में पिछड़ा समुदाय (धार्मिक संरक्षण) विधेयक लाया गया। जिसका उद्देश्य हिंदुओं को गैर भारतीय धर्म में परिवर्तित होने से रोकना था । सन 1979 में ‘फ्रीडम आफ रिलिजन’ बिल द्वारा मतांतरण पर अधिकारिक प्रतिबंध की बात की गई। लेकिन इनमें से किसी भी बिल पर लोकसभा में बहुमत नहीं मिल सका । फलत: आज देश में तेजी से धर्मांतरण का कार्य चल रहा है । जिसके शिकार बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति ,आदिवासी, जनजाति आदि के गरीब तबके के लोग हो रहे हैं।

लेखिका वाराणसी की वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं.

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