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उ.प्र. में शुरु हुई तुष्टीकरण की साम्प्रदायिक राजनीति

– सारांश कनौजिया

उत्तर प्रदेश के चुनाव में साम्प्रदायिकता और जातिवाद हावी रहता है। 2014 और 2019 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो लगा कि अब इस बुरे दौर से छुटकारा मिल जायेगा। दूसरी बार भले ही उत्तर प्रदेश से भाजपा को कम सीटे मिली हों, लेकिन कई ऐसे प्रत्याशी भी जीते जिनकी जीत का श्रेय सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी की नीतियों को ही जाता है। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किये बिना ही जो जीत मिली, उससे ऐसा लगा कि लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव से भी साम्प्रदायिक राजनीतिक का अंत हो गया है। भाजपा को ऐसे लोगों ने भी वोट दिया है, जिनके संप्रदाय पर दूसरे दल दावा करते रहे हैं। किंतु इस बार अभी चुनावी तारीखों का ऐलान हुआ भी नहीं है और तुष्टीकरण के प्रयास शुरु हो चुके हैं।

कुख्यात अपराधी मुख्तार अंसारी के बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी ने हाथी को छोड़कर साइकिल की सवारी करने का निर्णय लिया। समाजवादी पार्टी प्रमुख पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में सिबगतुल्लाह अंसारी ने बसपा छोड़कर सपा में वापसी कर ली। किसी व्यक्ति का एक दल को छोड़कर दूसरे में जाना नया नहीं है। जैसे-जैसे चुनाव निकट आयेंगे, यह क्रम और तेज होगा। सभी राजनीतिक दलों में कई असंतुष्ट नेताओं को पार्टी से बाहर किया जायेगा। यह भारतीय राजनीति के लिये कोई विशेष बात नहीं है। इसके बाद भी मैं चिंतित हूं। मेरी चिंता का कारण इस अंसारी परिवार के द्वारा समय-समय पर दिये जाने वाले बयान हैं।

मुख्तार और सिबगतुल्ला पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के भतीजे हैं। हामिद कांग्रेसी नेता हैं। मुख्तार को भी कांग्रेस का नजदीकि माना जाता रहा है। इसी कारण पंजाब की कांग्रेस सरकार ने हर संभव प्रयास किया था कि मुख्तार को उत्तर प्रदेश की जेल में वापस न जाना पड़े। सिबगतुल्लाह के ताजा बयान का विश्लेषण करने से पहले हामिद अंसारी के बयानों को देखना जरुरी है। इससे पता चलेगा कि इस अंसारी परिवार की जो पीढ़ी राजनीति में आई, उसका दृष्टिकोण कैसा है? हामिद असंारी आक्रामक राष्ट्रवाद को कोरोना से बड़ी बीमारी बता चुके हैं। उनके अनुसार भारत मुस्लिमों के रहने के लिये असुरक्षित स्थान है। उनको योग और वंदेमातरम् से नफरत है क्योंकि कई इस्लामिक कट्टरपंथी इसे हराम मानते हैं। हामिद असंारी को भारत में सरीयत अदालते चाहिए हैं। उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर लगे होने में कुछ भी गलत नहीं लगता। इससे भी बड़ी खास बात यह है कि इस्लामिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाले ज्यादातर बयान उन्होंने उप राष्ट्रपति रहते हुये दिये।

मुख्तार अंसारी एक समय संगठित अपराध का दूसरा नाम बन चुका था, योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद उसके अपराध पर लगाम लगना शुरु हो गयी। उसके शिकार हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे। किन्तु उसकी पहचान एक मुस्लिम नेता के रुप में है। इसका एक कारण यह था कि उसके नाम पर अपराध जगत में सक्रिय अधिकांश लोग मुस्लिम संप्रदाय से ही हैं। यही कारण है कि जब योगी सरकार ने मुख्तार और उसके गुर्गों पर कार्रवाई करनी शुरु की तो इसे मुस्लिमों के विरुद्ध षणयंत्र भी बताया गया। तब यह तर्क नहीं चल पाया। क्योंकि कई मुस्लिम पीड़ित भी सामने आये जो मुख्तार पर शिकंजा कसे जाने से प्रसन्न थे, लेकिन अब उसके भाई सिबगतुल्लाह के सपा में शामिल होने से एक बार फिर मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर नफरत की राजनीति शुरु होने की संभावना बन गयी है।

भारत में लंबे समय से सेक्युलरिज्म का मतलब हिन्दुओं का विरोध रहा है। सिबगतुल्लाह ने सपा के साथ जाते ही सबसे पहले जो बयान दिया वह था कि प्रदेश से फांसीवादी ताकतों को उखाड़ फेंकने की ताकत सिर्फ समाजवादी पार्टी में है। यहां फांसीवादी ताकतों से उनका सीधा तात्पर्य हिन्दुत्व के लिये कार्य करने वाले संगठनों से है। यह जुबानी बयानबाजी चुनाव निकट आते-आते और तेज होगी। तुष्टीकरण के सहारे भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिये सेक्युलरिज्म शब्द का प्रयोग भी बढ़ेगा और सबके निशाने पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से हिन्दू ही होगा। इस तहर सेक्युलरिज्म के नाम पर साम्प्रदायिक तुष्टीकरण की बातें हर गुजरते दिन के साथ सौहार्द का माहौल खराब करेगी।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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