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लालित्य एवं शौर्य का संगम हैं, पूर्ण पुरुष पुरातन श्री कृष्ण

– डॉ० घनश्याम बादल

 श्रीकृष्ण कौन हैं, क्या हैं,  कैसे हैं,  साकार हैं या निराकार भी हैं ? आखिर कृष्ण का उद्भव क्या है ? कृष्ण हैं भी या केवल कपोल कल्पना मात्र  हैं ?   कृष्ण जन्माष्टमी के साथ ऐसे बहुत से प्रश्न मन – मस्तिष्क में उभरते हैं और हमारे सामने कृष्ण की अनेक छवियां, रूप ,  रंग – ढंग उभरने लगते हैं।

बहुरूपी, बहुआयामी कृष्ण :

अधिकांश लोगों को कृष्ण, देवकी और वसुदेव की संतान मात्र लगते हैं , जिनका लालन-पालन गोकुल के नंद की पत्नी यशोदा ने किया।  जिन्होंने गोकुल में जी भर कर बाल – लीलाएं की ,जो बरसाने की राधा पर इस कदर रीझे की स्वयं राधा बनने को तत्पर हो गए, जिन्हें गोपियों के माखन से लेकर वस्त्र चुराने तक एक लौकिक आनंद प्राप्त करने में बड़ा आनंद आता था पर, कृष्ण केवल इन्हीं रूपों तक सीमित नहीं हैं,  इनके अतिरिक्त भी उनके और बहुत से रूप हैं।

लालित्य एवं शौर्य के संगम :

कृष्ण एक ऐसे पौधे की तरह हैं जो उगता कहीं और है,विकसित कहीं और होता है तथा अंत में अपनी जड़े कहीं और फैलाकर अपनी इहलीला समाप्त कर गोलोक वासी हो जाता है। कृष्ण का एक रूप  धीरोद्दात नायक का है जिसमें लालित्य व मस्ती है,  जो श्रंगारिक भावों से संपृक्त है तो दूसरा रूप एक महायोद्धा का है और उनका योद्धापना किसी एक  कालखंड में नहीं समाया है। वह शैशवावस्था में ही राक्षसी पूतना का वध कर देते हैं। यमुना में छिपे कालिया नाग का मान – मर्दन करते हैं।

शकटासुर का वध करते हैं और इतना ही नहीं 10 वर्ष 2 माह 20 दिन के होते – होते अविजेय माने जाने वाले अपने मामा कंस का ही वध नहीं करते अपितु उसके अनेक मल्ल, पहलवानों एवं मायावी राक्षसों को भी यमलोक पहुंचा देते हैं और मथुरा से द्वारिका जाने के बाद  चक्रवर्ती राजा बन अनेक दुष्ट राजाओं एवं  योद्धाओं का मान मर्दन ही नहीं करते अपितु उनका वध भी करते हैं। कृष्ण का पराक्रम शिशुपाल वध से और भी अधिक निखर कर सामने आता है लेकिन कृष्ण केवल योद्धा मात्र नहीं हैं।  वह चतुर राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक व  व्यवहारिक शासक होने के साथ-साथ दुष्ट हंता एवं धर्म के रक्षक भी हैं। वह अपने  मित्रों ,बंधु बांधवों का हर तरीके से रक्षण करते हैं। स्त्रियों के मान की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की बाजी तक  लगा देते हैं तो वहीं उन्हें जबरदस्ती अंकशायिनी बनाने वालों को धूल चटाते हैं।

नव परंपराओं के प्रवर्तक :

कृष्ण नई परंपराओं एवं नीतियों के प्रवर्तक भी  हैं।  वें केवल सिद्धांतवादी, आदर्शवादी नायक बनकर नहीं रहते अपितु जब जैसा करके कार्य की सिद्धि हो वैसा ही कदम उठाते हैं। मौका मिलने पर वें रुक्मणी का अपहरण भी करते हैं एवं जब जान पर बन आए तो रणछोड़ कर भाग भी जाते हैं।

हर कार्य के पीछे है एक प्रयोजन :

कृष्ण के कितने रूपों को किस तरह से वर्णित किया जाए !  वें अनंतरूपी हैं, उनकी माया अगम्य  है। उनके एक – एक शब्द एवं कार्य में कोई रहस्य एवं भविष्य की योजना छिपी रहती है। कृष्ण निरर्थक कोई भी कार्य नहीं करते।  एक शब्द भी बिना प्रयोजन नहीं बोलते यदि वें बंसी भी बजाते हैं तो उसमें भी एक गहरा रहस्य होता है।  एक ओर जहां अपनी बंसी से वह ग्वालों का मनोरंजन करते हैं, गोपियों को लुभाते हैं वहीं शौर्य के साथ मधुरता एवं लालित्य का संदेश भी देते हैं। कृष्ण एक गौपालक के रूप में भी अपना कार्य उत्कृष्टता के साथ करते हैं। उनका गौ-पालन केवल तात्कालिक प्रयोजन सिद्धि का कार्य नहीं है अपितु गौ – रक्षा एवं गौपालन के द्वारा भी वे एक भविष्य निर्माण एवं अर्थव्यवस्था की संपुष्टि का विराट संदेश बहुत सादगी के साथ दे जाते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से कृष्ण :

यह तो था कृष्ण के बहु आयामी व्यक्तित्व का एक रूप है। अब कृष्ण को आध्यात्म की दृष्टि से देखें तो भी कृष्ण भव्य एवं दिव्य होकर सामने आते हैं । कृष्ण महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन के मोहभंग के लिए श्रीमद्भागवत गीता का ऐसा उपदेश देते हैं जो सर्वकालिक एवं सर्वहित का अमृत बनकर जन – जन एवं कण-कण में समा जाता है। कृष्ण आत्मा की अजरता एवं अमरता को इतनी सरलता से प्रतिपादित करते हैं कि उनसे पहले और उनके बाद कोई और ऐसा नहीं कर पाया।  जब पार्थ मोह वश अपने बंधु – बांधवों एवं अग्रजों के लिए मोहासक्त एवं शोक संतप्त दिखते हैं तब कृष्ण उन्हें

 नैनं छिंदंति शस्त्राणि नैनंदहति पावक: नैनं शोषयति मारुत:” का दिव्य ज्ञान देकर उनके अंतर्चक्षु खोल देते हैं। कृष्ण “यदायदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, तदात्मानं सृजाम्यहम् कहकर धर्म की रक्षा की ध्वजा को ऊंचा करते हैं। कृष्ण धर्म संस्थापनार्थाय के साथ-साथ विनाशाय दुष्कृतां का सिद्धांत भी प्रतिपादित करते हैं।

देते हैं शाश्वत संदेश :

कृष्ण वेशभूषा से लेकर खान-पान तक सब में सात्विकता का शाश्वत संदेश देते हैं। उनकी वेशभूषा एवं खानपान में सादगी है तो उनके स्वर्ण मुकुट में भव्यता भी है। एक तरह से देखें तो कृष्ण सादगी में भव्यता का अद्भुत समावेश है। सिर का मोर मुकुट प्राणी जगत को सम्मान देता है तो ओंठो की बांसुरी संगीत के प्रति उनके अनुराग की प्रतीक है , वहीं सुदर्शन चक्र नवोन्मेषी शस्त्र आविष्कार का संदेश है। यदि कृष्ण को स्थूल के बजाय सूक्ष्म रूप में वर्णित किया जाए तो कृष्ण वायवीय हो जाते हैं। वह मन – धर्म, दर्शन , अध्यात्म एवं योग का एक कल्याणकारी संम्मिश्रण दिखते हैं। कृष्ण द्वैत भी हैं एवं अद्वैत भी, वें साकार भी हैं एवं निराकार भी।

कृष्ण यानी  नैतिनैति :

यदि संक्षेप में कहा जाए तो कृष्ण योगी भी हैं और छलिया भी हैं और विश्वसनीय भी हैं।  वह 16 कलाओं से युक्त एक संपूर्ण नायक के रूप में अपने भक्तों को लुभाते हैं तो उनका विराट स्वरूप दुष्टों को दहलाता है। वें माता यशोदा को अपने मुख में ही ब्रह्मांड का दर्शन करा देते हैं। अर्जुन को विराट स्वरूप से अभिभूत करते हैं तो इसी रूप से दुर्योधन भैयाक्रांत भी करते हैं। कृष्ण को जितना बांचा जाए उतने ही निर्वाच्य हो जाते हैं। पूर्ण पुरुष पुरातन कृष्ण को दो शब्दों में कहें तो  यें दो शब्द हैं “नैति – नैति”।

 

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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