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कश्मीर से कन्याकुमारी तक : कांग्रेस में धधकी बगावत की ज्वाला

– बाल मुकुन्द ओझा

देशभर में कांग्रेस पार्टी सिर फुटव्वल, बगावत और आपसी विवादों से बुरी तरह जूझ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लोहा लेने का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी का अपना घर कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगातार बिखरता जा रहा है, फिर भी दाद दी जानी चाहिए उसके प्रवक्ताओं को जो न्यूज़ चैनलों पर दहाड़ने से बाज़ नहीं आ रहे है। राजस्थान, छतीसगढ और पंजाब में कांग्रेस सत्तारूढ़ है मगर इन राज्यों में विद्रोह की ज्वाला धधक रही है। अन्य राज्यों में भी कोई बेहतर स्थिति नहीं दिख रही। बंगाल में पहले ही सूपड़ा साफ़ हो चुका है। असम में पार्टी नेता घर छोड़कर भागते नजर आ रहे है।

हरियाणा में पूर्व मुख्यंमत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस प्रमुख कुमारी शैलजा की लड़ाई आमने सामने है। केरल, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार ,कर्नाटक, जम्मू कश्मीर, गुजरात, मध्य प्रदेश, गोवा और यूपी आदि राज्यों में कहीं भी स्थिति सुखद नहीं है। लगता है कांग्रेस ने अपने जूतमपैजार और कमजोरियों से अभी तक कोई सबक नहीं सीखा है। राजस्थान का विवाद कांग्रेस आलाकमान आज तक निपटा नहीं पाया है। इसी बीच पंजाब और छत्तीसगढ़ में बगावत के शोले फूटने लगे है। पंजाब कांग्रेस की आपसी कलह थमने का नाम नहीं ले रही है।

प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा, ’अगर आपने मुझे निर्णय नहीं लेने दिया तो मैं ईंट से ईंट बजा दूंगा।’ यह इशारा किस तरफ है, यह आसानी से समझा जा सकता है। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं जिनमें कैप्टन अमरिंद्र सिंह की अगुवाई में कांग्रेस की आसान जीत की भविष्यवाणी की जा रही थी। सिद्धू  के प्रदेश अध्यक्ष बनते ही अनुशासन की धज्जिया उड़ने लगी और उनके सलाहकारों ने सारी सीमा लांघ दी। अब तो कांग्रेस आलाकमान को भी ऑंखें दिखाई जाने लगी है।

वहीं छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भारी उथल-पुथल मची है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव एक दूसरे के खिलाफ तलवारे खींच रहे है। मामला दिल्ली दरबार में पहुँच गया है मगर संकट हरण के आसार नज़र नहीं आ रहे है। बताया जाता है कांग्रेस आलाकमान ने सिंह देव को  बड़ा मंत्रालय देने का ऑफर दिया, लेकिन बघेल की जगह उन्हें मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपना संभव नहीं हो पा रहा है।

राजस्थान की लड़ाई जग जाहिर है। यहाँ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने असंतुष्ट नेता सचिन पायलेट को नाको चने चबा रखे है। सचिन सत्ता में भागीदारी चाहते है मगर गहलोत देना नहीं चाहते। राजस्थान का झगड़ा कांग्रेस आलाकमान लाख चेष्टा के बाद भी सुलटा नहीं पा रहा है और विवाद बजाय कम होने के लगातार बढ़ता ही जा रहा है। असंतुष्टों ने आरोप लगाया है की राहुल और प्रियंका ने जो आश्वासन दिए थे वे अब तक पूरे नहीं हुए है। गहलोत बनाम सचिन का विवाद बजाय निपटने के बढ़ता ही जा रहा है जिसकी आंच राहुल और प्रियंका को भी झुलसाने लगी है।

कांग्रेस पार्टी दो वर्षों से नेतृत्व विहीन है। सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी को जैसे तैसे चलाने में लगी हैं। राहुल गाँधी अपनी गाड़ी अलग खींच रहे है। कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक असंतोष की ज्वाला भड़क रही है। गुटबाजी अपने चरम पर है। ग्रुप 23 का झगड़ा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। गुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल आदि नाराज़ नेता पहले से ही अलग थलग पड़े है। देशभर में नेताओं और कार्यकर्ताओं में एक अजीब सी बेचैनी छाई हुई है।

पार्टी इस संकट से कैसे उभरे इस पर मंथन हो रहा है। सभी नेता अपने अपने तरीके से सोच रहे है। कुछ का मानना है अब समय आगया है पार्टी को वंशवाद से मुक्ति का। कुछ अन्य सोच रहे है गाँधी परिवार से कोई नेतृत्व नहीं करेगा तो पार्टी  बिखर जाएगी। पार्टी के खेवनहार असमंजस की स्थिति में फंसे है। ऐसे में मोदी की खिलाफत दूर की कोड़ी साबित हो रही है। सोशल मीडिया के भरोसे कागजी घोड़े दौड़ाये जा रहे है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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