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तुर्की में फिर शुरु हुआ खलीफा और गाजी विचारधारा के विरुद्ध विद्रोह

– सारांश कनौजिया

तुर्की की खलीफा और गाजी विचारधारा एक बार फिर सर उठा रही है। जब तक यह विचारधारा दूसरे देशों को कट्टर इस्लामिक मान्यताओं के आधार पर चलाने का प्रयास कर रही थी, विरोध कम था, लेकिन जैसे ही इस विचारधारा ने बदले हुये तुर्की के मानवाधिकारों को नुकसान पहुंचाना शुरु किया, इसका विरोध भी तेज होने लगा है। ताजा मामला महिलाओं के अधिकारों के हनन का है। उनके मानवाधिकारों को कुचलने का है।

टर्की या तुर्की की वर्तमान समस्या को समझने के लिये पहले खलीफा और गाजी विचारधारा को समझना होगा। साथ ही जो लोग मानते हैं कि वर्तमान विवाद तुर्की का आंतरिक मामला हैं, उन्हें इस घटना से भारत पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को भी समझना होगा। एक समय ऐसा था, जब तुर्की के प्रमुख को खलीफा माना जाता था। इस्लामिक मान्यताओं पर विश्वास रखने वालों में खलीफा को वही सम्मान प्राप्त था, जो ईसाई समुदाय में पोप को। किंतु इसका एक काला पहलू भी था। कट्टर इस्लामिक मान्यताओं को मानने के कारण, खलीफा उन सभी को समाप्त करना चाहता था, जिनकी आस्था इस्लाम में नहीं थी। इस इस्लामिक मान्यता को मानने वाले जो आक्रांता भारत आए, उन्हें हिन्दुओं की हत्या के लिये गाजी की उपाधि देकर सम्मानित किया गया। अकबर ने जब निहत्थे हिन्दू राजा की हत्या कर दी थी, तब उसे गाजी की उपाधि मिली थी।

जब हिन्दुस्थान में क्रांतिकारी भारत माता को आजाद कराने के लिए संघर्ष कर रहे थे, उसी समय तुर्की में इस घातक खलीफा विचारधारा का विरोध हो रहा था और एक समय इस्लाम को मानने वाले ही कुछ सुधारकों ने खलीफा को तुर्की छोड़ने के लिये मजबूर भी कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि खलीफा विचारधारा ईसाई समुदाय के लिए भी परेशानी का कारण बन गयी थी, इसलिये इस्लामिक सुधारकों को अंग्रेजों ने समर्थन दिया था। यही कारण है कि पूरे विश्व में खलीफा के समर्थन और अंग्रेजों के विरोध में खिलाफत आंदोलन चलाया गया। भारत में इस आंदोलन को गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के नाम से चलाया। पूरे विश्व में कई स्थानों पर आंदोलन हिंसक हुआ, तो वहीं गांधी जी ने भारत में खिलाफत को असहयोग आंदोलन के नाम से चलाकर इसे अहिंसात्मक बनाये रखने का पूरा प्रयास किया। इससे आशा के अनुरुप अंग्रेजों को अधिक नुकसान नहीं हुआ, लेकिन जगह-जगह साम्प्रदायिक दंगे हुये, जिसमें हिन्दुओं की हत्या, लूटपाल और हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया। भारत-पाकिस्तान विभाजन का आधार तैयार करने में भी इस असहयोग आंदोलन की बड़ी भूमिका रही थी।

जो लोग इसे इतिहास की बाते मानकर वर्तमान की आशंका को निराधार सिद्ध करना चाहते हैं, उनके लिये वर्तमान का एक उदाहरण भी प्रस्तुत करता हूं। इस्लाम में पैगम्बर मोहम्मद साहब का बहुत बड़ा स्थान है। फ्रांस की एक पत्रिका ने उनका कार्टून बनाया। हम इस कार्टून का समर्थन नहीं करते हैं, लेकिन इसके विरोध में जो हिंसक घटनाएं हुई थीं, उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता। पिछले वर्ष जब एक शिक्षिका ने इस कार्टून को दिखाया, तो उसकी गला काट कर हत्या कर दी गयी थी। भारत में कई प्रतिष्ठित इस्लामिक हस्तियों ने इस हत्या को सही ठहराया था। साथ ही इन लोगों ने भारत में भी ऐसी ही सजा की पैरवी तक कर डाली। मतलब किसी भी मुसलमान को हत्या करने का जन्मसिद्ध अधिकार मिलना।

इन सभी लोगों को खलीफा में पूर्ण आस्था है और ये सभी गाजी बनना चाहते हैं। पाकिस्तान जिस विचारधारा का प्रचार करके भारत में आतंकवाद फैला रहा है। उसके मूल में भी यही विचारधारा है। लेकिन अब एक बार फिर तुर्की में ही इस विचारधारा का विरोध शुरु हो गया है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अरदगान अपने आप को खलीफा का उत्तराधिकारी मानते हैं और इस्लाम को मानने वाले सभी देशों का प्रमुख बनना चाहते हैं। उन्होंने अपनी इस मंशा के कारण तुर्की में कई ऐसे निर्णय लिये हैं, जो खलीफा का पद समाप्त होने के बाद से अब तक नहीं लिये गए। हाल ही में उन्होंने तुर्की को एक अंतरराष्ट्रीय संधि से बाहर कर दिया, जो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लागू की गई थी। इसके खिलाफ तुर्की की महिलाएं सड़कों पर हैं, लेकिन नये खलीफा ने इससे कोई भी अंतर न पड़ने की बात कही है।

अरदगान 2003 से 2014 तक तुर्की के प्रधानमंत्री रहे और उसके बाद 2014 से अभी तक तुर्की के राष्ट्रपति हैं और संभवतः जब तक जीवित रहेंगे, वो इसी पद पर बने रहेंगे। ऐसे में खलीफा के विरुद्ध जिस प्रकार का विद्रोह हुआ था, अरदगान को हटाने के लिये भी उसी प्रकार के प्रयास करने पड़ेंगे। अरदगान के 2003 में प्रभावी अधिकार प्राप्त करते ही तुर्की में महिलाओं के प्रति हिंसा तेजी से बढ़ने लगी। कुछ इस्लामिक धर्मगुरुओं के अनुसार इस्लाम में महिलाओं को बहुत कम अधिकार हैं, इसलिये अपने प्रति हिंसा या अन्य किसी प्रकार के अत्याचार के लिये आवाज उठान गैर इस्लामिक है। यद्यपि अरब के बहुत से इस्लामिक धर्म गुरु इस बात से असहमत हैं। इसलिये इस्लामिक जगत दो गुटों में बंटा हुआ है। एक जो तुर्की में खलीफा को मानता है और दूसरा जो अरब देशों के निर्देशों को। अरदगान स्वयं को सच्चा अल्लाह का बंदा साबित करने के लिये महिलाओं पर अत्याचार को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके कारण उन्हें तुर्की में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। आशा है कि तुर्की में एक बार फिर खलीफा का साम्राज्य समाप्त होगा और गाजियों को हार का सामना करना पड़ेगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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