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क्या एसडीएम प्रदर्शनकारी किसानों को मुख्यमंत्री पर जानलेवा हमले की छूट दे देते?

– सारांश कनौजिया

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये एक एसडीएम ने प्रदर्शनकारी किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिये लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। जब प्रदर्शनकारी किसानों को रोकने के लिये पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया, तो दूसरी ओर से प्रदर्शनकारियों ने पथराव कर दिया, ठीक वैसा ही पथराव जैसा कभी जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों को बचाने के लिये किया जाता था। इसमें कई पुलिस वाले घायल हो गये। ऐसे में पुलिस के पास क्या विकल्प हो सकता था? इन हिंसक प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने देते, जिससे उस स्थान पर जहां मुख्यमंत्री मनोहरलाल आये थे, वहां तक पहुंचकर ये प्रदर्शनकारी भाजपा कार्यकर्ताओं से उलझते और फिर इन प्रदर्शनकारियों की ओर से पथवराव होता।

ऐसा होने पर हरियाणा के मुख्यमंत्री को भी गंभीर चोटे लग सकती थी। इसका जिम्मेदार कौन होता? क्या किसान नेता इसकी जिम्मेदारी लेते, बिल्कुल नहीं। वो 26 जनवरी को दिल्ली में प्रदर्शन से पहले तो जिम्मेदारी ले रहे थे, लेकिन जब उनकी ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा हुई, तो उसके बाद उन्होंने इसका सारा दोष पुलिस और प्रशासन पर थोप दिया था। जो लोग एक दिन पहले तक किसान नेताओं के द्वारा तैयार मंच का प्रयोग कर किसानों को संबोधित कर रहे थे, उन सभी से इन किसान संगठनों ने पल्ला झाड़ लिया। इस बार भी मुख्यमंत्री पर प्रदर्शनकारियों के जानलेवा हमले के लिये पुलिस और प्रशासन को ही दोष दिया जाता। इस परिस्थिति से बचने के लिये पुलिस के पास क्या विकल्प था?

यह विचार करने पर ध्यान में आता है कि पुलिस के पास हिंसक प्रदर्शनकारियों को रोकने के दो ही विकल्प थे। पहला पुलिस हाथ बांधे पथराव से चोटिल होती रहती। शायद जब सभी पुलिस वाले खून से लथपथ रास्ते में पड़े अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा कर रहे होते तब कुछ किसानों को इन पर दया आ जाती और वो अपना विरोध बंद कर देते। यद्यपि इसकी संभावना कम ही थी। क्योंकि जिस प्रकार पुलिस पर पथराव कर घायल किया गया, उससे इस हिंसा के इतनी आसानी से रुकने की संभावना नहीं थी। ऐसे में एक ही विकल्प शेष बचता था, लाठीचार्ज। पुलिस ने वैसा ही किया। इसका आदेश उनको एसडीएम से भी मिला था।

ये अलग बात है कि लाठीचार्ज का निर्देश एसडीएम अलग तरीके से भी दे सकते थे। लेकिन उस समय उनकी मनोस्थिति क्या थी? इसको भी समझने की जरुरत है। एसडीएम जब पुलिस वालों को संबोधित कर रहे थे, तो उस समय उन्होंने लाठीचार्ज का आदेश किस प्रकार दिया, यह तो भाजपा विरोधियों ने बताया, लेकिन दूसरी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। एसडीएम जहां खड़े थे, उस स्थान से आगे जाने से रोकने के लिये लाठीचार्ज का आदेश दिया गया था। प्रदर्शनकारी किसानों को खोज-खोज कर लाठीचार्ज करने के लिये उन्होंने नहीं कहा था। वो कहते हैं कि मैं दो रातों से सोया नहीं हूं, आप लोग तो सोये हैं न? आखिर किस परेशानी के कारण एसडीएम की दो रातों से नींद उड़ी हुई थी? वह कारण और कुछ नहीं बल्कि हरियाणा के मुख्यमंत्री की सुरक्षा था।

ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री मनोहरलाल जहां जाते हैं, उन्हें सुरक्षा मिलती ही है, फिर उस दिन ऐसा विशेष क्या था? वह विशेष था किसान संगठनों के प्रदर्शन का पुराना तरीका। पड़ोसी राज्य पंजाब में प्रदर्शनकारी किसानों ने भाजपा विधायक अरुण नारंग पर हमला कर उनके कपड़े फाड़ दिये थे। ऐसा नहीं है कि इस प्रकार का हिंसक विरोध पंजाब में ही हुआ है। पिछले वर्ष यमुनानगर में भाजपाा के प्रशिक्षण शिविर का विरोध करने के लिये किसानों ने उग्र प्रदर्शन किया था। पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़कर जिस प्रकार ये प्रदर्शनकारी आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे, उससे इस कार्यक्रम में भाग लेने वालों पर खतरा मंडराने लगा था। जिसके बाद यह शिविर रद्द कर दिया गया और भाजपा विधायक घनश्याम दास अरोड़ा सहित सभी लोगों को किसी प्रकार वहां से सुरक्षित निकाला गया। ऐसी घटनाएं हरियाणा में कई बार देखने को मिल चुकी हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि प्रदर्शनकारी किसान जहां पुलिस खड़ी थी, वहीं रुक कर अपना विरोध दर्ज कराते, तो लाठीचार्ज होता ही नहीं। इन किसान संगठनों के नेताओं के द्वारा जिस प्रकार गला दबाने की, बक्कल उखाड़ देने जैसी उकसाने वाली बाते कही जाती रही हैं, उनसे कानून-व्यवस्था की स्थिति कभी भी बिगड़ने का खतरा बना रहता है। इसी कारण एसडीएम की आंखों से नींद गायब थी और उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल की जान बचाने के लिये जरुरी लाठीचार्ज का आदेश देते समय कुछ गलत शब्दों का प्रयोग कर दिया, लेकिन उनकी मंशा गलत नहीं थी।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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