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बलराम के बिना अधूरा है श्रीकृष्ण का जीवन

– बाल मुकुन्द ओझा

भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम की जयंती भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन मनाई जाती है। जिन्हें देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। जैसे ब्रज में इसे बलदेव छठ कहा जाता है। गुजरात में इसे रंधन छठ के नाम से मनाया जाता है वहीं देश के पूर्वी भाग में इसे ललई छठ के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा इसे हलछठ, पीन्नी छठ, खमर छठ, चंदन छठ आदि नामों से भी जाना जाता है। इस साल यह तिथि 28 अगस्त शनिवार को है। हिंदू धर्म में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के साथ ही बलराम जयंती का भी महत्व है। ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन अपने बड़े भ्राता बलराम के बिना अधूरा है जो हर सुख दुःख में अपने छोटे भाई के साथ चट्टान की तरह खड़े थे। जब भी कृष्ण का नाम लिया जाता है उस दौरान बलराम का नाम भी उसी शिद्धत से लिया जाता है। जन साधारण में यह जोड़ी कृष्ण – बलराम के नाम से मशहूर है।

सूरदास के गीतों में भगवान श्री कृष्ण और बलराम के बचपन और उनकी लीला का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। यह गीत पूरे भारत में प्रसिद्ध है –

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।

मोसो कहत मोल को लीन्हो, तोहि जसुमति कब जायो।

कहा कहौं यहि रिस के मारे, खेलन हौं नहि जात।

पुनि पुनि कहत कौन है माता, कौन तिहारो तात।

इतिहास में बलराम को हलधर के नाम से भी जाना जाता है। इसी के साथ बलराम को बलदेव, बलभद्र और हलयुध के नाम से भी जाना जाता है। ये अस्त्र के रूप में मूसल और हल धारण करते थे। शास्त्रों और पुराणों  के मुताबिक बलराम को भगवान विष्णु के आठवें  अवतार के रूप में पूजा जाता है। बलराम को आदिश के अवतार के रूप में भी पूजा जाता है। जिस नाग पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। जगन्नाथजी त्रिमूर्ति में कृष्ण, सुभद्रा और बलराम तीनों साथ विराजमान हैं। बलराम ’नारायणीयोपाख्यान’ में वर्णित व्यूहसिद्धान्त के अनुसार विष्णु के चार रूपों में दूसरा रूप ’संकर्षण’ है। संकर्षण बलराम का अन्य नाम है। जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छः पुत्रों को मार डाला  तब देवकी के गर्भ में भगवान बलराम पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षित करके नन्द बाबा के यहाँ निवास कर रही रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया। इसलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा।

बलराम जयंती पर महिलाएं अपने पुत्रों के दीर्घायु और संपन्नता के लिए व्रत रखती हैं। छोटी कांटेदार या पलास की एक शाखा को भूमि या मिट्टी के गमले में गाड़ कर पूजन किया जाता है। इस दिन भैंस के दूध से बने दही और सूखे महुवा के फूल को पलाश के पत्ते रखकर पूजा करते हैं और इसी को खाकर महिलाएं  व्रत का समापन करती हैं। मान्यता है कि षष्ठी व्रत से पुत्रों के जीवन में सुख, शांति, धन, यश आदि की प्राप्ति होती है और उन्हें लंबी आयु मिलती है। बलराम की तरह वे बलशाली होते हैं। इसीलिए देश के कई भागों में महिलाएं इस व्रत को पूरे श्रद्धा भाव से रखती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण को अपनी मन को मोह लेने वाली मुस्कान, आकर्षक छवि और शांत स्वभाव के लिए जाना जाता है वहीं भाई बलराम उनके बल और गुस्से के लिए प्रसिद्ध थे। यह भी एक तथ्य है कि बलराम ने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया। पांडव पुत्र भीम और धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन दोनों के गुरु बलराम ही थे और उन्होंने ही दोनों को गदा चलाने की विद्या सिखायी थी।  बलराम को कौरव और पांडव दोनों ही बेहद प्रिय थे। इसीलिए उन्होंने महाभारत युद्ध में किसी का पक्ष नहीं लिया और न ही युद्ध में शामिल हुए।  बलराम ने श्रीकृष्ण से भी यही कहा था कि उन्हें भी इस युद्ध में हिस्सा नहीं लेना चाहिए क्योंकि युद्ध में शामिल दोनों ही पक्ष उनके ही संबंधी हैं। हालाँकि श्रीकृष्ण ने भाई की सलाह नहीं मानी और अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग लिया।

बलराम का विवाह रेवती से हुआ था। इनके नाम से मथुरा में दाऊजी का प्रसिद्ध मंदिर है। जगन्नाथ की रथयात्रा में इनका भी एक रथ होता है। यह गदा धारण करते हैं। मौसुल युद्ध में यदुवंश के संहार के बाद बलराम ने समुद्र तट पर आसन लगाकर देह त्याग दी थी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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