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जाहरवीर गोगा – एक महान योद्धा

जाहरवीर गोगा 11वीं  सदी के महान योद्धा थे।

जन्मस्थान : चुरू जिले का ददरेवा गाँव

पिता : चौहान वंश के शासक जेवरसिंह

माता : रानी बाछल

जन्मतिथि : विक्रम संवत 1003 में भाद्रपद कृष्णा नवमी

चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद जाहरवीर गोगा ख्याति प्राप्त राजा थे।

जाहरवीर गोगा का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था।

राजस्थान सहित उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा पंजाब, हिमाचल प्रदेश में जाहरवीर गोगा लोक देवता के रूप मे ससम्मान पूजे जाते हैं। लोकमान्यता व लोककथाओं में गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। सामान्यतः उन्हें गोगा बाप्पा, गोगाजी, गुग्गा, जाहिर वीर, गातोड़जी (गातरोड़जी), गोवर्धनसिंह चौहान और जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। जाहरवीर गोगा की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और वहीं जाहरवीर गोगा की घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है। गुरु गोरखनाथ के शिष्यों में जाहरवीर गोगा शामिल थे। गुरु गोरखनाथ ने इन्हें गुरु दीक्षा प्रदान की व साथ ही साथ आध्यात्मिक शिक्षा, योग शिक्षा, व आयुर्वेद की भी शिक्षा प्रदान की। वर्तमान में हनुमानगढ जिले के नोहर तहसील में स्थित गोगामेडी (घुरमेड़ी) स्थान पर इनकी समाधि बनी हुई हैं।

जाहरवीर गोगा से सम्बंधित वाद्य यंत्र ‘डेरू’ है। जाहरवीर गोगा की आराधना में लोग सांकल नृत्य करते हैं। यहां श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से भाद्रपद कृष्ण अमावस्या तक पशु मेला आयोजित होता है। इनका एक स्थान उदयपुर जिले के जयसमंद झील के पास वीरपुरा नामक स्थान पर भी है। लोगों का ऐसा मानना हैं कि यहाँ पर स्वयं भगवान शंकर ने गोगाजी को स्थान दिया था अर्थात शिवलिंग यहाँ से अंतर्ध्यान हो गया और वहां जाहरवीर गोगा ने समाधि ले ली थी, आज भी उस स्थान पर गातोड़ जी का मन्दिर बना हुआ हैं परन्तु वहाँ पर शिवलिंग नही है। यहाँ पर आने वाले भक्त उस समाधि वाले स्थान पर जहा गड्ढानुमा (बांबी) स्थान बना हुआ है वह अपने हाथ पर केसर लगाकर उन्हें (गातोड़ जी) को अर्पण करते हैं।

युद्ध करते समय जाहरवीर गोगा का सर ददरेवा (चुरू) में गिरा इसलिए इसे शीर्षमेडी (शीषमेडी) तथा धड नोहर (हनुमानगढ़) में गिरा इसलिए धरमेडी/धुरमेडी व गोगामेडी भी कहते हैं। बिना सिर के ही जाहरवीर गोगा को युद्ध करते देख कर महमूद गजनवी ने गोगाजी को जाहिर पीर (प्रत्यक्ष पीर) कहा। अपने हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा करते हुए महमूद गजनवी के साथ 1024 में युद्ध करते हुए जाहरवीर गोगा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

परिवार का इतिहास एवं जन्म

10 वीं शताब्दी के लगभग अंत में मरुप्रदेश के चौहानों ने राज्य स्थापित करने प्रारम्भ कर दिये थे। इसी स्थापनाकाल मे घंघरान चौहान ने वर्तमान चुरू शहर से 10 किमी. पूर्व मे घांघू गाँव बसाकर अपनी राजधानी स्थापित की। राणा घंघ की पहली रानी से पुत्र हर्ष तथा एक पुत्री जीण का जन्म हुआ। राणा घंघरान की दूसरी रानी से कन्हराज, चंदराज व इंदराज हुए। कन्हराज के चार पुत्र -अमराज, अजराज, सिधराज व बछराज हुए । कन्हराज का पुत्र अमराज (अमरा) उसका उत्तराधिकारी बना। अमराज का पुत्र जेवर(झेवर) उसका उत्तराधिकारी बना। लेकिन उदार व पराक्रमी जेवर ने घांघू का राजपाट अपने भाइयों के लिए छोड़ दिया और सुदूरवर्ती बीहड़ क्षेत्र दादरेवा को राजधानी बनाकर साम्राज्य विस्तार किया। इसी ददरेवा गाँव में चौहान वीर गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 में हुआ । यह गाँव चुरू जिले में आता है।

उनके जन्म को लेकर भी एक जनश्रुति प्रचलित है। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थीं । संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गईं  और तदुपरांत जाहरवीर गोगा का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगा पड़ा।

राजा के रूप में जाहरवीर गोगा

राजा जेवर की असामयिक मृत्यु के कारण उनके अवयस्क पुत्र गोगा चौहान के कन्धों पर राज्य का भार आ गया। माँ बाछल के संरक्षण में वे ददरेवा के राणा बने। रानी बाछल की बड़ी बहन आछल को भी इन्हीं संत तपस्वी योगी गोरखनाथ के अशीर्वाद से अर्जन-सर्जन नामक दो वीर पुत्र पैदा हुए थे।

पहले युद्ध में वीरता का प्रदर्शन 

जाहरवीर गोगा के मौसेरे भाइयों अर्जन-सर्जन ने ही उनके राज्य को हड़पने का प्रयास शुरू कर दिया। उन्होंने गोगा चौहान से ददरेवा छीनने का प्रयास किया। इन जुड़वां भाइयों ने गायों की चोरी शुरू कर दी। जाहरवीर गोगा का ददरेवा से 8 किमी. उत्तर-पूर्व मे वर्तमान खुड्डी नामक गाँव के पास एक जोहड़ भूमि में अर्जन-सर्जन के साथ युद्ध हुआ, जिसमें गोगा चौहान ने विजय प्राप्त की।

 महमूद गजनवी से युद्ध

महमूद गजनवी के उत्तर भारत पर हुए आक्रमणों के परिणामस्वरूप जाहरवीर गोगा ने अपनी सीमा से लगते हुए अन्य अव्यवस्थित राज्यों पर भी सीधा अधिकार न कर मैत्री संधि स्थापित की। जिसके कारण उत्तरी-पूर्वी शासकों की नजरों मे जाहरवीर गोगा भारतीय संस्कृति के रक्षक बन गए। कन्नौज लूटने के बाद सन 1018 में जब महमूद सोमनाथ पर आक्रमण के लिए निकला तो महमूद गजनवी ने धोखे से जाहरवीर गोगा को हराने के लिए अपने सिपहसालार मसूद को तिलक हज्जाम के साथ भटनेर भेजा।

मसूद और तिलक हज्जाम ने जाहरवीर गोगा को प्रणाम कर हीरों से भरा थाल रखकर सिर झुकाकर आग्रह किया, ‘‘सुल्तान आपकी वीरता और बहादुरी के कायल हैं, इसलिए आपकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाकर आप से मदद मांग रहे हैं। उनकी दोस्ती का यह नजराना कबूल कर आप उन्हें सही सलामत गुजरात के मंदिर तक जाने का रास्ता दें ”। जाहरवीर गोगा ने इस संधि से तत्काल मना कर दिया और हीरों से भरे थाल को ठोकर मार कर फेंक दिया। इसके बाद गजनी ने अपनी सेना को वहां कूच करने का आदेश दिया। उसकी सेना में एक लाख पैदल, और तीस हजार घुड़सवार शामिल थे। जाहरवीर गोगा के पास आठ सौ वीर राजपूत और तीन सौ अन्य सैनिक थे।

इसके बावजूद जाहरवीर गोगा के अद्भुत साहस और बलिदानी तेवरों को देखते हुए सुल्तान ने उनसे संधि करने के लिए फिर से अपना दूत भेजा। जाहरवीर ने फिर से गजनी के प्रस्ताव को मानने से इंकार कर दिया। अंत में हार मान कर गजनी ने बिना युद्ध किये ही बगल से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी। इसके बाद जाहरवीर गोगा ने सम्पूर्ण उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र मे संपर्क किया और राजाओं को संगठित किया। सभी ने सोमनाथ विध्वंश कर लौटते हुए गजनी  को सबक सिखाने की ठानी। जाहरवीर गोगा ने उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के सभी शासकों को गजनी से युद्ध करने के लिए तैयार कर लिया था।

गजनी ने सोमनाथ पर आक्रमण कर उस अद्वितीय धरोहर को नष्ट कर दिया। कहा जाता है कि वह लौटते समय बेहद घबरा गया था। वापसी के समय गजनी बहुत तेजी से अनुमानित समय व रणयोजना से पूर्व जाहरवीर गोगा के राज्य के दक्षिण-पश्चिम सीमा मे प्रवेश कर गया। इस कारण जाहरवीर गोगा द्वारा आमंत्रित उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सेनाएँ समय पर नहीं पहुंची थीं । हालाँकि जाहरवीर गोगा ने हिम्मत नहीं हारी। अपने पुत्र भाई-भतीजों एवं स्थाई तथा एकत्रित सेना को लेकर उन्होंने गजनी  का अकेले ही मुकाबला करने की ठानी।

उन्होंने ददरेवा से 75 किमी. उत्तर-पश्चिम के रेगिस्तानी निर्जन वन क्षेत्र में गजनी  का रास्ता रोका। केसरिया बाना सजाकर हर-हर महादेव का घोष करते राजपूत वीर सैनिकों ने गजनी से युद्ध किया। इस युद्ध में एक-एक राजपूत ने दस-दस दुश्मनों को मार गिराया। इस युद्ध में जाहरवीर गोगा ने अपना बलिदान दिया। जाहरवीर गोगा के मात्र एक पुत्र सज्जन और एक पौत्र सामन्त बच गए थे, जिन्हें उन्होंने गजनी के आक्रमण की पूर्व सूचना के लिए गुजरात भेजा था। उस समय महमूद गजनवी स्थानीय लोगों के सहयोग से गजनी शहर का मार्ग तय कर रहा था। गोगा के चतुर सैनिकों ने रास्ता बताने के बहाने गजनी की सेना के निकट पहुँचकर उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया।

जाहरवीर गोगा के पास साहस तो था पर सेना कम थी। गजनी की सेना के बहुत सैनिक मारे गए। जाहरवीर गोगा ने भी अपने 45 से अधिक पुत्र, भतीजों एवं निकट बंधु-बांधवों के अतिरिक्त अन्य सैकड़ों सैनिकों के साथ बालू मिट्टी के एक टीले पर मातृभूमि और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया। जिस स्थान पर उनका शरीर गिरा था उसे गोगामेडी कहते हैं। यह स्थान हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में है।  इसके पास में ही गोरखटीला है तथा नाथ संप्रदाय का विशाल मंदिर स्थित है।

शेष बचे वीर योद्धाओं ने ददरेवा आकर गोगा के भाई बैरसी के पुत्र उदयराज को राणा बनाया। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सैनिक भारी संख्या में ददरेवा पहुंचे लेकिन उस समय तक सब कुछ बदल गया था। चौहान वंश समेत अन्य वंशों के योद्धा गोगा के सम्मान में ददरेवा आए। उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के अनुयायी आज भी पीले वस्त्रों मे परंपरा को निभाने के लिए उपस्थित होते हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद भी राजपूतों ने हार नहीं मानी।

सामंत सिंह और सज्जन सिंह रास्ता बताने वाले दूत बनकर गजनी की सेना में शामिल हो गए। उन्होंने आक्रान्ता मुगल सेना को ऐसा घुमाया कि राजस्थान की तपती रेत, गर्मी,पानी की कमी के चलते, रात में सांपों के काटने से गजनी के हज़ारों सैनिक मारे गए। ये दोनों वीर राजपूत युवक भी मरुभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए मगर तब तक गजनी की आधी सेना खत्म हो चुकी थी।

जाहरवीर गोगा पर लेख

ददरेवा के इतिहास का यह भाग ‘श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर’ की स्मारिका 2013-14: ‘अर्चना’ में प्रकाशित मातुसिंह राठौड़ के लेख ‘चमत्कारिक पर्यटन स्थल ददरेवा’ (पृ. 21-25) से लिया गया है। 10 वीं शताब्दी के लगभग अंत में मरुप्रदेश के चौहानों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने प्रारम्भ कर दिये थे। इसी स्थापनाकाल मे घंघरान चौहान ने वर्तमान चुरू शहर से 10 किमी पूर्व मे घांघू गाँव बसा कर अपनी राजधानी स्थापित की।

राणा घंघ की पहली रानी से दो पुत्र- हर्ष व हरकरण तथा एक पुत्री जीण का जन्म हुआ। हर्ष व जीण लोक देवता के रूप में सुविख्यात हैं। ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते हालांकि हर्ष ही राज्य का उत्तराधिकारी था लेकिन नई रानी के रूप में आसक्त राजा ने उससे उत्पन्न पुत्र कन्हराज को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। संभवत: इन्हीं उपेक्षाओं ने हर्ष और जीण के मन में वैराग्य को जन्म दिया। दोनों ने घर से निकलकर सीकर के निकट तपस्या की और आज दोनों लोकदेव रूप में जन-जन में पूज्य हैं।

घंघरान की दूसरी रानी से कन्हराज, चंदराज व इंदराज हुए । कन्हराज के चार पुत्र-अमराज, अजराज, सिधराज व बछराज हुये। कन्हराज का पुत्र अमराज (अमरा) उसका उत्तराधिकारी बना। अमराजका पुत्र जेवर (झेवर) उसका उत्तराधिकारी बाना। लेकिन महत्वाकांक्षी जेवर ने ददरेवा को अपनी राजधानी बनाई और घांघू अपने भाइयों के लिए छोड़ दिया। जेवर ने उत्तरी क्षेत्र मे अपने राज्य का विस्तार अधिक किया। असामयिक मृत्यु के कारण यह विजय अभियान रुक गया। जेवर के पश्चात उनका पुत्र गोगा (गोगदेव) चौहान युवावस्था से पूर्व ही माँ बाछलदे के संरक्षण में ददरेवा का राणा बना।

वर्तमान जोगी-आसन के स्थान पर नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध संत तपस्वी योगी ने गोरखनाथ के आशीर्वाद से बाछल को यशस्वी पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी की थी। कहते हैं कि बाछलदे की बड़ी बहन आछलदे को पहले इन्हीं संत के आशीर्वाद से अर्जन-सर्जन नामक दो वीर पैदा हुए थे। अर्जन-सर्जन के साथ गोगा का भीषण युद्ध गोगा के पिता की असामयिक मृत्यु के कारण गोगा को संघर्ष करना पड़ा। राणा के वंशजों ने, जो विस्तृत क्षेत्र में ठिकाने स्थापित कर चुके थे , गोगा को राज्य व्यवस्थित करने में सहयोग नहीं किया। घंघरान के एक पुत्र इन्दराज के वंशज घांघू से 40 किमी. उत्तर मे जोड़ी नामक स्थान पर काबिज थे। इनके राजकुमार अर्जन-सर्जन गोगा के मौसेरे भाई थे।

इन राजकुमारों ने गोगा से ददरेवा छीनने का प्रयास किया। इन जोडले राजकुमारों ने गायों को चोरी कर ले जाना प्रारम्भ किया। एक दिन गोगा का ददरेवा से 8 किमी. उत्तर-पूर्व मे वर्तमान खुड्डी नामक गाँव के पास एक जोहड़ भूमि में अर्जन-सर्जन के साथ भीषण युद्ध हुआ। अर्जन एक जाळ के पेड़ के पास मारा गया। सर्जन तालाब की पाल के पास युद्ध करता हुआ काम आया। इनके अंतिम स्थल पर एक मंदिर बना हुआ है जिसमें एक पत्थर की मूर्ति में दो पुरुष हाथों मे तलवार लिए हुए  एक ही घोड़े पर सवार हैं।

घोड़े के आगे एक नारी खड़ी है। इनकी अर्जन-सर्जन के नाम से पूजा की जाती है। ऐसे  ही एक घोड़े पर सवार की मूर्ति ददरेवा की मेड़ी मे भी है जिसे वर्तमान में एक दीवार के साथ स्थापित कर मंदिर का रूप दे रखा है। मंदिर में दूसरी पत्थर की मूर्ति घोड़े पर सवार गोगा चौहान की है। युद्ध मैदान में निर्मित मंदिर का पुजारी भार्गव परिवार से है। वर्तमान मे ऊपर वर्णित जाल का वृक्ष नष्ट हो गया है। जोहड़ मे अब भी पानी भरता है। यहाँ एक लोकगीत प्रचलित है – ‘अरजन मारयो जाळ तलै’ सरजन सरवरिए री पाल। हेरी म्हारा गूगा भल्यो राहियो’।

गोगा का वैवाहिक जीवन : गोगा के वैवाहिक जीवन के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों का अभाव है। लोक-कथाओं में उनकी पत्नियों के रूप में रानी केलमदे व रानी सुरियल के नामों का उल्लेख है। रानी केलमदे को पाबूजी के भाई बुड़ोजी की पूर्ति बताया गया है। समय का अंतराल अधिक होने के कारण यह सत्य प्रतीत नहीं होता। रानी सुरियल का वर्णन कामरूप देश की राजकुमारी के रूप में किया गया है। गोगा के एक पुत्र नानक के अलावा अन्य पुत्रों का नाम ज्ञात नहीं है।

महमूद गजनवी से युद्ध – महमूद गजनवी के उत्तर भारत पर हुए आक्रमणों के परिणामस्वरूप गोगा ने अपनी सीमा से लगते हुए अन्य अव्यवस्थित राज्यों पर भी सीधा अधिकार न कर मैत्री संधि स्थापित की। जिसके कारण उत्तरी-पूर्वी शासकों की नजरों मे गोगा चौहान भारतीय संस्कृति का रक्षक लगने लगा। जब महमूद ने सन 1018 में कन्नौज पर आक्रमण किया तो संभवत: उसके बाद गोगा ने सम्पूर्ण उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र मे संपर्क किया होगा क्योंकि सोमनाथ पर हुए आक्रमण के समय सभी शासकों ने गजनी को अपने क्षेत्र से जाने की स्वीकृति देने के उपरांत भी सोमनाथ से आते हुए महमूद पर आक्रमण करने के लिए गोगा ने युद्ध मैदान में आने का आमंत्रण दिया तो उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के सभी शासकों ने सहर्ष स्वीकार किया था।

गजनी सोमनाथ पर आक्रमण कर उस अद्वितीय धरोहर को नष्ट करने में सफल रहा लेकिन उसको इतनी घबराहट थी कि वापसी के समय बहुत तेज गति से चलकर अनुमानित समय व रणयोजना से पूर्व गोगा के राज्य के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र मे प्रवेश कर गया। गोगा द्वारा आमंत्रित उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सेनाएँ समय पर नहीं पहुंची थीं । गोगा ने हिम्मत नहीं हारी। अपने पुत्र भाई-भतीजों एवं स्थाई तथा एकत्रित सेना को लेकर प्रस्थान किया। ददरेवा से 25 कोस (75 किमी.) उत्तर-पश्चिम के रेगिस्तानी निर्जन वन क्षेत्र में तेज गति से जाते हुए गजनी का रास्ता रोका।

उस समय महमूद गजनवी रास्ता भटका हुआ था और स्थानीय लोगों के सहयोग से गजनी शहर का मार्ग तय कर रहा था। गोगा के चतुर सैनिकों ने रास्ता बताने के बहाने महमूद की सेना के निकट पहुँचकर उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया। गोगा के पास साहस तो था पर सेना कम थी। गजनी की सेना के काफी सैनिक मारे गए। गजनी के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। गोगा अपने 45 से अधिक पुत्र, भतीजों एवं निकट बंधु-बांधवों के अतिरिक्त अन्य सैकड़ों सैनिकों के साथ बालू मिट्टी के एक टीले पर सांसारिक यात्रा को विराम दिया।

युद्ध समाप्त होने के कुछ घंटों बाद बचे हुए पारिवारिक सदस्यों व सैनिकों ने उसी स्थान पर अग्नि की साक्ष्य में इहलोक से परलोक के लिए विदाई दी। शेष बचे वीर योद्धाओं ने ददरेवा आकर गोगा के भाई बैरसी के पुत्र उदयराज को राणा बनाया। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सैनिक भारी संख्या में ददरेवा पहुंचे लेकिन उस समय तक सब कुछ बदल गया था। चौहान वंश व अन्य रिशतेदारों के योद्धा गोगा के सम्मान में ददरेवा आए। उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के अनुयाई लोग आज भी पीले वस्त्रों मे परंपरा को निभाने के लिए उपस्थित होते हैं।

गोगा को जहरीले सर्पों के विष को नष्ट करने की अलौकिक शक्ति प्राप्त हुई। गाँव-गाँव में गोगा के पूजा स्थान बनने लगे। गोगामेड़ियों की स्थापना हुई। जन्म स्थान ददरेवा में बनी मेड़ी को ‘शीश मेड़ी’ कहा जाता है। ददरेवा मेड़ी में गोगाजी की घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है। ददरेवा की मेड़ी बाहर से देखने पर किसी राजमहल से कम नहीं है। ददरेवा का दूसरा महत्वपूर्ण स्थान गोरखधुणा (जोगी आसान) है। यह वही स्थान है जहां नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध संत तपस्वी योगी ने गोरखनाथ के आशीर्वाद से बाछल को यशस्वी पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी की थी। यहाँ पर सिद्ध तपस्वियों का धूणा एवं गोरखनाथ जी और अन्य की समाधियाँ भी हैं।

ददरेवा गाँव में एक पुराना गढ़ है जो सन 1509 ई. से 1947 तक बीकानेर के राठौड़ राज्य के अधीन रहा। महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ के पुत्र सुंदरसेन को 12 गाँव की जागीर के साथ ददरेवा मिला था। पुराने कुएं, मंदिर, हवेलियाँ तथा जाल के वृक्ष यहाँ की सुंदरता बढ़ाते हैं। राठौड़ राज्य से पूर्व गोगाजी चौहान के वंश में मोटेराय के तीन पुत्रों द्वारा इस्लाम मत स्वीकार करने और क्यामखानी नाम विख्यात होने की ऐतिहासिक घटना ददरेवा के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। क्यामखानी एवं अन्य हिन्दू धर्म से इस्लाम को मानने वालों के कारण ही गोगाजी के नाम के साथ पीर शब्द जुड़कर गोगापीर नाम लोकप्रिय हुआ।

गोगाजी का समाधि-स्थल ‘धुरमेड़ी’ कहलाता है। यह गोगामेड़ी स्थान भादरा से 15 किमी. उत्तर-पश्चिम में हनुमानगढ़ जिले में है। यहाँ पुरानी मूर्तियाँ हैं। यहाँ के पुजारी चायल मुसलमान हैं जो चौहान के वंशज हैं। गोगामेड़ी में गोरख-टिल्ला व गोरखाणा तालाब दर्शनीय स्थान हैं। गोरखमठ में कालिका व हनुमान जी की मूर्तियाँ हैं। गोगाजी के भक्त ददरेवा के साथ ही गोगामेड़ी आने पर यात्रा सफल मानते हैं।

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