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नव संवत्सर 2079 : प्रकृति की कसौटी पर खरा हिन्दू नववर्ष

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– डॉ घनश्याम बादल

एक और नववर्ष दस्तक देने आ गया है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नवसंवत्सर 2079 का आरंभ दो अप्रैल से हो रहा है। इस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है और हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है ।

सांस्कृतिक धरोहर  :

राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के प्रतीक की शुरूआत इस चैत्र नवरात्रि होती है। महाराष्ट्र में इस दिन को गुड़ी पड़वा और दक्षिण भारत में इसे उगादि कहा जाता है। विक्रम संवत को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार का होता है जिसमें सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास आते हैं। हालांकि कई विद्वानों का मत है कि भारत में विक्रमी संवत से भी पहले लगभग 700 ई.पू. हिंदुओं का प्राचीन सप्तर्षि संवत अस्तित्व में आ चुका था।

समय की कसौटी पर खरा वर्ष :

‎यह नववर्ष किसी जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं  अपितु मानव मात्र का नववर्ष है। यह पर्व विशुद्ध रूप से भौगोलिक पर्व है क्योंकि प्राकृतिक दृष्टि से भी वृक्ष वनस्पति फूल पत्तियों में भी नयापन दिखाई देता है। वृक्षों में नई-नई कोपलें आती हैं। वसंत ऋतु का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है। मनुष्य के शरीर में नया रक्त बनता है। हर जगह परिवर्तन एवं नयापन दिखाई पडता है। रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है। व्यापारी वर्ग में भी आर्थिक दृष्टि से मार्च महीना समापन माह माना जाता है। अतः कहा जा सकता है कि  साल का पहला महीना

जनवरी नहीं अपितु  चैत्र है जो लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है। वस्तुत: भारत में जनवरी में नया जैसा कुछ नहीं होता किंतु अभी चैत्र माह में  नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता है। यह नवीनता हमें नई उर्जा प्रदान करती है इसीलिए अब भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव वर्ष की शुरुआत मानने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है । चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है।

क्या है प्रतिपदा

हिन्दू पंचांग की प्रथम तिथि ‘प्रतिपदा’ कही जाती है। यह तिथि मास में दो बार आती है- ‘पूर्णिमा’ के पश्चात् और ‘अमावस्या’ के पश्चात। पूर्णिमा के पश्चात् आने वाली प्रतिपदा को कृष्ण पक्ष की प्रतिपदाऔर अमावस्या के पश्चात् आने वाली प्रतिपदा को शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा कहा जाता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चन्द्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है, अतः इसे ‘प्रतिपदा’ कहते हैं। शुक्ल पक्ष में सूर्य और चन्द्र का अन्तर 0° से 12° अंश तक होता है जबकि कृष्ण पक्ष में सूर्य और चन्द्र का अन्तर 181° से 192° अंश तक होता है, तब प्रतिपदा तिथि होती है। प्रतिपदा को प्राकृत (अर्ध मागधी) में ‘पडिवदा’, अपभ्रंश में ‘पडिवआ’ या ‘पडिवा’ तथा हिन्दी में ‘परिवा’ या ‘एकम’ कहते हैं। पालि भाषा में इसे ‘पटिपदा’ कहते हैं।

पौराणिक मान्यता :

पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही सृष्टि की रचना शुरू की थी। इसी दिन भगवान विष्णु ने दशावतार में से पहला मत्स्य अवतार लेकर प्रलयकाल में अथाह जलराशि में से मनु की नौका का सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। प्रलयकाल समाप्त होने पर मनु से ही नई सृष्टि की शुरुआत हुई।

शुभ अशुभ फल

कृष्ण प्रतिपदा को चन्द्रमा की प्रथम कला होती है। शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में चन्द्रमा अस्त रहता है, अतः इसे समस्त शुभ कार्यों  हेतु वर्जित व अशुभ माना गया है। कृष्ण पक्ष प्रतिपदा में स्थिति एकदम विपरीत होती है। प्रतिपदा का शाब्दिक अर्थ ‘मार्ग’ होता है। आरम्भ, प्रवेश या प्रयाण भी इससे चिंहित होता है। ‘प्रति’ का अर्थ है- ‘सामने’ और ‘पदा’ का अर्थ है- ‘पग बढ़ाना’। कृष्ण प्रतिपदा में चन्द्र अपने ह्रास की ओर पग रखता है। प्रतिपदा के स्वामी अग्निदेव हैं। प्रतिपदा को ‘नन्दा’ अर्थात् ‘आनन्द देने वाली’ कहा गया है। रविवार एवं मंगलवार के दिन प्रतिपदा होने पर मृत्युदा होती है, तब इसमें शुभ कार्य वर्जित बताये गये हैं, परन्तु शुक्रवार को प्रतिपदा सिद्धिदा हो जाती है। उसमें प्रतिपदा प्रथम तिथि है।

शनि देव हैं राजा

विक्रम नवसंवत्सर 2079 में न्याय के देवता शनि का  बहुत अधिक प्रभाव रहेगा। इसके तीन कारण बताए जाते  हैं, पहला कारण है एक जनवरी को नए साल की शुरुआत शनिवार के दिन हुई, दूसरा संयोगवश दो अप्रैल को विक्रम नवसंवत्सर 2079 का आविर्भाव दिवस भी शनिवार को ही है व तीसरा कारण शनिदेव अभी अपने स्वामित्व वाली मकर राशि में हैं और अगले वर्ष 29 अप्रैल को वे कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे, उसके स्वामी भी वे ही हैं।

विक्रम संवत्सर 2078 का राजा मंगल थे, जबकि अगले नवसंवत्सर के राजा शनि व मंत्री बृहस्पति (गुरु) होंगे। खास बात यह है कि 100 साल में 15वीं बार और 10 साल में दूसरी बार नए साल की शुरुआत शनिवार को होगी। शनि देव  सुख और समृद्धि दिलाएंगे, लेकिन जीवन के कर्म का फल भी प्रदान करेंगे, इसीलिए सतर्कता भी जरूरी है। दरअसल नए वर्ष के प्रथम दिन के स्वामी को उस वर्ष का स्वामी मानते हैं। इस वर्ष का प्रथम दिन शनिवार को है और इसके देवता शनि है।

वर्ष के मंत्री

ज्योतिषीय आकलन कहता है कि इस वर्ष के मंत्री मण्डल में  राजा-शनि, मन्त्री-गुरु, सस्येश-सूर्य, दुर्गेश-बुध, धनेश-शनि, रसेश-मंगल, धान्येश-शुक्र, नीरसेश-शनि, फलेश-बुध, मेघेश-बुध रहेंगे। संवत्सर का निवास कुम्हार का घर एवं समय का वाहन घोड़ा है।  कहते  हैं कि जिस वर्ष समय का वाहन घोड़ा होता है उस वर्ष तेज गति से वायु, चक्रवात, तूफान, भूकंप भूस्खलन आदि की संभावना बढ़ जाती है। मानसिक बैचेनी भी बढ़ जाती है और तेज गति से चलने वाले वाहनों के क्षतिग्रस्त होने की भी संभावना बढ़ जाती है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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