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निगाहें आसमान पर : रसातल से धरातल तक सफ़र ‘स्त्री शक्ति’ का !

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डॉ० घनश्याम बादल

आज स्त्री अपने बल पर आगे आ रही है , आसमान मुट्ठी में कर रही है यकीन न आए तो नज़र डालिए दुनिया आइना दिखाती फॉर्च्यून और फॉर्ब्स की सूचियों पर । फॉर्च्यून इंडिया ने 2021 में भारत की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की जो  सूची जारी की उसमें केंद्रीय वित्त मंत्रालय और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की मंत्री निर्मला सीतारमण प्रथम स्थान पर रहीं। उनके बाद रिलायंस फाउंडेशन की चेयरपर्सन और गुडविल एंबेसडर नीता अंबानी और सौम्या स्वामीनाथन , मुख्य वैज्ञानिक, विश्व स्वास्थ्य संगठन  क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहीं। रोशनी नादर को विश्व में  52 वीं रैंक मिली जबकि फाल्गुनी नायर को  88 वां स्थान मिला ।  वहीं दुनिया भर में मैकेंजी स्कॉट को पहला स्थान और  कमला हैरिस को दूसरा स्थान मिला है ।

फॉर्ब्स की सूची में भारत की चार बेटियों ने दुनिया की 100 सबसे ताकतवर महिलाओं की लिस्ट में जगह बनाई है. इसमें वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण, नाइका की फाउंडर और सीईओ फाल्गुनी नायर और एच सी एल टैक्नोलॉजी की चेयरपर्सन रोशनी नाडर का नाम शामिल है । यह सूची आज इसलिए याद आई क्योंकि आज आठ मार्च है , मर्दों की के वर्चस्व वाली दुनिया में  छुई मुई, या कोमलांगी कहे जाने वाली स्त्री की ताकत को पहचानने और, उसे मानने वाले सलाम करने का दिन विश्व महिला दिवस मनाया जाता है  हर वर्ष 8 मार्च को  ।

उफ़ वह  काला युग !  :

प्राचीन भारत की विदुषी, व सामर्थ्यवान नारी जब हिजाब और घूंघट में कैद हो गई , विवाह के कुचक्र से उसके लिए ज्ञान के दरवाजे बंद हो गए , उसने इसे अपनी नियति नियति मान लिया और मुगल काल तक आते आते वह हरम की शोभा बन कर रह गई ।  पुरूष की कामवासना पूरी करने का साधन मात्र बन कर रह गई । ऐसे में समाज में उसकी महत्ता कम होनी ही थी सो हुई और वह एक दोयम दर्जे की नागरिक बनकर रह गई ।

मनमानी मर्दों की :

धीरे धीरे उसके सारे निर्णय भी पुरूष लेने लगा । उसके विवाह तक के बारे में उसकी मंशा जानने का भी हक छीन उसे बाल्यावस्था में ही विवाह बंधन में बांधा जाना लगा ।  भले ही उसे अर्धांगिनी कहा जाता हो पर हैसियत उसकी पैर की जूती की हो गई । राजनैतिक कारणों से होने वाले बहुविवाह अब पुरूष के लिए शौक व ताकत प्रदर्शन के सबब बन गए एक तरह से कहें तो स्त्री विमर्श के हिसाब से नारी के लिए यह एक घोर काला युग बन कर आया था ।

जागती, लड़ती स्त्री :

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है , पता नहीं पुरूष की अहंमनस्यकता,उसकी मुठमर्दी या उसकी जोर जबर्दस्ती , व प्रमाद ने यह किया या लगातार शोषण की चक्की में पिसने च अत्याचार सहने से उसका स्वाभिमान जागा  अथवा उसके सामने खत्म हो जाने या फिर उठकर लड़ने व जागने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचा और उसने दूसरा विकल्प चुना ।

अड़ती लड़ती स्त्री :

पर, इस दूसरे विकल्प पर चलना कोई सरल काम नहीं था क्योंकि छाती पर सवार समाज , प्रथाएं व पुरूष आसानी से उसे उबरने नहीं दे रहे थे। इस षड़यंत्र में नारी जगत का ही एक बड़ा हिस्सा भी डर , अज्ञान या अनजाने में शामिल  हुआ और एक लंबे कालखंड तक यह कुचक्र सफल होता रहा पर समय के साथ स्त्री इस जाल की काट भी सीख गई और आज वह सीना तान कर पुरूष के बराबर खड़ी नज़र आ रही है

तकनीकी बनी ताकत :

अगर नारी चिंतकों के अनुसार स्त्री की उन्नति में सबसे बड़ी भूमिका उसकी शिक्षा व जीजिविषा ने निबाही है । उसके साथ ही तकनीकी ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई है । अब चूंकि उसे फिजिकल पावर या बाहुबल का ज़माना नहीं रहा है बल्कि तकनीकी काबिलियत ही असली ताकत बनकर उभरी है तो मांस पेशीय बल पर इतराते पुरूष का वर्चस्व भी घटा है।  आज तकनीकी का युग है और नारी के लिए यह बड़े काम का सिद्ध हुआ है। उसकी कोमल उंगलियां फर्राटे से कंप्यूटर पर जिस गति से चलती हैं उतनी गति व दक्षता से शायद मर्द की कठोर व लोच रहित उंगलियां नहीं चल पाती और कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग व उसके दायरे में आते लगातार विस्तृत होते क्षेत्र ने नारी को नई ताकत व सामर्थ्य दी है ।

नए दौर की नई स्त्री :

इसी तकनीकी ताकत के चलते आज की स्त्री ने हर क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाबी पाई है । कभी अपनी शारीरिक संरचना के चलते साइकिल तक चलाने में घबराने वाली लड़कियां अब बाइक व स्कूटी ही नहीं दौड़ा रहीं हैं बल्कि कार और विमान से होती हुई लड़ाकू जैट तक जा  पंहुची हैं तो यह उनके लड़ाका होने का सबूत भी है । खेलों में अब वह केवल हल्के फुल्के गेम नहीं खेलती अपितु मुक्केबाजी , कुश्ती , से होती हुई सूमो व डब्ल्यू डब्ल्यू ई तथा ग्रीको रोमन कुश्ती , फ्री स्टाइल कुश्ती, पर्वतारोहण , भारोत्तलन व एयरडाइविंग तक कर रही है । अमेरिका के बाद यूरोप से होती हुई वह भारतीय सेना के तीनों अंगों में आ चुकी है । बेशक यह नारी शक्ति के उभार का नया दौर है ।

बना ली है पहचान :

नारी की ताकत को कारपोरेट जगत ने भी पहचाना है उसे एक नई पहचान दी है आज इंदिरा नुई होना या अंजलि भट्टाचार्य होना कमजोरी की नहीं अपितु ताकत की पहचान बना है । कल तक किरण बेदी या पी टी उषा पर गर्व करने की छोटी सी लिस्ट बहुत लंबी चुकी है । निर्मला सीतारामन के रूप  में  भारत की वित्तमंत्री भी महिला ही है और उनका मंत्रालय केन्द्र सरकार के लिए गर्व व गौरव के सबब है । रफ, टफ राजनेता भी देखने हों तो ममता बैनर्जी  किसी को छकाने के लिए पर्याप्त हैं । उसकी ताकत को ज़्यादा ही आजमाने का शौक हो तो मैरीकोम का मुक्का खाकर देखा जा सकता है ।

रही और छा रही स्त्री :

नारी ने बुलंदी के नए से नए प्रतिमान बनाए  हैं । उसने हर पल एक नया इतिहास लिखा है , कम से कम  इक्कीसवी सदी में तो वह किसी से उन्नीस न रहने का जीवट व दमखम रखती है । आज 8 मार्च का दिन वामा को सलाम बजाने  मौका है ।

अप्रतिम होती स्त्री :

अब वें ज़माने लद गए जब नारी को घर की शोभा बता कर उसे बाहर की खुली हवा में सांस लेने से रोका जाता था या उसे सलाम करने में पुरूष की हेठी होती थी । आज तो वह घर बाहर , दफ्तर खेत , खलिहान , ज़मीन , आसमान , रेगिस्तान , समंदर  सब जगह अपनी छाप छोड़ चुकी है, बराबर कमाती है, डटकर काम करती है और ज्ञान के नए नए दरवाजे खोल रही है अप्रतिम होती स्त्री । अब वह ‘तुम कल आना स्त्री’ कह देने से वापस जाने वाली नहीं है अपितु उसने आज को संवार रखा है और कल पर उसकी निगाह है । बेशक, सारी स्त्रियां आज भी न  पूरी तरह स्वतंत्र हैं और न हीआत्मनिर्भर,  मगर स्त्री ने प्रगति के रास्ते पर किसी न किसी रूप में अपने अपने क्षेत्रों में और क्षेत्रों की सरहद लांघ कर भी कदम रख दिया है । तो कह सकते हैं कि अब स्त्री आ चुकी है, और वह  छा भी रही है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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