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मर्यादा व मूल्यों के वाहक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

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डॉ० घनश्याम बादल

भारत में  राम के प्रति एक  प्रबल आस्था है, यही आस्था सबसे कहलवा देती है ‘राम नाम जगत‌ आधारा, जो सुमिरे सोई उतरहि पारा ‘ और जब भी कोई आपदा आती है तो एक ही बात मुंह से निकलती है ‘सबकी भली करेंगे राम ‘ । अब यह  राम कौन हैं, कहां रहते हैं, निराकार हैं या साकार ?   तर्क और नास्तिकता के इस युग में राम  व उनके जन्मोत्सव पर कितने ही सवाल खड़े होने के बावुजूद  राम जन – जन में पैठे हैं और ऐसे भी कोई संकेत नहीं कि वें, यहां की संस्कृति से , कभी भी लुप्त होगें ।

जग के आराध्य राम

चैत्र शुक्ल नवमी को आस्था मयी होकर सारा देश श्री राम का जन्म मनाता है । आस्थावान राम भक्तों के लिए रामनवमी पर जश्न आस्था व विश्वास और अपने आराध्य के महिमामंडन का अवसर बनकर आता है , राम में उन्हे भगवान व मर्यादाओं के पुनर्स्थापक व ,विष्णु के अवतार दिखते हैं ।

राम दिलाते हैं प्रभुता

आज से  लाखों साल पूर्व त्रेता में पैदा हुए राम के नाम पर आस्था के मेले लगाना और उनके नाम पर मंदिर बनाने मात्र के आश्वासन से ही जन – जन को लुभा लेना भारत जैसे अद्भुत देश में आम बात है ।  राम आज भी सत्ता व प्रभुता देने वाले एक बड़े कारक हैं  तो कहना पड़ता है कि कोई बात तो है राम के नाम में  ।

मर्यादा पुरुषोत्तम

 मर्यादा पुरुषोत्तम राम, अयोध्या के राजा दशरथ के पराक्रमी बेटे , पितृ आज्ञा के पालक , दुष्टहंता शोषितों पीड़ितो के रक्षक , नारी का सम्मान करने व बचाने वाले नायक थे। अपनी प्रजा के भावों को समझने व उनहे महत्ता देने वाले राम , अपने न्याय के बल पर रामराज को अमर बना देने  वाले ऐसे राजा थे जो  अपनी परमप्रिय  पत्नी का एक धोबी के लांछित करने पर त्याग करते हैं और फिर उन्ही के वियोग में जल समाधि लेकर देह भी त्याग दी । बेशक राम में कुछ तो ऐसा है ही कि वें कालपार होने का नाम नहीं लेते । विवादों में रहकर भी पूज्य बने रहते हैं ।  लाखों साल बाद भी अमूर्त रूप में जिंदा रहते हैं । मिथकों व कालगणना के हिसाब से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी राम का जन्म  ठहरती है।

कब जन्मे राम ?

भले ही दशरथपुत्र राम के जन्म व उनके काल निर्धारण पर विद्वान एकमत न हों , राम के अस्तित्व  पर उंगलियां उठाते हों पर सुखसागर जैसे ग्रंथों में राम का जन्म त्रेता में होना माना  गया हैं , जिसके अनुसार कलियुग की अवधि 4,32,000 वर्ष है जो कि सबसे छोटा युग है , द्वापर उससे दोगुना व त्रेता उससे भी दोगुना होना मानते हैं इस तरह राम आज से  12 से 14 लाख वर्ष पूर्व हुए । एक अन्य विद्वान तो राम की जन्म तिथि 5414 ईसा पूर्व यानि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को  ठहराते है ।

 मूल्यों का प्रतीक

आज भी राम का नाम भारतीय संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों के मूल्यों का प्रतीक है । सार रूप में कहें तो राम की छवि आज भी एक आदर्श पुत्र , पति , भाई व शासक की है और इसीसे प्रेरित हो आम आदमी ने रामराज के सपने पाले हैं आज भी ।

 बहुमुखी प्रतिभावान

राम , भक्तों की दृष्टि में विष्णु के पूर्ण अवतार हैं , व्यवहारवादियों की नज़र में वें व एक सर्वगुण संपन्न आदर्श मानव हैं । राम भगवान हों या न हों पर आदर्श जननायक तो हैं ही । जनश्रुतियों व रामायण की कथा में राम अहिल्या, केवट, शबरी, सुग्रीव , जटायु या विभीषण जैसे हर आस्थावान पीड़ित पात्र को संकट से मुक्त करतें हैं । वें उनके के शाप , ताप ,शोक व संताप हरते हैं । इस कथा के अनुसार तो जो भी जाने या अनजाने में भी राम की शरण में जाता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है ।

शस्त्र शास्त्र ज्ञाता

रामयण में वर्णित श्रीराम की गुरु भक्ति व समर्पण अद्भुत है गुरु की आज्ञा का पालन वें पूरे समर्पण के साथ करते हैं । वशिष्ठ से वें बचपन में शिक्षा व  शास्त्रज्ञान लेते हैं तो  विश्वामित्र से वें अल्प समय में ही शस्त्र विद्या सीख मायावी राक्षसों ताड़का , मारीच व सुबाहु जैसे आताताईयों का नाश कर डालते हैं ।

उद्धारक पराक्रमी

राम जरुरत पड़ने पर दुर्बलों को सताने, मारने तथा उनका शोषण करने वालों को पहले तो सत्पथ पर लाने का प्रयास करते हैं पर , जब ऐसे लोग अत्याचार सीमा पार करने लगते हैं तब राम दुष्टहंता बन जाते हैं ,सागर को सोंख लेने तक पर उतर आते हैं अग्नि बाण साध लेते हैं , दूसरों की ताकत को ही अपनी ताकत बना प्रयोग करने वाले, दुराचारी बाली जैसों का छुपकर भी वध करने से परहेज नहीं करते हैं । स्त्री उद्धारक होने के बावुजूद वें स्त्री जाति को बदनाम करने वाली ताड़का और लंकिनी का वध भी करते हैं यानि राम में पराक्रम कूट – कूट कर भरा है

प्रजारंजक 

राम का व्यक्तित्व बहुआयामी है , वें धर्मनिरपेक्ष हैं , जाति पांति तथा ऊंच नीच से दूर हैं । राजा के रूप  में राम का कोई सानी नहीं है । वें अपने राज्य की ऐसी व्यवस्था करते हैं कि रामराज्य आने वाले युगों के लिए भी एक आदर्श राज्य बन जाता है । कहने वाले सही ही कहते हैं कि जहां राम जैसा राजा हो वहां अनिष्ट नहीं हो सकता । राम स्वयं सादा जीवन उच्च विचार का पालन करते हैं पर अपनी प्रजा को सारी सुविधाएं व सुख देने में कोई कसर नहीं उठा रखते । आज भी प्रजा अपने शासकों में राम की छवि ढूंढती है ।

 जन जन के प्रेरक :

छोटे छोटे संसाधनों का सही व उपयोग सीखना हो तो राम आज भी एक आदर्श प्रबंधक हैं । राम ऐसे दक्ष सेनानानायक हैं कि दिव्य अस्त्र शस्त्रों से युक्त महाबली रावण को मायावी पुत्रों सहित महज बंदर भालुओं की मदद से परास्त कर देते हैं । आज के परिप्रेक्ष्य में कह सकते हैं कि राम उच्च श्रेणी के ऐसे एम बी ए हैं जों उपलब्ध संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग में सिद्धहस्त हैं । राम कबीर के लिए निराकार हैं तो तुलसी के लिए साकार हैं । वाल्मीकी की प्रेरणा हैं, महाकवि कंब उन पर रीझते हैं तुलसी उनके भक्त हैं । सूर्यकांत त्रिपाठी व मैथिलीशरण जैसे कवि उन्हे कलियुग में भी प्रेरक मानते हैं । अब हम राम को ‘भगवान’  मानें,  न मानें, उन्हे पूजें, न पूजें  पर एक बात तो है कि राम से हम आज भी बहुत कुछ सीख सकते हैं ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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