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अंबेडकर : कितनी श्रद्धा, कितना उपयोग ?

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– डॉ   घनश्याम बादल

14 अप्रैल को एक बार फिर से देश भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव अंबेडकर की जन्म जयंती मना रहा है। हो सकता है इससे दलित वर्ग और अंबेडकर के समर्थक खुश हों।  मगर अंबेडकर के साथ जीते जी जिस प्रकार का व्यवहार हुआ एवं उनकी मृत्यु के पश्चात भी उन पर जिस प्रकार से उंगलियां उठाई गई उससे पता चलता है कि अंबेडकर के प्रति राजनीतिक दलों एवं सरकारों में श्रद्धा कम एवं उनके उपयोग  की मंशा कहीं ज्यादा रही है। भीमराव अम्बेडकर पर आज इस बहस की पर्याप्त गुंजाइश है कि क्या अंबेडकर अब ‘आउटडेटेड’ हो गए हैं या भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान देने वाले दलित रहनुमा भीम आज भी प्रासंगिक हैं ?

 डॉ० भीमराव अंबेडकर की उंगली उठाए हुए लगाई गई प्रतिमाएं जहां समाज पर उंगली उठा रही लगती हैं वहीं स्वयं उन पर भी आजीवन उंगलियां उठती रही हैं। तब भी जब अंबेडकर का चुनाव संविधान सभा के अघ्यक्ष के रूप में किया जा रहा था और तब भी , जब उनके बनाए कानूनों को दुनिया अचरज भरी नज़र से देख रही थी और तब भी जब उन्हे देश में आरक्षण के नाम पर चल रहे दंगों के लिए सबसे बड़ा गुनहगार बताया जा रहा था और तब भी भीमराव विवादों में थे  जब उन्हे देश के दलित वर्ग का ‘मसीहा’  कहा जा रहा था और तब भी जब उन्हे ‘पैर की जूती’ कह लांछित किए जाने वाले दलित वर्ग  को सर माथे पर बिठाने  का दोषी माना जा रहा था ।

एक खास तबके के मसीहा माने जाने वाले डॉ0 भीमराव , आजाद हिंदुस्तान के गरीब , वंचित व दलित समाज के श्रद्धापात्र  ‘भीम’ भारत के साथ ऐसे जुड़े हैं कि उन्हे अलग करना संभव ही नहीं है । समय-समय पर आलोचनाओं के घेरे में आने के बावजूद भी अंबेड़कर का राजनैतिक व सामाजिक वुजूद कायम है और आज भी उनमें  सरकारें बनाने व बिगाड़ने की हैसियत  है इसमें दो राय नहीं हैं । गरीब दलित परिवार में पैदा हो , फर्श से अर्श का सफर तय करने वाले अंबेडकर भारतीय संविधान के जनक तो हैं ही आज भी सोशल इंजीनियरिंग की धुरी हैं ।

बेशक, अब वह समय नहीं रहा जब भारत में महापुरुषों की हर बात को जस का तस माना व अपनाया जाता हो जब लेनिन की मूर्तियां अपना राजनैतिक मतभेद जाहिर करने के लिए तोड़ दिया जाता हो , गांधी की मूर्ति का चश्मा तोड़ फोड़ दिया जाता हो,  पेरियार की मूर्तियां बदले की आग में ध्वस्त कर दी जाती हों, तब अंबेड़कर की मूर्ति की उठी हुई एक उंगली का टूटना भी अचरज पैदा नहीं करता । वैसे भी सड़ी गली व्यवस्थाओं और सामंती विचारों पर उठी उंगलियां हमेशा से  टूटती रहीं हैं । आज अंबेड़कर और उनके चिंतन पर सवाल उठ रहे हैं ,राजनीतिक रूप से उनके गढ़े संविधान पर भी प्रश्नवाचक चिह्न खड़े किए जा रहे हैं । अब यें सवाल कितने सही , गलत हैं यह तो अलग बात है मगर यह सच है कि आज भी अंबेडकर लाखों दिलों में बसे हैं  ।

14 अप्रैल, 1891 को महार रामजी की 14वीं सन्तान भीम कुछ और हों या न हों पर  असाधारण, प्रतिभाशाली, दार्शनिक, चिंतक, विचारक, शिक्षक, सरकारी सेवक, समाज सुधारक, मानवाधिकारवादी, सफल संविधानविद् और राजनीतिज्ञ तो रहे ही हैं । अम्बेडकर के जीवन पर अपने पिता रामजी का बड़ा प्रभाव था जो विचारों से क्रान्तिकारी थे और उनके संघर्ष से ही 1914 में सेना में ‘महार बटालियन’ बनी थी ।  साथ ही साथ बुद्ध, कबीर और ज्योतिबाफुले के व्यक्तित्व का डॉ0 अम्बेडकर पर गहन प्रभाव पड़ा उन्होने बुद्ध से मानसिक शान्ति , कबीर से भक्ति तो ज्योतिबाफुले से अथक संघर्ष की प्रेरणा ले स्वयं अपना जीवन गढ़ा था  ।

अम्बेडकर मानते थे कि राजनैतिक स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक एवं आर्थिक समानता जरूरी है। छुआछूत व ऊंच नीच के खिलाफ हिंदू धर्म का त्याग अंबेड़कर का बहुत बड़ा निर्णय था । आज डा० अम्बेडकर के नाम से वोटों की फसल काटने वाले तो बहुत हैं पर उनके दिखाए रास्ते पर बहुत कम ही चलते हैं. इसी वजह से अंबेड़कर का  दलित-पिछड़ों के समन्वय का सपना मर गया सा लगता है । अभी भी भीमराव अंबेडर का सपना अधूरा  है। गांव में रहने वाले दलित अभी भी त्रस्त हैं जब तक उन्हे गरीबी की रेखा से ऊपर नही लाया जाता , उनके लिए समाज के दूसरे वर्गों में सम्मान व बराबरी का भाव नहीं आ जाता तब तक अंबेडकर का मिशन बराबरी पूरा नहीं  होगा ।

भीमराव सिर्फ दलित समस्याओं पर नहीं सोचते थे अपितु ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते जिसमें सभी को न्याय मिले । आज चिंतन की आवश्यकता है कि अंबेड़कर को हम केवल दलितों तक ही सीमित रखकर उनका स्थान तय न करें क्योंकि डा० अम्बेडकर ऐसे भारत के बारे में सोचते थे जिसमें विषमता न हो । उनका संविधान सभा में दिया हुआ भाषण इस बात का साक्षी है- तब उन्होने कहा था ‘‘ हमने कानून द्वारा राजनीतिक समानता की नींव तो रख दी है पर यह समानता तभी पूरी होगी जब आर्थिक समानता भी देश में स्थापित होगी और इसी समानता को लाने के लिए वें चाहते थे कमजोर वर्ग को आरक्षण का लाभ मिले मगर आरक्षण की उनकी कल्पना केवल 15 वषों की ही थी न कि हमेशा के लिए और यहां तो आरक्षण सवर्ण ,अवर्ण के नाम पर जारी ही नहीं रहा  है वरन् बढ़ा भी  है ।

अंबेडकर सामाजिक एकरूपता के पक्षधर थे और वर्गभेद व जाति तथा संप्रदाय रहित भारत के सपने देखते थे ।भीम भारत को जडों तक जानते थे । अंतिम समय में उन्होने जातिगत आरक्षण का विरोध भी किया था । वे मानते थे एक बार आरक्षण की बैसाखी पर चलने की आदत होने पर दलित व पिछड़ा समाज हमेशा के लिए उसका ‘एडिक्ट’ हो जाएगा व उसकी उन्नति की असली जमीन उसके ही अंदर का चालाक व अमीर वर्ग हथिया लेगा और आज ऐसा ही हो रहा है ।

दलित व आरक्षित वर्ग आरक्षण के लाभों  के चलते हमेशा निशाने पर रहता है व उसे कमतर ही आंका जाता है जबकि उच्चवर्ग भी उन्ही लाभों लिए लगातार आरक्षण की मांग कर रहा है ,और उसे दस प्रतिशत मिल भी गया है  और इस पर दूसरे वर्ग की तीखी प्रतिक्रिया भी आ रही है ,कहा जा रहा है कि अप्रत्यक्ष रूप से उसे ४९ प्रतिशत आरक्षण हासिल है । भीमराव ने बहुत पहले ही ताड़ लिया था कि राजनैतिक फायदे के चलते कुछ दल व लोग गलत तरीके से आरक्षण का लाभ लेंगें और भारतीय समाज और भी ज्यादा टूटन का शिकार हो जाएगा और आज हम वही होता देख भी रहे हैं । ऐसे दूर दृष्टा  को उनकी जयंती पर नमन ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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