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फिर सजा सिर पर ताज, धामी करेंगे देव भूमि पर राज

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– घनश्याम बादल

भाजपा हाईकमान ने उत्तराखंड में हर बार सत्ता बदलने की परिपाटी को तोड़ने वाले युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी पर ही एक बार फिर से विश्वास जताते हुए उनके सर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का कार्य ताज रख दिया है । उत्तराखंड , जिसका निर्माण 1999 में एक लंबे आंदोलन एवं पहाड़ की भावनाओं को सम्मान देने के नाम पर हुआ था,  ऐसा राज्य है जहां हर बार वहां के लोगों ने सरकार चलाने के लिए अलग दल को वरीयता दी है और ऐसा माना जा रहा था कि इस बार भी शायद इसी परंपरा का निर्वहन होगा । राज्य में होने वाले कई राजनीतिक सर्वेक्षणों एवं एग्जिट पोल करने वाली कई एजेंसियों ने भी कांटे की टक्कर का कयास लगा रखा था और हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने तो चुनाव के बाद दावे के साथ खम ठोक कर कहा था कि इस बार उसे 48 या उससे भी ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में विजय हासिल होने जा रही है  लेकिन जनता के मन को कौन पढ़ पाया है ।  हरीश रावत जैसे अनुभवी एवं खाटी राजनीतिज्ञ भी जनता को लुभाने में नाकामयाब रहे और कांग्रेस के हिस्से में केवल 19 सीट ही आईं जबकि भाजपा को अनुमान के विपरीत और उम्मीदों से कहीं ज्यादा 47 सीटों पर विजय प्राप्त हुई यानी 70 सीटों में से लगभग 70% सीटों पर ही उसने विजयश्री प्राप्त की ।

मुख्यमंत्री चुनने के मुद्दे पर सबसे बड़ा पेंच तब फंसा जब खटीमा विधानसभा क्षेत्र से उसके मुख्यमंत्री के चेहरे एवं राज्य सरकार के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं खटीमा क्षेत्र से कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी से लगभग 7000 वोटों से चुनाव हार गए यानी जीत की खुशी के गुलाबी रंग के  के बीच एक काला टीका भी भाजपा के दामन पर लग गया ।  तब कयास लगाए जा रहे थे कि संभवत है भारतीय जनता पार्टी पूर्व में हिमाचल विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीत दिला कर भी हार जाने वाले हिमाचल के मुख्यमंत्री की तर्ज पर ही उत्तराखंड में भी सरकार चलाने के लिए शायद धामी को पहली पसंद नहीं बनाएगी लेकिन हुआ इसके विपरीत ही और युवा धामी पर भाजपा  हाईकमान  यदि सूत्रों की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ होना उनके पक्ष में गया और अनिल बलूनी, धन सिंह रावत, रमेश पोखरियाल निशंक जैसे बड़े नामों द्वारा मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के बावजूद पुष्कर सिंह धामी दूसरी बार मुख्यमंत्री मंत्री पद पर काबिज हो गए ।पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के  लगातार दूसरी बार सीएम बनेंगे यह भी उत्तराखंड के इतिहास में एक नया आया होगा क्योंकि अब तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार दूसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है ।

उत्तराखंड में 6 माह के कार्यकाल में सीएम के रूप में धामी ने अपनी अलग ही छाप छोड़ी थी । धामी भले ही चुनाव हार गए थे, लेकिन उनके विधानसभा क्षेत्र खटीमा समेत राज्य के दूसरे इलाकों से धामी को दोबारा सीएम बनाए जाने को लेकर प्रदर्शन किया था । कार्यकर्ताओं और धामी समर्थको के अनुसार धामी को जब सूबे की सत्ता दी गई थी तो भाजपा की हालत काफी कमजोर थी. सत्ता की चाबी मिलने के बाद धामी ने राज्य में ऐसा बदलाव किया कि भाजपा को राज्य में जबरदस्त सफलता मिली । यदि करीब 1 साल पीछे पलट कर देखें तो भारतीय जनता पार्टी 2017 के चुनाव में जब सत्ता में आई और कांग्रेस को उसने बाहर किया तब भी पार्टी में मुख्यमंत्री पद के कई महारथी दावेदार थे जिनमें भगत सिंह कोश्यारी भुवन चंद्र खंडूरी एवं रमेश पोखरियाल निशंक सबसे आगे थे लेकिन पार्टी ने तब सबको चौक आते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक की पृष्ठभूमि वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत के सर पर मुख्यमंत्री का ताज रखा था।  त्रिवेंद्र सिंह के बारे में एक धारणा थी कि मैं एक बेहद इमानदार कम बोलने वाले तथा कुशल प्रशासक हैं मंत्री के रूप में भी वह शांत रहकर काम करते रहे थे लेकिन पहली सरकारों की तरह ही महज चार साल से भी कम समय के कार्यकाल में ही त्रिवेंद्र सिंह रावत से उत्तराखंड के भाजपा कार्यकर्ताओं एवं हाईकमान का मोहभंग हो गया और उन्हें चार साल भी पूरे नहीं करने दिए गए।

तीरथ सिंह रावत को उनकी जगह उत्तराखंड का मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया जिसके पीछे धारणा यह थी कि तीरथ सिंह रावत ऊर्जा से भरे हुए एवं अगली पंक्ति में रहकर नेतृत्व प्रदान करने वाले नेता सिद्ध होंगे मगर तीरथ सिंह रावत के तीन महीने के ही कार्यकाल में सब कुछ उलट-पुलट हो गया उनके वक्तव्य लगातार विवादित होते रहे और हाईकमान को साफ दिखाई देने लगा कि इनके नेतृत्व में यदि चुनाव लड़ा गया तो भाजपा का उत्तराखंड से सूपड़ा साफ होना तय है इसलिए आनन-फानन में भाजपा ने युवा एवं साफ छवि के विधायक पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड की गद्दी पर बैठा दिया उन्हें केवल 6 महीने का ही समय चुनावों से पहले मिला लेकिन उनकी कार्यशैली प्रशासन पर पकड़ एवं अपने से वरिष्ठ नेताओं के साथ मिलकर काम करने की क्षमता के साथ-साथ अपने साथियों को संतुष्ट करने की कला ने न केवल भाजपा नेतृत्व को प्रभावित किया अपितु आमजन में भी एक काम करने वाले भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि गढ़वी गढ़ दी जिसके चलते हुए भाजपा को उत्तराखंड में स्पष्ट बहुमत मिला वैसे चुनाव के बाद भी भाजपा को भी यह विश्वास नहीं था कि इतना बड़ा बहुमत उसे उत्तराखंड में मिल जाएगा जिसके चलते हुए उसने जोड़-तोड़ के माहिर खिलाड़ी कैलाश विजयवर्गीय और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को सक्रिय कर दिया था जिससे यदि वह बहुमत से थोड़ी दूर रह जाती है तो जोड़-तोड़ करके दूसरे दलों के विधायकों को भाजपा से जोड़कर सरकार बनाई जा सके ।

एक बार फिर पलट कर देखते हैं तो एक बार पहले भी विधानसभा के चुनावों में  ऐसी स्थिति बनी थी जब भाजपा को 31 एवं कांग्रेस को 32 सीट मिली थी लेकिन तब जोड़-तोड़ करके भाजपा सत्ता पर काबिज हो गई थी । इस बार भी ऐसी ही आशंका कहीं न कहीं दोनों बड़े दलों कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी  में थी और दोनों ही दल जोर तोड़ की गोटियां बिठाने में लगे थे मगर जनता जनार्दन अपना निर्णय बहुत ही स्पष्ट विवेक के साथ देते हुए एक बार फिर से भाजपा को जब सत्ता सोंपी तब एक संदेश यह भी गया कि इस बार भाजपा की सत्ता में वापसी पुष्कर सिंह धामी के चेहरे की वजह से भी हुई है ।  अतः धामी स्वभाविक रुप से मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल गए थे बावजूद इसके कि वह अपना चुनाव हार बैठे। राजनैतिक विश्लेषकों का यहां यह भी मत था कि यदि पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड की गद्दी सोंपी जाएगी तो एक गलत मैसेज भी जाएगा और विपक्षी इस बात को एक मुद्दा बना लेंगे कि जिस व्यक्ति को उसके क्षेत्र की ही जनता ने नकार दिया उसे प्रदेश की जनता पर लाद दिया गया है।

धामी की खटीमा से हार के बाद भाजपा में भी मुख्यमंत्री पद चाहने की ख्वाहिश है बढ़ गई थी और ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ साथ ही सतपाल महाराज एवं मदन कौशिक भी इस लाइन में शामिल थे लेकिन भाजपा हाईकमान ने उत्तराखंड में जीत दिलाने के पुरस्कार के रुप में ताज रखा युवा पुष्कर सिंह धामी के सिर पर जहां यह पार्टी को प्रदेश में जीत दिलानी का पुरस्कार है वही भाजपा की वयोवृद्ध लोगों को नेतृत्व में सपने की नीति का भी एक परिणाम है अस्तु धामी की लॉटरी खुल गई है और वे अब उत्तराखंड को अपनी नए कार्यकाल में नई दिशा देने के लिए चुन लिए गए हैं।

ध्यान रहे बहुमत के बावजूद पुष्कर सिंह धामी की राह आसान नहीं रहने वाली हैं उन्हें मिली हार बार-बार पार्टी के अंदर से भी उन्हें नीचा दिखाने के लिए प्रयोग में लाई जाएगी विपक्षी पार्टियां स्वाभाविक रूप से उनके रास्ते में रोड़े बिछाने का काम करेंगी ही वही भाजपा में वरिष्ठ नेताओं की लंबी कतार ढाणी को अंदर खाने सफल होने से रोकने का प्रयास इसलिए भी कर सकती है क्योंकि यदि युवा धामी सफल होते हैं तो इन नेताओं की राजनीतिक पारी समाप्त भी हो सकती है साथ ही साथ प्रदेश में मैदान एवं पहाड़ के नाम पर जो संघर्ष एवं दुराव है वह भी धामी को परेशान करेगा । फिर हरीश रावत भी कांग्रेस में प्राण फूंकने और अपने राजनैतिक अंत को बचाने के प्रयास के तहत उन्हें घेरे रहेंगे । पर राजनीति में तो यह सब होता ही रहता है जनता की अपेक्षाएं एवं आकांक्षाएं भी होंगी हाईकमान के अपने प्रत्यक्ष एवं प्रश्न लक्ष्य भी होंगे ऐसे में धोनी को सिद्ध करना पड़ेगा कि उनमें युवाओं की ऊर्जा के साथ साथ राजनीतिक अनुभव भी है और यदि धामी ऐसा कर पाए तो आने वाले समय में वह एक लंबी रेस के घोड़े भी सिद्ध होंगे ।

उत्तराखंड निवासी लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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