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केंद्र सरकार ने दिल्ली की तीनों नगर निगमों को एक करने के प्रस्ताव को दी मंजूरी

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नई दिल्ली (मा.स.स.). दिल्ली की नगर निगमों को अब एक करने का फैसला लिया गया है. केंद्र सरकार ने इस फैसले पर मुहर लगा दी है और अब तीनों नगर निगम की जगह एक ही होगी और पूरी दिल्ली में एक ही महापौर होगा. पिछले कुछ सालों से तीन अलग अलग नगर निगम के जरिए काम किया जा रहा है, लेकिन अब ये पावर एक स्थान पर केंद्रित होने जा रही है. केंद्र सरकार ने दिल्ली में तीनों नगर निगम को एक करने का फैसला किया है. केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद तीनों नगर निगमों को एक करने के साथ ही 272 वार्ड ही रखे जाएंगे, लेकिन मेयर का कार्यकाल बढ़ाकर कम से कम ढाई साल किया जा सकता है. माना जा रहा है कि दिल्ली नगर निगम को तीन निगमों में विभाजित करने का प्रयोग अब तक असफल रहा है.

अभी दिल्ली में तीन नगर निगम हैं, जिनमें साउथ दिल्ली, नॉर्थ दिल्ली, ईस्ट दिल्ली शामिल है. बता दें कि एसडीएमसी में सेंटर, साउथ वेस्ट और नजफगढ़ के इलाके आते हैं. वहीं, एनडीएमसी में रोहिणी, सिविल लाइंस, करोल बाग, सदर पहाड़गंज, केशवपुरम, नरेला आते हैं. वहीं, तीसरी नगर निगम ईडीएमसी में शाहदरा नॉर्थ, शाहदरा साउथ के इलाके आते हैं. बता दें कि तीनों नगर निगम को एक करने का ये फैसला पहली बार नहीं किया गया है, क्योंकि साल 2012 से पहले दिल्ली में एक ही नगर निगम की व्यवस्था थी, जिसमें बाद में विभाजित करके तीन नगर निगम बनाए गए. उस वक्त तर्क दिया गया था कि ऐसा करने से नगर निगम के कामकाज में सुधार लाया जा सकेगा और ये प्रभावी तरीके से जनता को सेवाएं दे सकेंगी हालांकि, अब कहा जा रहा है कि ये प्रयोग असफल रहा है.

साल 2011 में जब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित होती थीं, तो उन्होंने दिल्ली विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसे केंद्र सरकार ने अपनी स्वीकृति दी थी और जिसके बाद तीनों नगर निगमों का पहली बार चुनाव 2012 में हुआ. उस समय दिल्ली और केंद्र दोनों जगहों पर कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का राज था. अब सवाल है कि तीनों नगर निगमों के एक होने के बाद दिल्ली में क्या बदलाव होने वाला है. दरअसल, माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद फिर से दिल्ली को एक महापौर मिलेगा और अगर मेयर-इन- काउंसिल की व्यवस्था अपनाई जाती है तो दिल्ली की जनता पार्षद और महापौर का सीधा चुनाव कर सकेगी. ऐसे में कई लोगों का मानना है दिल्ली की ओर से चुना गया महापौर दिल्ली के मुख्यमंत्री के बराबर भी हो सकता है, क्योंकि उसे एक बड़े वर्ग द्वारा चुना जाएगा.

हालांकि, अभी वार्ड घटाने या बढ़ाने को लेकर फैसला होना बाकी है. 272 की जगह दिल्ली नगर निगम में कुल वार्ड 170 से 210 के बीच हो सकते हैं, क्योंकि एक विधानसभा में दो या तीन वार्ड बनाए जा सकते हैं. इसके अलावा एक नगर निगम होने पर रिजर्वेशन सिस्टम पर पेंच फंस सकता है. निगम में रिजर्वेशन की नई स्थिति होगी, किस समुदाय के कितनी सीटों रिजर्व रहेंगी और महिलाओं के लिए कितनी सीट आरक्षित होंगी. इस फैसले पर निर्धारित होगा कि किस तरह से दिल्ली की परिस्थिति बदलेगी. कुछ तर्क ये भी दिए जा रहे हैं कि इससे निगम पर होने वाले खर्चे में कमी आएगी, क्योंकि वर्तमान में निगम का खर्चा 3 जगह बांटा जाता है, जिससे से बोझ बढ़ता है. अब देखना है कि नई व्यवस्था को किस तरह लागू किया जाता है और पैसे आदि का बंटवारा कैसे होता है.

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