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मानव की करतूतों से तपती धरती,चढ़ा बुखार

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– डॉ0 घनश्याम बादल

कोरोना की महामारी ने जहां सारी दुनिया  को हिला कर रख दिया है वहीं इस महामारी का एक सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिला है और वह है पृथ्वी के तापमान व पर्यावरण में सुधार होना । कई – कई किलोमीटर से पर्वतो का नज़र आना , पशु पक्षियों का बदला व्यवहार व उनका दिखना , प्रदूषण का हैरतअंगेज तरीके से कम हो जाना। यें सब पृथ्वी के अस्तित्व व जीवन के लिए एक सकारात्मक लक्ष्ण है । मगर , यदि इस महामारी के बाद पृथ्वी पर जीवन रहेगा तभी न !

पर,  क्या हम स्वयं ही जीवन के सबसे बड़े आधार पृथ्वी को बचाने की तरफ भी ध्यान देंगें यह चिंता व चिंतन का विषय है । लंबे समय से हम स्वयं धरती के लिए संकट खड़े करते रहे हैं ।22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस पर सारी दुनिया उस धरती की चिंता करती है जो जीवन का आधार है । पर बेहतर होता कि हम धरती को बीमार ही ना होने देते और उसे तापमान के रूप में बुखार से बचा लेते।

धरती  है जीवन आधार :

भले ही पृथ्वी का कुल 66 प्रतिशत भाग आज भी जल से ढका हो और 33 प्रतिशत भाग ही थल हो पर जीवन का करीब 70 से 80 प्रतिशत तक हिस्सा थल पर ही है । जल में यदि जीवन है भी तो भी वहां मानव जीवन की उपस्थिति न के बराबर है केवल जलचर ही जलीय जीवन के अंग हैं।

संकट की जड़ मानव:

पृथ्वी के निर्माण की अद्भुत घटना से लेकर आज तक पषु , पक्षी और मानव अंतिम आसरा पृथ्वी पर ही देखते हैं । पर, पृथ्वी को नुकसान पंहुचाने वालों में पशु पक्षी नहीं वरन ‘‘माताभूमिः पुत्रोअहंपृथ्वियाः’’ का उद्घोष करने वाला मानव सबसे आगे है । अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते उसी ने जल , थल व आकाष और पर्यावरण को दूषित करके  सबसे ज्यादा हानि पंहुचाई है ।

पृथ्वी बचाओ आंदोलन :

 दूरदृष्टा विद्वानों ने पृथ्वी को संकट में देखकर 1970 की 22 अप्रैल से पृथ्वी दिवस मनाने की शुरुआत की। सबसे पहले  20 लाख अमेरिकियों ने स्वस्थ पर्यावरण के लक्ष्य को लेकर दुनियाभर में पृथ्वी दिवस मनाना शुरु किया । संयुक्तराष्ट्रसंघ ने भी इसे प्रोत्साहन दिया । अमेरीकी सीनेटर नेल्सन के नेतृत्व में शुरु हुआ यह आंदोलन 1991 आते आते यह 141 देशों में पंहुच चुका था और आज इस दिवस को सारी दुनिया के कम से कम 194 देश मना रहे हैं ।

पर्यावरण का फिक्र :

1992 में रियो डी जेनेरियो में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में पृथ्वी पर संकटों पर गहन विचार ने इस दिन का महत्व और भी बढ़ा दिया तब से लगातार पृथ्वी की रक्षा करने व उसे बचाने के उपायों पर मंथन हो रहा है । 22 अप्रैल 2000 को इंटरनेट ने भी 184 देशों के करीब 500 समूहों को जोड़कर पर्यावरण के प्रति चिंता को स्वर दिया । प्राकृतिक संतुलन को बचाने की कवायद को रेखांकित करता है पृथ्वी दिवस । आज पृथ्वी दिवस ही वह दिन है जब सारी राष्टीय सीमाओं को ताक पर रख  सारा संसार पृथ्वी के अस्तित्वकी रक्षा पर एक साथ स्वर मिलाता है।

पिघलते ग्लेशियर्स के ख़तरे:

आज के तेज जीवन में अपनी आवष्यकताओं की पूर्ति हेतु जल , जंगल और ज़मीन के संघर्ष में पृथ्वी को प्रदूषण का भी षिकार होना पड़ा है जिसके चलते भूमंडल का तापमान बढ़ा है जिससे ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं जन्मी है, और ग्लोबल वार्मिंग के चलते आज पृथ्वी के धु्रवों पर जमे बर्फ व ग्लेशियर्स के पिघलने को खतरा सामने है । एक अनुमान है कि यदि किसी भी वजह से यें ग्लेशियर्स पिघल गए तो पूरी धरती ही जलमग्न हो जाएगी और उस पर करीब 10 मीटर पानी की परत होगी जिसका सीधा सा मतलब यह है कि ऐसा होने पर पृथ्वी से वें सारे जंतु मानव समेत गायब हो जाएंगे जो केवल ज़मीन पर ही जीने की कला जानते हैं ।

फिर भोजन श्रंखला प्रभावित होगी और जलीय जंतु भी खत्म हो जाएंगें । साफ सी बात है धरती है तो जीवन है । ज्ञात हो कि इस समय दुनिया में करीब 4 बिलियन लोग हैं और करीब 10 मिलियन रोज पैदा हो रहे हैं सोचिए यदि धरती ही नहीं रही तो क्या होगा ? एक सर्वे में पाया गया ह कि यदि समय रहते बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण नही किया गया तो 2035 तक यें ध्रुवीय ग्लेशियर्स पिघल सकते हैं । हालांकि कुछ दूसरे अनुमान इसे झुठलाते भी है पर सोचिए कहीं गलती से भी पहला अनुमान सच हो गया तो क्या होगा ? आज पृथ्वी दिवस पर कुछ बहुत ही सरल से काम करने पर हम आसानी से पृथ्वी को आने वाले संकटों से बचा सकते हैं ।

कैसे बचेगी धरती ?

प्रदूषण फैलाएं:

प्रदूषण फैलने का मतलब है वायुमंडल व जलमंडल का संतुलन बिगड़ना । जहरीली गैसे वैसे ही पृथ्वी का भी दम घोटती हैं जैसे हमारा , उसका तापमान वैसे ही बढ़ता है जैसे हमें बुखार होता है उसका भी स्वस्थ्य गड़बड़ हो जाता हैं और अंतिम परिणाम होता है ‘गलोबल वार्मिंग । तो संकल्प लें कि हम किसी भी हाल में प्रदूषण फैलाने का हिस्सा नहीं बनेंगें ।

पूल वाहन प्रणाली अपनाएं:

हम आने जाने के लिए वाहनों का इस्तेमाल करते हैं । वाहनों के इस अधिकाधिक प्रयोग से वायुमंडल में कार्बनडाइ ऑक्साइड , कार्बन मोनो ऑक्साइड , जैसी गैसों के साथ धुंआ भी निकलता है परिणामतः वायु प्रदूषित हो जाती है और पृथ्वी असुरक्षित ।  उसका तापमान बढ़ता चला जाता है तो  अच्छा हो कि हम पूल वाहन प्रणाली अपनाकर एक ही वाहन का प्रयोग करें इससे बचत भी होगी और प्रदूषण का स्तर भी काबू हो जाएगा ।

जंगल काटें :

वृक्ष पर्यावरण संतुलन के सबसे बड़े सो्रत हैं , वें जलवायु , मौसम , नमीं , के साथ बाढ़ को भी नियंत्रित करते हैं पर लगातार पेड़ काटने से हमारे लिए ही खतरे की घंटी बज उठी है । अतः यथासंभव वृक्षों के कटान को रोकें, लकड़ी केे विकल्प के रूप में प्लास्टिक , लोहे , फाइबर तथा दूसरे  विकल्प तलाशें । कागज़ के उपयोग पर भी ब्रेक लगाना होगा तभी पेड़ और धरती दोनों बच पाएंगें ।

पशु पक्षियों को बचाएं :

पशु पक्षी भी पर्यावरण संतुलन के लिए जरुरी हैं पर, उनकी संख्या घटती जा रही है इससे भोजन श्रंखला में संतुलन बिगड़ा है जिससे प्राकृतिक विनाष को बढावा मिला है पषुओं पक्षियों के अंगों , हड्डियों , रक्त व मांस तथा बालों के उत्पादों को ना कहना सीखना होगा ताकि पृथ्वी के यें संतानें भी सुरक्षित रहें और पृथ्वी भी ।

खनन रोकें:

लगातार खनन से भी धरती की परत क्षतिग्रस्त होती है , इससे भू – स्खलन की संभावना बलवती होती है जो खतरनाक है परिणामस्वरुप भूकंप तक आते हैं जिससे धरती प्रभावित होती है । बेहतर हो कि हम अपने लालच को छोड़ें और सरकारें भी इस संदर्भ में ईमानदार हों ।

जागरुकता लाएं:

सबसे प्रभावशाली कदम होगा लोगों में पृथ्वी की सुरक्षा को लेकर एक जागरुकता पैदा करें ,उनमें धरती के प्रति लगाव पैदा किया जाए उन्हे बताया जाए कि यदि धरती ही नहीं रही तो कुछ भी नहीं रहेगा , धरती बीमार होगी तो सब बीमार होगें , धरती पर संकट होगा तो सब पर संकट होगा। आइए , इस पृथ्वी दिवस पर धरती के कल्याण व उसकी सेहत और सुरक्षा की मुहिम आज से ही  शुरू करें ।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं.

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