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अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष एवं विश्व बैंक ने गरीबी में आई कमी के लिए भारत को सराहा

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– प्रहलाद सबनानी

अभी हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने “महामारी, गरीबी और असमानता: भारत से मिले साक्ष्य” विषय पर एक शोधपत्र जारी किया था, जिसके अनुसार भारत में अत्यंत गरीबी में बहुत तेजी से गिरावट दर्ज की गई है एवं यह अब 0.8 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई है।  अत्यंत गरीब उस व्यक्ति को माना जाता है जिसकी प्रतिदिन आय 1.9 अमेरिकी डॉलर से कम है। इसके तुरंत बाद अब विश्व बैंक ने भी एक पॉलिसी रिसर्च वर्किंग पेपर (शोध पत्र) जारी किया है। इस शोध पत्र के अनुसार वर्ष 2011 से 2019 के बीच भारत में गरीबों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2011 में भारत में गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे व्यक्तियों की संख्या 22.5 प्रतिशत थी जो वर्ष 2019 में घटकर 10.2 प्रतिशत पर नीचे आ गई है अर्थात गरीबों की संख्या में 12.3 प्रतिशत की गिरावट दृष्टिगोचर है।

अत्यंत चौंकाने वाला एक तथ्य यह भी उभरकर सामने आया है कि भारत के शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की संख्या बहुत तेज गति से कम हुई है। जहां ग्रामीण इलाकों में गरीबों की संख्या  वर्ष 2011 के 26.3 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2019 में 11.6 प्रतिशत पर आ गई है अर्थात यह 14.7 प्रतिशत से कम हुई है तो शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 7.9 प्रतिशत से कम हुई है। उक्त शोधपत्र में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी बताया गया है कि वर्ष 2015 से वर्ष 2019 के बीच गरीबों की संख्या अधिक तेजी से घटी है।

वर्ष 2011 से वर्ष 2015 के दौरान गरीबों की संख्या 3.4 प्रतिशत से घटी है वहीं वर्ष 2015 से 2019 के दौरान यह 9.1 प्रतिशत से कम हुई है और यह वर्ष 2015 के 19.1 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2019 में 10 प्रतिशत पर नीचे आ गई है। वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 के दौरान तो गरीबी 3.2 प्रतिशत से कम हुई है यह कमी पिछले दो दशकों के दौरान सबसे तेज गति से गिरने की दर है। ग्रामीण इलाकों में छोटे जोत वाले किसानों की आय में वृद्धि तुलनात्मक रूप से अधिक अच्छी रही है जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में गरीबों की संख्या वर्ष 2015 के 21.9 प्रतिशत से वर्ष 2019 में घटकर 11.6 प्रतिशत पर नीचे आ गई है, इस प्रकार इसमें 10.3 प्रतिशत की आकर्षक गिरावट दर्ज की गई है। उक्त शोधपत्र में यह भी बताया गया है कि बहुत छोटी जोत वाले किसानों की वास्तविक आय में 2013 और 2019 के बीच वार्षिक 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है वहीं अधिक बड़ी जोत वाले किसानों की वास्तविक आय में केवल 2 प्रतिशत की वृद्धि प्रतिवर्ष दर्ज हुई है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने तो अपनी रिपोर्ट में भारत द्वारा कोरोना महामारी के दौरान लिए गए निर्णयों की सराहना करते हुए कहा है कि विशेष रूप से गरीबों को मुफ्त अनाज देने की योजना (प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना) को लागू किए जाने के चलते ही भारत में अत्यधिक गरीबी का स्तर इतना नीचे आ सका है और अब भारत में असमानता का स्तर पिछले 40 वर्षों के दौरान के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। ज्ञातव्य हो कि भारत में मार्च 2020 में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) प्रारम्भ की गई थी। इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा लगभग 80 करोड़ लोगों को प्रति माह प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है एवं इस योजना की अवधि को अभी हाल ही में सितम्बर 2022 तक आगे बढ़ा दिया गया है।

उक्त मुफ्त अनाज, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) के अंतर्गत काफी सस्ती दरों पर (दो/तीन रुपए प्रति किलो) उपलब्ध कराए जा रहे अनाज के अतिरिक्त है। विश्व बैंक के शोधपत्र में यह भी बताया गया है कि पिछले कई दशकों के बाद पहली बार अत्यधिक गरीबी (क्रय शक्ति समता के संदर्भ में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 1.9 डॉलर से कम पर गुजर-बसर करने वाले) में गुजर बसर करने वाले लोगों की संख्या पूरे विश्व में वर्ष 2020 में बढ़ी है। यह वृद्धि पूरे विश्व में फैली कोरोना महामारी के चलते हुई है। भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों की संख्या में आ रही भारी कमी दरअसल केंद्र सरकार द्वारा समय समय उठाए जा रहे कई उपायों के चलते सम्भव हो पाई है। भारत में वर्ष 1947 में 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे, जबकि अब वर्ष 2020 में देश की कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है।

जबकि 1947 में देश की आबादी 35 करोड़ थी जो आज बढ़कर लगभग 136 करोड़ हो गई है। देश में वित्तीय समावेशन को सफलतापूर्वक लागू किए जाने के कारण ही गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी देखने में आई है। केंद्र में वर्तमान मोदी सरकार के कार्यभार ग्रहण करने के बाद से तो वित्तीय समावेशन के कार्यान्वयन में बहुत अधिक सुधार देखने में आया है। उसके पीछे मुख्य कारण देश में विभिन्न वित्तीय योजनाओं को डिजिटल प्लैट्फार्म पर ले जाना है। केंद्र सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।

जब यह योजना प्रारम्भ की जा रही थी तब कई लोगों द्वारा यह सवाल उठाए गए थे कि देश में पहिले से ही इस तरह की कई योजनाएं मौजूद हैं, फिर इस एक और नई योजना को शुरू करने की क्या जरूरत है? अब उक्त योजना की महत्ता समझ में आती है जब जनधन योजना के अंतर्गत करोड़ों देशवासियों के खाते विभिन्न बैंकों में खोले गए हैं एवं इन खातों में आज सीधे ही सब्सिडी का पैसा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा हस्तांतरित किया जा रहा है। मनरेगा योजना की बात हो अथवा केंद्र सरकार की अन्य योजनाओं की बात हो, पहिले ऐसा कहा जाता था कि केंद्र से चले 100 रुपए में से शायद केवल 8 रुपए से 16 रुपए तक ही अंतिम हितग्राही तक पहुंच पाते हैं, परंत आज सहायता राशि के हितग्राहियों के खातों में सीधे ही जमा हो जाने के कारण बिचोलियों की भूमिका एकदम समाप्त हो गई है एवं हितग्राहियों को पूरा का पूरा 100 प्रतिशत पैसा उनके खातों में सीधे ही जमा हो रहा है।

यह वित्तीय समावेशन की दृष्टि से एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है। वित्तीय समावेशन के कुछ अन्य लाभ भी देश में देखने में आए हैं जैसे हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी एक प्रतिवेदन के अनुसार, जिन राज्यों में प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत अधिक खाते खोले गए हैं तथा वित्तीय समावेशन की स्थिति में सुधार हुआ है, उन राज्यों में अपराध की दर में कमी आई है तथा इन राज्यों में अल्कोहल एवं तंबाखु के सेवन में भी कमी आई है। कोरोना महामारी के दौरान भारत में प्रथम सोपान के अंतर्गत गरीब वर्ग को खाद्य सामग्री उपलब्ध करायी गई थी। दूसरे सोपान के अंतर्गत मुफ़्त वैक्सीन दिया जा रहा है जिससे गरीब वर्ग को बीमारियों से बचाए रखा जा सके।

अब जब देश में अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से खुल चुकी है तो अब गरीब वर्ग के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मनरेगा योजना भी ग्रामीण इलाकों में वृहद स्तर पर चलायी जा रही है एवं इससे भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जा रहे हैं। निर्माण एवं पर्यटन क्षेत्र भी अब खोल दिए गए हैं जिससे इन क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर वापिस निर्मित होने लगे हैं। भारत में तो धार्मिक पर्यटन भी बहुत बढ़े स्तर पर होता है एवं धार्मिक स्थलों को खोलने से भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।। इस प्रकार कुल मिलाकर गरीब वर्ग को कमाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध होने लगे हैं जिससे भारत में गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों की संख्या में निरंतर कमी देखने में आ रही हैं। ।

भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान किसानों से खाद्य पदार्थों की खरीद बहुत बड़े स्तर पर की है ताकि देश की 80 करोड़ जनसंख्या को प्रधानमंत्री गरीब अन्न कल्याण योजना के अंतर्गत मुफ़्त में अनाज उपलब्ध कराया जा सके। साथ ही, आज भारत से बहुत बड़े स्तर पर अनाज का निर्यात भी किया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा किसानों से बड़े स्तर पर की जा रही खरीद एवं कृषि पदार्थों के निर्यात के कारण किसानों के हाथों में सीधे ही पैसा पहुंच रहा है इससे किसानों की आय तेजी से बढ़ रही है एवं उनकी खर्च करने की क्षमता में भी वृद्धि दृष्टिगोचर है। साथ ही, गरीब वर्ग को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराकर भी गरीब वर्ग के हाथों में एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से पैसा ही पहुंचाया जा रहा है। इसके साथ ही गोदामों में रखा अनाज भी ठीक तरीके से उपयोग हो रहा है अन्यथा कई बार गोदामों में रखे रखे ही अनाज सड़ जाता है। इस तरह से सरकार द्वारा लिए जा रहे उक्त कदमों के चलते आज देश में गरीबों की संख्या में भारी कमी देखने में आ रही है।

लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं.

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