मंगलवार , मई 17 2022 | 10:49:41 AM
Breaking News
Home / राष्ट्रीय / भगत सिंह : एक मशाल इंकलाब की

भगत सिंह : एक मशाल इंकलाब की

Follow us on:

डॉ घनश्याम बादल

 1907 में पंजाब के लायलपुर गाँव में सरदार किशन सिंह के घर उनकी पत्नी विद्यावती ने जब एक बच्चे को जन्म दिया तब उनके पिता और दोनों चाचा जेल में बंद थे , पर उसके पैदा होते ही तीनो छूट गए । इस वजह से दादा अर्जुन सिंह व दादी जैकौर अपने इस पोते को प्यार से ‘भागोवाला’ कहती  थीं।  यह वही बच्चा था जिसे दुनिया ने शहीद ए आजम, क्रांतिकारी शिरोमणि और भगतसिंह जैसे नामों से जाना। 24 वर्ष से भी कम आयु में ही 23मार्च 1931 को सुखदेव व राजगुरु के साथ राष्ट्र की बलि वेदी पर चढ़ जाने वाले भगतसिंह के जीवन पर एक दृष्टिपात का दिन है आज।

चाचा थे आदर्श :

चाचा अजीत सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे क्रांतिकारियों को अपना आदर्श मानने वाले   व बचपन से ही क्रांतिकारियों की जीवनियाँ पढने वाले भगत सिंह  बड़े तर्क शील थे उनके  तर्कों को काटना मुश्किल था । गरम खून के भगत सिंह को बचपन से ही  देश पर राज करते अंग्रेज  उन्हेंफूटी आंख नहीं सुहाते थें और वें पल पल चाहते थे कि वें भारत छोड़ जाएं । उनके अत्याचारों से भगत  तिलमिलाए रहते थे ।

जलियांवाला बाग ने हिलाया:

1919 में जलियांवाला बाग की घटना से तो भगत सिंह क्रोध से जल उठे और घटना के अगले दिन स्कूल जाने के बहाने सीधे जलियांवाला बाग पहुंचे और खून सनी मिटटी को उस बोतल में भर लिया जिसे वो अपने साथ लाये थे , बालक भगतसिंह  उस मिटटी पर रोज फूल माला चढाते थे।

कालेज में मिले साथी:

नेशनल कालेज में भगत सिंह का परिचय उग्र विचारों के  सुखदेव , भगवती चरण वोहरा  ,यशपाल ,विजयकुमार ,छैलबिहारी , झंडा सिंह और जयगोपाल से हुआ ।  सुखदेव और भगवतीचरण भगत सिंह के सबसे घनिष्ट मित्र थे ,भगत सिंह और सुखदेव तो एक प्राण दो देह हो गये , तीनो मित्रों पर समाजवाद और कम्युनिज़्म व, मार्क्स की पुस्तकों का गहरा प्रभाव हुआ । घरवालों के  विवाह करने को कहने पर  भगत सिंह ने कहा कि उनका विवाह तो आजादी से हो चुका है और विवाह की बेड़ियाँ वो अपने पैर में नहीं पहन सकते ।

आग से भरे भगत:

आग से भरे भगत सिंह के समाजवादी विचारों से आजाद बहुत प्रभावित थे जल्दी ही भगत सिंह आजाद के प्रिय बन गए उस समय तक रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान के शहीद होने से आजाद अकेले पड़ गए थे किन्तु भगत सिंह ने उन्हें हिम्मत दी और  सुखदेव  व राजगुरु से मिलवाया जो कुशल निशानेबाज और बहुत साहसी थे ।

प्रतिशोध की ठानी :

लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के समय लाला लाजपतराय पर पुलिस अधिकारी स्काॅट के सहयोगी सांडर्स ने लाठी से प्रहार किया जिससे लालाजी के सीने पर गंभीर चोटें आयीं और 17 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी । भगत सिंह ,सुखदेव ,आजाद और राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की ठानी , इसके सूत्र धार सुखदेव बने ,भगत सिंह और राजगुरु को स्काट को मारने का काम सौंपा गया और चंद्रशेखर आजाद को उन दोनों की रक्षा का । घटना वाले दिन जयगोपाल के इशारा करने पर भगत सिंह और राजगुरु ने स्काट के धोखें में सांडर्स का वध कर  दिया , क्योंकि मुखबिरी करने वाले जयगोपाल से पहचानने में चूक हो गयी थी , और एक अन्य सिपाही भी मारा गया मगर तीनो घटना स्थल से सुरक्षित निकल गए ।

दाढ़ी मुंडवा पहना हैट :

सांडर्स की हत्या ने पूरे देश में खलबली मचा दी और पुलिस भगत सिंह , चंद्रषेखर  आजाद  और राजगुरु को ढूँढने लगी ,भगत सिंह ने अपनी दाढ़ी मुंडवा ली और हैट ,व ओवरकोट  पहन कर दुर्गा भाभी और राजगुरु के साथ सुरक्षित निकल गए ।

सरफरोशी की तमन्ना :

भगत सिंह ने फ्रांस के क्रांतिकारी वेलां से बहुत प्रभावित थे उन्होंने वेलां की तरह संसद में बम फोड़ कर सबको चैंका देने की सोची । आजाद को भी योजना पसंद आई पर वें भगत सिंह को इस काम पर भेजना नहीं चाहते थे किन्तु भगत सिंह सरफरोशी की तमन्ना की ज़िद के आगे विवश हो  स्वीकृति देनी पड़ी ।

ताकि माहौल बना सकें … 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को संसद में बम फेंकने के बाद भागने की बजाय अपने को गिरफ्तार करवाया ताकि वो मुकदमे के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक माहौल बना सकें । उन्होने जानबूझ कर संसद में खाली जगह पर दो बम फोड़े  । और जोर से -”इन्कलाब जिंदाबाद!” और साम्राज्यवाद का नाश हो !  के नारे लगाए और पर्चे फेंके जिनमें लिखा था ” बहरों को सुनाने के लिए लिए धमाके की आवश्कयता होती है । “  उसके बाद उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार करवाया।  इस घटना ने वायसराय के साथ इंग्लैंड को भी हिला कर रख दिया और भगत सिंह  व उनके साथी नौजवानों की प्रेरणा बन गए और उनका दिया गया नारा ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ राष्ट्रीय नारा बन गया और देष में अंग्रेजों के खिलाफ एक माहौल बन गया।

अंग्रेजी हुकूमत को चेतावनी:

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चला और मुकदमे में भगत सिंह ने अपना बयान दिया – ”हमने बम किसी की जान लेने के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को यह चेतावनी देने के लिए फोड़ा की भारत अब जाग रहा है , तुम हमें मार सकते हो पर हमारे विचारों को नहीं जिस प्रकार आयरलैंड और फ्रांस स्वतंत्र हुआ उसी प्रकार भारत भी स्वतंत्र हो कर रहेगा और भारत के स्वतंत्र होने तक नौजवान बार बार अपनी जान देते रहेंगे और फांसी के तख्ते पर चिल्ला कर कहेंगे -”इन्कलाब जिंदाबाद“!

डरे ही झुके:

सिंह और दत्त के बयानों ने उन्हें जननायक बना दिया । पर , जयगोपाल सरकारी गवाह बन गया । लाहौर षड्यंत्र केस में जयगोपाल की गवाही बहुत खतरनाक सिद्ध हुई. भगत सिंह और उनके साथियों ने मुकदमे को बहुत लम्बा खींचा ,कभी कभी भगत सिंह ऐसे बयान दे देते जिससे जज तिलमिला उठता था । अंग्रेजों ने भगत सिंह और सुखदेव को भी एक दूसरी के प्रति भड़काने का प्रयत्न किया लेकिन वें विफल रहे और अंत में अंगे्रजी हुकूमत के इषारे पर उन्हे फांसी की सजा सुना दी गई । पर इससे भी वें न डरे न ही झुके ।

जज़्बा देखिए:

जज़्बा देखिए मौत सामने देखकर भी भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में क्रांतिकारियों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में  भूख हड़ताल की , हड़ताल तोड़ने की हर कोशिश  असफल हुई , और  जनता का गुस्सा अंग्रेजों के प्रति और क्रांतिकारियों के प्रति प्रेम बढ़ता जा रहा था, भगत सिंह के समर्थन में पूरे देश में आजादी के दीवानों ने भूख  हड़ताल शुरू कर दी जिससे अंग्रेजी हुकूमत बहुत डर गयी । इस बीच  जेल में भूख हड़ताल के दौरान क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु ने हालात और बगावत पैदा कर दी खराब कर दिए अंततः  सरकार को झुकना पड़ा और जेलों की दषा में काफी सुधार करने पड़े

24 के भी नहीं थे भगत:

फांसी के लिए 24 मार्च 1931 की तारीख तय हुई पर जनता के आक्रोष के डर से अंग्रेजों ने 23 मार्च को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया । मृत्यु के समय भगत सिंह तो पूरे 24 साल के भी नहीं थे वें 28 सितंबर को 24 साल के होते । प्रशासन की संवेदनहीनता इतनी थी कि इन शहीदों के षव तक उनके घर वालों को नहीं दिए गए ।

देश के कण कण में बसे:

अब लाशें मिलें न मिलें पर आज भी भगत सिंह अपने साथी शहीदों के साथ देष के कण कण में बसे हैं ओर उनकी शहादत ने ही भगतसिंह को सरदार और शहीद ए आजम जैसे नाम दिलवा रखे हैं । भगत सिंह महज़ एक उग्र क्रांतिकारी ही नहीं वरन देशभक्त होने के साथ ही लेखक , शायर व समाज सुधारक थे । उनमें देषभक्ति के जज़्बे के साथ ही देश के विकास के लिए एक दृष्टि व वैचारिक चिंतन भी था ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

नोट : लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है.

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

राजीव कुमार होंगे देश के नए मुख्य चुनाव आयुक्त

नई दिल्ली (मा.स.स.). राजीव कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है। वे 15 …