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जश्न-ए-अदब साहित्य उत्सव का भव्य समापन

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नई दिल्ली. दिल्ली में आयोजित जश्न-ए-अदब साहित्य उत्सव के चौदहवें संस्करण का शानदार समापन सोमवार को हुआ। इस तीन दिवसीय आयोजन ने कला प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जहां साहित्य, संगीत, नृत्य और नाटक के विविध रंग देखने को मिले।

उत्सव का आगाज़ “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” से हुआ, जहां प्रख्यात ग़ज़ल गायक जावेद हुसैन ने अपनी सुरमयी गायकी से समां बांध दिया। इसके बाद प्रसिद्ध कथक गुरु पद्मश्री शोवना नारायण ने अपनी अनुपम नृत्य प्रस्तुति से दर्शकों को मोहित किया। वहीं, महाकवि पद्मभूषण गोपालदास नीरज की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित कवि सम्मेलन “लिखे जो ख़त तुझे” में देश के विख्यात कवियों ने अपनी रचनाओं से शाम को यादगार बना दिया। इस दिन का आकर्षण कवि सम्मेलन, कथा वाचन और मुशायरा भी रहे, जिसने साहित्य प्रेमियों को खूब आनंदित किया।

दूसरे दिन संगीत के सुरों से सजी “महफ़िल-ए-कव्वाली” में राजा सरफराज़ और उनके साथियों की जादुई आवाज़ ने श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। वहीं, पद्मश्री उस्ताद अहमद हुसैन और पद्मश्री उस्ताद मोहम्मद हुसैन ने अपनी मधुर ग़ज़लों से संगीतमयी शाम को नई ऊँचाइयाँ दीं। हास्य का तड़का लगाने के लिए प्रसिद्ध कॉमेडियन रहमान खान ने अपने चुटीले व्यंग्य और हास्य से दर्शकों को खूब गुदगुदाया। इसके अलावा, सूफी और भजन गायन, भाप वादन, कविता पाठ, दास्तानगोई, बैतबाजी और पैनल चर्चाएँ भी इस दिन का मुख्य आकर्षण रहीं।

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अंतिम दिन की शुरुआत सिद्धांत भाटिया के कलेक्टिव बैंड की ऊर्जावान प्रस्तुति से हुई। इसके बाद, राज कपूर के शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक विशेष चर्चा आयोजित की गई। “आवारा हूँ” सत्र में निरुपमा कोटरू, पवन झा और अजय चौधरी ने डॉ. अमना मिर्ज़ा के साथ राज कपूर के जीवन से जुड़े रोचक किस्से साझा किए। समवेत सभागार में थिएटर लिजेंड अरविंद गौड़ द्वारा प्रस्तुत नाटक “अँधा युग” ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। वहीं, “सुर साधना” कार्यक्रम में पद्मभूषण पंडित साजन मिश्रा की मंत्रमुग्ध कर देने वाली गायन प्रस्तुति ने समां बांध दिया। “चन्दन किवाड़- एक सुरीला सफ़र” कार्यक्रम में पद्मश्री मालिनी अवस्थी के लोकगीतों कि प्रतुती दी, जिसने सभी को अपनी जड़ों से जोड़ा। कार्यक्रम का समापन पद्मश्री यश गुलाटी के भावपूर्ण सैक्सोफोन वादन से हुआ, जिसने पूरे आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया। तीन दिन तक चले इस भव्य साहित्य और कला उत्सव ने न केवल दर्शकों को एक अद्भुत सांस्कृतिक अनुभव दिया, बल्कि साहित्य, संगीत और रंगमंच की समृद्ध परंपरा को भी सजीव किया।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।