नई दिल्ली।
हड़प्पा सभ्यता (2600 ईसा पूर्व – 1900 ईसा पूर्व), जिसे सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक है। अपनी उन्नत नगर योजना, जल-निकासी प्रणाली और उत्कृष्ट हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध इस सभ्यता का धार्मिक जीवन आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए एक अत्यंत रोचक विषय बना हुआ है।
चूँकि हड़प्पा सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए इसके धार्मिक विश्वासों की समझ पूरी तरह से उत्खनन में प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेषों पर निर्भर करती है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, धोलावीरा और लोथल जैसे स्थलों से मिली मुहरें, मूर्तियाँ, मृद्भांड और स्थापत्य संरचनाएँ हड़प्पा समाज के आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
प्रकृति एवं पशु–वृक्ष पूजा का महत्त्व
हड़प्पावासी प्रकृति-प्रेमी थे। पुरातात्त्विक अवशेषों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि वे प्राकृतिक शक्तियों, पशुओं और वृक्षों के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
वृक्ष–पूजा और पीपल का स्थान
हड़प्पा कालीन अनेक मुहरों पर वृक्षों, विशेषकर पीपल की पत्तियों और उनकी शाखाओं के बीच स्थित देव-आकृतियों का चित्रण मिलता है। प्राचीन समाजों में वृक्षों का पर्यावरणीय, औषधीय और छायादार महत्त्व था, जिसने संभवतः उन्हें धार्मिक आस्था का केंद्र बनाया।
पशु–पूजा एवं प्रतीकात्मकता
मुहरों पर कई वास्तविक और काल्पनिक पशुओं का बारंबार अंकन मिलता है:
- एकशृंगी (Unicorn): हड़प्पा मुहरों पर सबसे अधिक चित्रित किया गया काल्पनिक पशु, जो किसी विशिष्ट सांस्कृतिक या प्रशासनिक प्रतीक को दर्शाता है।
- कूबड़ वाला बैल: शक्ति, कृषि समृद्धि और पशुधन का प्रमुख प्रतीक।
- हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा: वन्यजीवन और प्राकृतिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व।
मातृदेवी की उपासना और उर्वरता के प्रतीक
विभिन्न पुरातात्त्विक स्थलों से बड़ी संख्या में पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की स्त्री-मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इनमें से कई आभूषणों और अलंकृत शिरोभूषणों से सुसज्जित हैं।
प्रसिद्ध पुरातत्वविद सर जॉन मार्शल ने इन मूर्तियों को मातृदेवी (Mother Goddess) का प्रतीक माना था। उनके अनुसार, ये आकृतियाँ मातृत्व, प्रजनन क्षमता और प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति से जुड़ी थीं।
हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि सभी स्त्री-मूर्तियाँ देवी की ही प्रतिमाएँ नहीं हो सकतीं; इनमें से कुछ का प्रयोग घरेलू अनुष्ठानों, सामाजिक आयोजनों या सजावटी उद्देश्यों के लिए भी किया जाता रहा होगा।
पशुपति मुहर: क्या यह शिव का आदिरूप है?
मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति मुहर हड़प्पा सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध और चर्चित पुरावस्तुओं में से एक है।
मुहर की विशेषताएँ:
- त्रि-मुखी/सींगदार शिरोभूषण धारण किए एक मानवाकृति योग मुद्रा में बैठी है।
- आकृति के चारों ओर चार प्रमुख पशु अंकित हैं: हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा।
- आसन के नीचे दो हिरण (या मृग) दिखाई देते हैं।
जॉन मार्शल ने इस आकृति को ‘प्रोटो–शिव‘ (आदि–शिव) अथवा ‘पशुपति’ (पशुओं के स्वामी) के रूप में व्याख्यायित किया। यद्यपि यह हिंदू धर्म में भगवान शिव की अवधारणा से समानता दर्शाती है, परंतु लिपि के पढ़े न जाने के कारण इसे एक ‘ऐतिहासिक परिकल्पना’ के रूप में ही देखा जाता है, अंतिम तथ्य के रूप में नहीं।
पवित्र स्नान और विशाल स्नानागार
मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार (The Great Bath) हड़प्पाई स्थापत्य का एक अद्भुत नमूना है।
- यह जलरोधी बिटुमेन के लेप और पक्की ईंटों से निर्मित है।
- इसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ और जल की निकासी व आवक की सुव्यवस्थित व्यवस्था थी।
जल और शुद्धता का संबंध विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतियों में धार्मिक अनुष्ठानों से रहा है। अतः अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग किसी विशेष धार्मिक या सामुदायिक पर्व के अवसर पर अनुष्ठानिक स्नान (Ritual Bathing) के लिए किया जाता था।
अग्नि–वेदियाँ और अंत्येष्टि संस्कार
- अग्नि–वेदियाँ: कालीबंगा और लोथल जैसे स्थलों से ईंटों की बनी आयताकार अग्नि-वेदियाँ मिली हैं, जिनमें राख और पशु बलि के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह सामूहिक या पारिवारिक अग्नि-अनुष्ठानों का संकेत देते हैं।
- मृत्यु–संस्कार और परलोक: हड़प्पा सभ्यता में मृतकों को दफनाते समय उनके साथ मिट्टी के बर्तन, आभूषण और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ रखी जाती थीं। इससे यह संभावना व्यक्त की जाती है कि हड़प्पा समाज में मृत्यु के बाद के जीवन या पुनर्जन्म से जुड़ी मान्यताएँ विद्यमान थीं।
निष्कर्ष
हड़प्पा सभ्यता का धर्म प्रकृति, उर्वरता, जल-शुद्धता और पशुओं के प्रति सम्मान पर आधारित एक विविध और समृद्ध प्रणाली का संकेत देता है। हालाँकि, जब तक सिंधु लिपि को पढ़ा नहीं जाता, तब तक इन सभी पुरातात्त्विक साक्ष्यों को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ‘संभावित व्याख्याओं’ के रूप में देखना ही तर्कसंगत है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1: हड़प्पा सभ्यता का काल कब से कब तक माना जाता है?
उत्तर: हड़प्पा सभ्यता का विकसित परिपक्व काल लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
Q2: पशुपति मुहर कहाँ से प्राप्त हुई थी?
उत्तर: प्रसिद्ध पशुपति मुहर मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी।
Q3: क्या हड़प्पा सभ्यता की लिपि को पढ़ा जा चुका है?
उत्तर: नहीं, हड़प्पा की चित्रलेखात्मक (Pictographic) लिपि को अभी तक सफलतापूर्वक नहीं पढ़ा जा सका है।
Q4: विशाल स्नानागार किस हड़प्पाई स्थल से मिला है?
उत्तर: विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है।
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प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातात्त्विक खोजों से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए मातृभूमि समाचार के संबंधित अनुभाग देखें:
Disclaimer
यह लेख पुरातात्त्विक उत्खनन से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों और इतिहासकारों (जैसे जॉन मार्शल एवं अन्य) की शोध व्याख्याओं पर आधारित है। सिंधु लिपि के पढ़े न जाने तक हड़प्पा सभ्यता से जुड़े धार्मिक निष्कर्ष ऐतिहासिक परिकल्पनाओं के अंतर्गत आते हैं।

