नई दिल्ली।
भारत के शिक्षा बजट को लेकर बहस अक्सर इस सवाल पर केंद्रित रहती है कि केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी कितनी है। यदि किसी वर्ष शिक्षा की प्रतिशत हिस्सेदारी कम दिखाई देती है, तो इसे शिक्षा की प्राथमिकता घटने का संकेत बताया जा सकता है। लेकिन क्या केवल प्रतिशत के आधार पर भारत के शिक्षा खर्च की पूरी तस्वीर समझी जा सकती है?
इसका जवाब है—नहीं।
शिक्षा बजट का सही आकलन करने के लिए केंद्रीय बजट में शिक्षा की प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ-साथ कुल आवंटन, केंद्र और राज्यों का संयुक्त खर्च, स्कूली एवं उच्च शिक्षा का बजट, योजनाओं पर खर्च और शिक्षा से जुड़े परिणाम भी देखना जरूरी है।
2026-27 में शिक्षा मंत्रालय का कुल बजटीय आवंटन ₹1,39,289.48 करोड़ है। इसमें स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को ₹83,562.26 करोड़ और उच्च शिक्षा विभाग को ₹55,727.22 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
शिक्षा बजट को केवल प्रतिशत से क्यों नहीं समझा जा सकता?
प्रतिशत हमेशा किसी बड़ी आधार राशि के मुकाबले निकाला जाता है। यदि आधार राशि तेजी से बढ़ती है, तो किसी क्षेत्र की हिस्सेदारी प्रतिशत में कम हो सकती है, भले ही उस क्षेत्र के लिए आवंटित वास्तविक राशि बढ़ रही हो।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की आय 100 रुपये है और वह किसी वस्तु पर 10 रुपये खर्च करता है, तो उसका खर्च आय का 10 प्रतिशत है। बाद में उसकी आय बढ़कर 1,000 रुपये हो जाती है और वह उसी वस्तु पर 80 रुपये खर्च करता है, तो खर्च अब आय का केवल 8 प्रतिशत है।
प्रतिशत कम हुआ, लेकिन वास्तविक खर्च 10 रुपये से बढ़कर 80 रुपये हो गया।
इसी तरह सरकारी बजट में भी प्रतिशत हिस्सेदारी और वास्तविक आवंटन दोनों को देखना जरूरी है।
2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को ₹1.39 लाख करोड़
वित्त वर्ष 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय के लिए कुल ₹1,39,289.48 करोड़ का बजटीय आवंटन किया गया है।
इसमें:
| विभाग | 2026-27 आवंटन |
| स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग | ₹83,562.26 करोड़ |
| उच्च शिक्षा विभाग | ₹55,727.22 करोड़ |
| कुल शिक्षा मंत्रालय | ₹1,39,289.48 करोड़ |
इससे स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्रालय के कुल बजट का बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा पर खर्च होने वाला है, जबकि उच्च शिक्षा के लिए भी 55 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान है।
क्या शिक्षा बजट का प्रतिशत कम होना चिंता का विषय है?
शिक्षा की बजट हिस्सेदारी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संकेतक है। लेकिन इसे अकेले देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिक्षा पर सरकारी खर्च कम हो गया है।
केंद्रीय बजट का आकार समय के साथ बढ़ता है। ऐसे में यदि कुल बजट में शिक्षा का हिस्सा कुछ प्रतिशत कम हो जाता है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय को मिलने वाली वास्तविक राशि बढ़ती रहती है, तो दोनों आंकड़ों को अलग-अलग समझना होगा।
इसलिए शिक्षा बजट की चर्चा में दो सवाल अलग-अलग पूछे जाने चाहिए:
पहला—कुल बजट में शिक्षा का प्रतिशत कितना है?
दूसरा—शिक्षा के लिए वास्तविक राशि कितनी आवंटित की गई है?
शिक्षा मंत्रालय के बजट में लगातार बढ़ोतरी
उपलब्ध बजटीय आंकड़ों के अनुसार शिक्षा मंत्रालय का आवंटन पिछले वर्षों में बढ़ा है।
वित्त वर्ष 2013-14 में शिक्षा के लिए केंद्रीय आवंटन लगभग ₹68,000 करोड़ बताया गया था।
वित्त वर्ष 2024-25 तक यह राशि बढ़कर लगभग ₹1,21,118 करोड़ हो गई।
2025-26 में शिक्षा मंत्रालय के लिए बजटीय आवंटन लगभग ₹1,28,650 करोड़ रहा।
वित्त वर्ष 2026-27 में यह बढ़कर ₹1,39,289.48 करोड़ हो गया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक बजटीय राशि के स्तर पर शिक्षा मंत्रालय का आवंटन काफी बढ़ा है।
केंद्र सरकार का कुल बजट भी तेजी से बढ़ा
शिक्षा के प्रतिशत हिस्से को समझने के लिए केंद्र सरकार के कुल खर्च के आकार को देखना भी जरूरी है।
वित्त वर्ष 2004-05 में केंद्र सरकार का कुल खर्च लगभग ₹4.66 लाख करोड़ था।
2013-14 तक यह बढ़कर लगभग ₹15.59 लाख करोड़ हो गया।
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्रीय बजट का आकार लगभग ₹49.65 लाख करोड़ और 2026-27 में लगभग ₹53.47 लाख करोड़ बताया गया है।
इसलिए 2013-14 और 2026-27 के बीच केंद्र सरकार के कुल खर्च का आधार बहुत बड़ा हो चुका है।
यही कारण है कि किसी मंत्रालय की प्रतिशत हिस्सेदारी और उसकी वास्तविक बजटीय राशि को अलग-अलग देखना जरूरी है।
स्कूली शिक्षा के लिए ₹83,562 करोड़
वित्त वर्ष 2026-27 में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को ₹83,562.26 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
यह राशि सरकारी स्कूलों, शिक्षक शिक्षा, स्कूली बुनियादी ढांचे, सीखने के परिणाम और विभिन्न केंद्रीय योजनाओं से जुड़े कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय आधार प्रदान करती है।
स्कूली शिक्षा का बजट शिक्षा मंत्रालय के कुल आवंटन का लगभग 60 प्रतिशत है।
उच्च शिक्षा के लिए ₹55,727 करोड़
उच्च शिक्षा विभाग को 2026-27 में ₹55,727.22 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
इसमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IIT, NIT और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों तथा उच्च शिक्षा से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता शामिल है।
उच्च शिक्षा में केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। शोध, नवाचार, शिक्षक-छात्र अनुपात, बुनियादी सुविधाएं, रोजगार और विद्यार्थियों की शैक्षणिक गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण हैं।
शिक्षा का बड़ा हिस्सा राज्यों के बजट से आता है
भारत में शिक्षा केवल केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। संविधान के तहत शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है।
राज्य सरकारें सरकारी स्कूलों का संचालन, शिक्षकों से संबंधित खर्च, कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का संचालन तथा स्थानीय शिक्षा ढांचे की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालती हैं।
इसलिए केवल केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का बजट देखकर भारत के कुल सार्वजनिक शिक्षा खर्च का आकलन करना अधूरा होगा।
शिक्षा पर होने वाले कुल सरकारी खर्च को समझने के लिए केंद्र और राज्यों दोनों के बजट को साथ देखना जरूरी है।
भारत शिक्षा पर GDP का कितना हिस्सा खर्च करता है?
उपलब्ध बजट विश्लेषण के अनुसार केंद्र और राज्य मिलकर शिक्षा पर लगभग 4.1 प्रतिशत GDP खर्च करते हैं।
यह आंकड़ा राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जुड़े लंबे समय के 6 प्रतिशत GDP लक्ष्य से कम है।
इससे शिक्षा बजट की तस्वीर का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।
एक तरफ शिक्षा मंत्रालय का केंद्रीय बजट लगातार बढ़ रहा है। दूसरी तरफ GDP के अनुपात में कुल सार्वजनिक शिक्षा खर्च अभी भी 6 प्रतिशत के लक्ष्य तक नहीं पहुंचा है।
इसलिए दोनों तथ्यों को एक साथ समझना जरूरी है।
समग्र शिक्षा अभियान के लिए ₹42,100 करोड़
स्कूली शिक्षा की प्रमुख केंद्रीय योजनाओं में समग्र शिक्षा अभियान महत्वपूर्ण है।
वित्त वर्ष 2026-27 में इसके लिए ₹42,100 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
इस योजना के तहत स्कूलों के बुनियादी ढांचे, कक्षाओं के उन्नयन, डिजिटल उपकरणों, शिक्षक प्रशिक्षण और सीखने के परिणामों से जुड़े कार्यक्रमों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
PM SHRI योजना के लिए ₹7,500 करोड़
पीएम श्री योजना के लिए 2026-27 में ₹7,500 करोड़ का प्रावधान है।
इस योजना का उद्देश्य चयनित सरकारी स्कूलों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की अवधारणाओं के अनुरूप आधुनिक और मॉडल संस्थानों के रूप में विकसित करना है।
योजना के तहत स्कूलों में आधुनिक बुनियादी ढांचे, बेहतर शिक्षण वातावरण और नई शैक्षणिक व्यवस्थाओं पर जोर दिया जाता है।
PM POSHAN के लिए ₹12,750 करोड़
स्कूली बच्चों के पोषण से जुड़ी पीएम पोषण योजना के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में ₹12,750 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
इस योजना का उद्देश्य सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पोषण संबंधी सहायता उपलब्ध कराना है।
इस प्रकार शिक्षा बजट का प्रभाव केवल पाठ्यक्रम या स्कूल भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और स्कूल में उनकी निरंतर उपस्थिति से भी जुड़ा है।
उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार
पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा के संस्थानों और उनकी क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014 के बाद:
- IIT की संख्या 16 से बढ़कर 23 हुई।
- IIM की संख्या 13 से बढ़कर 21 हुई।
- AIIMS की संख्या स्थापित और स्वीकृत संस्थानों को मिलाकर 22 बताई गई है।
- उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात यानी GER लगभग 10 प्रतिशत से बढ़कर 28.4 प्रतिशत हुआ है।
- मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों की संख्या 256 से बढ़कर 1,200 से अधिक बताई गई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में 2035 तक उच्च शिक्षा का GER 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
IIT और तकनीकी शिक्षा पर खर्च
उच्च शिक्षा के बजट में IIT और अन्य तकनीकी संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
IIT के लिए बजट में संस्थागत विकास, बुनियादी ढांचे, शोध और छात्र क्षमता से जुड़े खर्च शामिल होते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक में 23 IIT में कुल छात्र नामांकन लगभग दोगुना होकर करीब 65,000 से 1,35,000 हुआ।
यह विस्तार उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग और तकनीकी शिक्षा के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भूमिका
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कई संरचनात्मक बदलावों का लक्ष्य रखा है।
इसमें:
- बहुविषयक शिक्षा
- अकादमिक लचीलापन
- मल्टीपल एंट्री और एग्जिट
- डिजिटल शिक्षा
- शोध को बढ़ावा
- कौशल आधारित शिक्षा
- उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाना
जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया गया है।
Academic Bank of Credits और APAAR जैसी व्यवस्थाएं भी इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा हैं।
क्या बढ़ता बजट बेहतर शिक्षा की गारंटी देता है?
नहीं।
बजट बढ़ना जरूरी है, लेकिन केवल बजट बढ़ने से शिक्षा की गुणवत्ता स्वतः बेहतर नहीं होती।
शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन करते समय यह देखना जरूरी है कि:
- प्रति विद्यार्थी कितना खर्च हो रहा है।
- स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात कैसा है।
- विद्यार्थियों के सीखने के परिणाम कैसे हैं।
- स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं कितनी बेहतर हुई हैं।
- उच्च शिक्षा में रोजगार की स्थिति कैसी है।
- शोध और नवाचार में कितना सुधार हुआ है।
- बजट का कितना हिस्सा वास्तव में खर्च हुआ है।
- ग्रामीण और कमजोर वर्गों तक सुविधाएं कितनी पहुंची हैं।
शिक्षा बजट में असली सवाल क्या होना चाहिए?
शिक्षा बजट की चर्चा केवल इस सवाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि “कितने प्रतिशत?”
इसके बजाय चार सवाल पूछना ज्यादा उपयोगी है:
कितना आवंटित किया गया?
कितना खर्च किया गया?
कहां खर्च किया गया?
उस खर्च से क्या परिणाम मिला?
यही चार सवाल शिक्षा बजट की वास्तविक प्रभावशीलता को समझने में मदद करते हैं।
प्रतिशत बनाम वास्तविक राशि: पूरी तस्वीर
भारत के शिक्षा बजट को समझने के लिए प्रतिशत और वास्तविक राशि दोनों को देखना जरूरी है।
यदि केंद्रीय बजट का आकार कई गुना बढ़ जाता है, तो किसी मंत्रालय की हिस्सेदारी प्रतिशत में कम हो सकती है। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि मंत्रालय का बजट भी घट गया है।
लेकिन दूसरी तरफ, केवल वास्तविक राशि में वृद्धि को देखकर यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त निवेश हो गया है।
GDP के अनुपात में खर्च, प्रति विद्यार्थी खर्च और शिक्षा के परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
भारत के शिक्षा बजट की तस्वीर को केवल एक प्रतिशत या एक आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
वित्त वर्ष 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को ₹1,39,289.48 करोड़ आवंटित किए गए हैं। इसमें स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को ₹83,562.26 करोड़ और उच्च शिक्षा विभाग को ₹55,727.22 करोड़ मिले हैं।
वहीं, केंद्र और राज्य मिलकर शिक्षा पर लगभग 4.1 प्रतिशत GDP खर्च करते हैं, जो लंबे समय से निर्धारित 6 प्रतिशत के लक्ष्य से कम है।
इसलिए संतुलित निष्कर्ष यह है कि केंद्रीय शिक्षा बजट की वास्तविक राशि बढ़ी है, लेकिन भारत में शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च का GDP के अनुपात में आकलन करना भी जरूरी है।
शिक्षा बजट का सही मूल्यांकन प्रतिशत हिस्सेदारी + वास्तविक आवंटन + केंद्र-राज्य खर्च + बजट उपयोग + शिक्षा परिणाम को एक साथ देखकर ही किया जा सकता है।
FAQ: भारत का शिक्षा बजट 2026-27
- भारत का शिक्षा बजट 2026-27 कितना है?
वित्त वर्ष 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को ₹1,39,289.48 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- 2026-27 में स्कूली शिक्षा के लिए कितना बजट है?
स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को ₹83,562.26 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- उच्च शिक्षा के लिए कितना बजट मिला है?
उच्च शिक्षा विभाग को ₹55,727.22 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- क्या शिक्षा मंत्रालय का बजट बढ़ा है?
हां। 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय का बजटीय आवंटन पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ा है।
- क्या शिक्षा का प्रतिशत हिस्सा कम होने का मतलब खर्च भी कम होना है?
जरूरी नहीं। कुल सरकारी बजट का आकार बढ़ने पर किसी मंत्रालय की प्रतिशत हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि उसकी वास्तविक आवंटित राशि बढ़ सकती है।
- क्या भारत शिक्षा पर GDP का 6 प्रतिशत खर्च करता है?
नहीं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केंद्र और राज्य मिलकर शिक्षा पर लगभग 4.1 प्रतिशत GDP खर्च करते हैं, जो 6 प्रतिशत के लक्ष्य से कम है।
- क्या शिक्षा का खर्च केवल केंद्र सरकार करती है?
नहीं। राज्य सरकारें भी शिक्षा पर बहुत बड़ा खर्च करती हैं। इसलिए भारत के कुल सार्वजनिक शिक्षा खर्च को समझने के लिए केंद्र और राज्यों दोनों के बजट को देखना आवश्यक है।
- समग्र शिक्षा अभियान का बजट कितना है?
वित्त वर्ष 2026-27 में समग्र शिक्षा अभियान के लिए ₹42,100 करोड़ का प्रावधान है।
- PM SHRI योजना के लिए कितना बजट है?
2026-27 में PM SHRI योजना के लिए ₹7,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- PM POSHAN योजना का बजट कितना है?
वित्त वर्ष 2026-27 में PM POSHAN के लिए ₹12,750 करोड़ का प्रावधान है।
Disclaimer
यह लेख उपलब्ध बजट आंकड़ों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर शिक्षा बजट की व्याख्या के उद्देश्य से तैयार किया गया है। बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविक व्यय अलग-अलग हो सकते हैं। किसी योजना का वास्तविक खर्च और अंतिम परिणाम बाद के आधिकारिक आंकड़ों में बदल सकते हैं। लेख का उद्देश्य शिक्षा बजट को तथ्यात्मक और संतुलित तरीके से समझाना है, किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में प्रचार करना नहीं।

