लोड हो रहा है...

पराली जलाने की घटनाओं में 26% से अधिक की गिरावट: पंजाब अब भी शीर्ष पर, जानिए क्या कहते हैं ICAR के आंकड़े

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

मुंबई।

उत्तर भारत में सर्दियों की दस्तक के साथ ही वायु प्रदूषण और पराली का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। हालांकि, इस सीजन राहत की बात यह है कि खेतों में पराली (धान के अवशेष) जलाने के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के उपग्रह निगरानी आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 1 नवंबर 2026 के बीच देश के सात प्रमुख राज्यों में पराली जलाने के कुल 3,316 मामले दर्ज किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 26.63 प्रतिशत कम हैं।

इसके बावजूद, आंकड़े बताते हैं कि पंजाब अभी भी फसल अवशेष जलाने के मामलों में शीर्ष पर बना हुआ है।

 

- Advertisement -

7 राज्यों में पराली जलाने का राज्यवार आंकड़ा

ICAR की रिपोर्ट के अनुसार, 15 सितंबर से 1 नवंबर 2026 तक दर्ज की गई घटनाएं इस प्रकार हैं:

राज्यपराली जलाने के मामलेकुल मामलों का प्रतिशत (लगभग)
पंजाब1,51445.65%
राजस्थान67120.23%
मध्य प्रदेश56617.06%
उत्तर प्रदेश34510.40%
उत्तराखंड1765.30%
हरियाणा421.26%
दिल्ली20.06%
कुल योग3,316100%

 

पंजाब के 46% मामले: कौन–कौन से जिले सबसे ज्यादा प्रभावित?

सातों राज्यों में दर्ज कुल 3,316 मामलों में से 1,514 अकेले पंजाब से हैं।

- Advertisement -
  • पंजाब के मुख्य प्रभावित जिले: अमृतसर, फिरोजपुर, कपूरथला, संगरूर, बठिंडा, फरीदकोट, पटियाला, बरनाला और फाजिल्का।
  • राजस्थान के प्रमुख जिले: बारां, बूंदी, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा और सवाई माधोपुर।
  • मध्य प्रदेश के हॉटस्पॉट जिले: श्योपुर, सीहोर, नर्मदापुरम, गुना, दतिया और अशोकनगर।
  • उत्तर प्रदेश का हाल: राज्य में कुल 345 मामले सामने आए हैं और यूपी इस सूची में चौथे स्थान पर है। वहीं, हरियाणा (42) और दिल्ली (2) में यह आंकड़ा काफी कम रहा है।

ध्यान दें: उपग्रह निगरानी प्रणालियों, क्लाउड कवर और रिपोर्टिंग की तिथियों के आधार पर अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर हो सकता है।

 

आखिर किसान क्यों जलाते हैं पराली?

पराली जलाने की प्रथा के पीछे किसानों की अपनी व्यावहारिक और आर्थिक मजबूरियां हैं:

  1. समय का अभाव: धान की कटाई और गेहूं की अगली बुवाई के बीच किसानों के पास मात्र 10 से 25 दिन का समय होता है।
  2. सस्ता विकल्प: खेत को गेहूं के बीज बोने लायक बनाने के लिए पराली को आग लगाना सबसे तेज और किफायती साधन लगता है।
  3. मशीनरी की लागत: पराली हटाने वाली आधुनिक मशीनों की खरीदारी या किराया कई छोटे व सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर होता है।

 

सरकार के प्रयास और फसल अवशेष प्रबंधन योजना

पराली की रोकथाम के लिए केंद्र व राज्य सरकारें फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management – CRM) योजना चला रही हैं:

  • मशीनों पर सब्सिडी: हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, बेलर, मल्चर और स्ट्रॉ चॉपर जैसी मशीनों पर किसानों तथा समितियों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
  • कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC): छोटे किसानों को सस्ती दरों पर मशीनें किराए पर देने के लिए गांव-गांव केंद्र बनाए गए हैं।
  • औद्योगिक उपयोग: पराली से बायोमास पेलेट्स, ब्रिकेट्स और एथेनॉल बनाने के उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

 

दिल्ली–NCR के प्रदूषण में पराली का कितना हाथ?

सर्दियों के महीनों में दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता (AQI) खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है। हालांकि पंजाब और हरियाणा में पराली का धुआं हवा की दिशा के कारण दिल्ली की आबोहवा बिगाड़ता है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषण के लिए केवल पराली जिम्मेदार नहीं है। वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, कचरा जलाना और औद्योगिक उत्सर्जन भी प्रदूषण के बड़े कारक हैं।

 

विस्तृत खबरों के लिए मातृभूमि समाचार पर विजिट करें।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: पराली क्या होती है?

उत्तर: धान (चावल) की फसल की कटाई के बाद खेत में बचा हुआ निचला तना या अवशेष पराली कहलाता है।

प्रश्न 2: 2026 में पराली जलाने की घटनाओं में कितनी कमी आई है?

उत्तर: ICAR के आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 1 नवंबर 2026 के बीच पराली जलाने की घटनाओं में पिछले साल के मुकाबले 26.63% की गिरावट दर्ज की गई है।

प्रश्न 3: पराली प्रबंधन के लिए किसान किन मशीनों का उपयोग कर सकते हैं?

उत्तर: किसान हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, बेलर, स्ट्रॉ चॉपर और मल्चर जैसी मशीनों का उपयोग करके बिना पराली जलाए गेहूं की बुवाई कर सकते हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा 15 सितंबर से 1 नवंबर 2026 के बीच जारी प्राथमिक उपग्रह आंकड़ों पर आधारित है। विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्टिंग तिथियों और सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम के आधार पर आंकड़ों में आंशिक भिन्नता संभव है। पर्यावरण और कृषि से जुड़ी अधिक प्रामाणिक जानकारी के लिए आधिकारिक सरकारी पोर्टल देखें।

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।