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चीन-पाक सीमा पर दहाड़ेगा कानपुर का ‘शेर’: लद्दाख की माइनस डिग्री ठंड में शुरू हुआ 100% स्वदेशी AK-203 का ट्रायल!

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

कानपुर स्माल आर्म्स फैक्ट्री में निर्मित 100% मेड इन इंडिया AK-203 राइफल

लखनऊ. भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति को मजबूत आधार देने वाली कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री (SAF) में निर्मित 100% स्वदेशी AK-203 असॉल्ट राइफल, जिसे भारतीय संस्करण में ‘शेर’ नाम दिया गया है, इस समय अपने सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षण चरण से गुजर रही है। फरवरी 2026 में इस राइफल का विंटर ट्रायल हिमाचल प्रदेश और लद्दाख की अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में किया जा रहा है, जहां तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।

यह परीक्षण इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इसके नतीजे तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में भारतीय सैनिकों के हाथ में पूरी तरह स्वदेशी, भरोसेमंद और अत्याधुनिक राइफल होगी या नहीं।

❄️ विंटर ट्रायल क्यों है निर्णायक?

विंटर ट्रायल का मुख्य उद्देश्य यह परखना है कि:

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  • अत्यधिक ठंड में भी राइफल जैम न हो
  • फायरिंग के दौरान ट्रिगर रिस्पॉन्स और एक्यूरेसी बनी रहे
  • बर्फ, नमी और तेज हवा में मैकेनिज़्म पूरी तरह फंक्शनल रहे

गौरतलब है कि पुरानी INSAS राइफलों में सियाचिन और लद्दाख जैसे इलाकों में तेल जमने, धातु सिकुड़ने और बार-बार जैमिंग की शिकायतें सामने आती रही हैं।
AK-203 ‘शेर’ में इस समस्या से निपटने के लिए रूसी GOST मानकों के अनुरूप विकसित विशेष स्टील और कोल्ड-रेजिस्टेंट डिजाइन का इस्तेमाल किया गया है।

?️ 100% स्वदेशीकरण: दिसंबर 2025 के बाद नया अध्याय

AK-203 प्रोजेक्ट भारत के लिए सिर्फ एक हथियार निर्माण नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है।

नवीनतम अपडेट के अनुसार:

  • पहले AK-203 के लगभग 85% पुर्जे रूस से आयातित थे
  • दिसंबर 2025 के बाद कानपुर फैक्ट्री में इसके सभी 38–39 प्रमुख कॉम्पोनेंट्स (बैरल, रिसीवर, स्प्रिंग, बोल्ट कैरियर आदि) पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाए जा रहे हैं
  • ऑर्डनेंस फैक्ट्री, कानपुर ने ऐसा हाई-ग्रेड स्टील विकसित किया है, जिसकी मजबूती और टिकाऊपन रूसी मानकों के बराबर मानी जा रही है

यह उपलब्धि भारत को छोटे हथियारों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाती है।

? AK-203 ‘शेर’ राइफल: ताकत और तकनीक का संतुलन

विशेषताविवरण
फायरिंग रेट600–700 राउंड प्रति मिनट
प्रभावी रेंज400 से 800 मीटर
वजनलगभग 3.8 किलोग्राम
मैगजीन क्षमता30 राउंड
कैलिबर7.62×39 mm (NATO ग्रेड)

7.62 mm कैलिबर होने के कारण यह राइफल हाई-स्टॉपिंग पावर देती है, जो आतंकवाद-रोधी और सीमावर्ती अभियानों के लिए बेहद अहम मानी जाती है।

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? आगे क्या होगा? समर और मानसून ट्रायल की बारी

विंटर ट्रायल में सफल होने के बाद:

  • समर ट्रायल: राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में, जहां तापमान 45–50°C तक पहुंचता है
  • मानसून ट्रायल: दक्षिण भारत के तटीय और वर्षा-प्रधान क्षेत्रों में, जहां नमी और बारिश हथियारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है

तीनों चरणों में सफल होने के बाद इस राइफल को भारतीय सेना को बड़े पैमाने पर सौंपा जाएगा।

2026 में सेना को मिल सकती हैं 1 लाख स्वदेशी राइफलें

रक्षा सूत्रों के अनुसार, सभी परीक्षण पूरे होने पर वर्ष 2026 के भीतर लगभग 1 लाख AK-203 ‘शेर’ राइफलें सेना में शामिल की जा सकती हैं। यह कदम न सिर्फ INSAS की जगह लेगा, बल्कि भारत को आयात पर निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

कानपुर में बनी AK-203 ‘शेर’ राइफल आज सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और सैनिकों की सुरक्षा का मजबूत प्रतीक बन चुकी है। अगर यह राइफल बर्फ, गर्मी और बारिश—तीनों मौसमों की परीक्षा में सफल रहती है, तो आने वाले दशक में यही भारतीय सेना की रीढ़ बन सकती है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।