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सल्हेर का महासंग्राम: जब मराठों ने मुगलों को खुले मैदान में दी शिकस्त

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छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और मराठा साम्राज्य के इतिहास में सल्हेर का युद्ध (जनवरी 1672) एक मील का पत्थर माना जाता है। हालांकि आपने 1671 की तिथि का उल्लेख किया है, ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार इस संघर्ष की परिणति और निर्णायक विजय 5 जनवरी 1672 के आसपास हुई थी। यह वह समय था जब शिवाजी महाराज ने न केवल किलों को जीता, बल्कि मुगलों की उस धारणा को भी तोड़ दिया कि मराठे केवल ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध) ही कर सकते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पुरंदर की संधि (1665) में खोए हुए अपने क्षेत्रों को वापस पाने के लिए शिवाजी महाराज ने एक आक्रामक अभियान शुरू किया था। नाशिक क्षेत्र में स्थित सल्हेर का किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह खानदेश और गुजरात के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखता था।

युद्ध का स्वरूप: आमने-सामने की भिड़ंत

सल्हेर का युद्ध इसलिए विशेष है क्योंकि यह पहाड़ी किलों के बजाय मैदानी इलाके में लड़ा गया था। एक ओर मुगल सेनापति इखलास खान और बहलोल खान की विशाल सेना थी, तो दूसरी ओर प्रतापराव गुजर और मोरोपंत पिंगले के नेतृत्व में मराठा जांबाज।

युद्ध का परिणाम और प्रभाव

इस युद्ध में मराठों ने मुगलों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इतिहासकारों के अनुसार, इस युद्ध के बाद ही मुगलों के मन में मराठा शक्ति का वास्तविक खौफ पैदा हुआ।

  • मुगल हताहत: हजारों की संख्या में मुगल सैनिक मारे गए और कई उच्च पदस्थ अधिकारी बंदी बनाए गए।

  • मराठा शक्ति का उदय: यह पहली बार था जब मराठों ने खुले मैदान में एक बड़ी मुगल सेना को धूल चटाई थी।

ऐतिहासिक संदर्भ और उद्धरण (Reference Quotations)

सल्हेर की विजय की महत्ता को इतिहासकार जेम्स कनिंगहम और सभासद बखर में कुछ इस प्रकार वर्णित किया गया है:

“सल्हेर की विजय शिवाजी महाराज की सैन्य प्रतिभा का चरमोत्कर्ष थी। इसने सिद्ध कर दिया कि मराठा घुड़सवार सेना किसी भी साम्राज्य की नियमित सेना से टकराने में सक्षम है।”

— ऐतिहासिक विश्लेषण से प्रेरित

मराठा इतिहास के समकालीन स्रोत ‘सभासद बखर’ में इस युद्ध के बारे में उल्लेख मिलता है:

“ऐसी मारकाट हुई कि मैदान लाशों से पट गया। मुगलों का घमंड सल्हेर की धूल में मिल गया और महाराज की कीर्ति दसों दिशाओं में फैल गई।”

सल्हेर के युद्ध (1672) में सरनौबत प्रतापराव गुजर और पेशवा मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले की संयुक्त रणनीति मराठा सैन्य कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि मराठों ने अपनी पारंपरिक ‘छापामार पद्धति’ (Guerrilla Warfare) को छोड़कर मुगलों का सामना खुले मैदान में किया।

दोतरफा घेराबंदी (Double-Sided Pincer Attack)

शिवाजी महाराज ने अपनी सेना को दो मुख्य भागों में विभाजित किया था:

  • प्रतापराव गुजर: उन्होंने घुड़सवार सेना का नेतृत्व किया। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे मुगल सेना को खुले मैदान में व्यस्त रखें और अपनी तीव्र गति से उन्हें भ्रमित करें।

  • मोरोपंत पिंगले: उन्होंने पैदल सेना (Infantry) और मावले सैनिकों का नेतृत्व किया। मोरोपंत ने कोंकण क्षेत्र से आकर अचानक हमला किया और मुगलों के घेरे को दूसरी तरफ से तोड़ दिया।

“लालच और घात” की रणनीति

प्रतापराव गुजर ने एक चतुर चाल चली। युद्ध की शुरुआत में उन्होंने मुगल सेनापति इखलास खान को ऐसा आभास होने दिया कि मराठा सेना पीछे हट रही है। जैसे ही मुगल सेना उत्साहित होकर मराठों का पीछा करने के लिए अव्यवस्थित हुई, प्रतापराव ने अचानक मुड़कर उन पर भीषण आक्रमण कर दिया।

भौगोलिक लाभ का उपयोग

सल्हेर का किला बहुत ऊंचाई पर स्थित था। मोरोपंत पिंगले ने अपनी सेना को इस तरह तैनात किया कि मुगल सेना पहाड़ी और मैदानी इलाके के बीच फंस गई। इससे मुगलों की भारी तोपें और बड़े हाथी प्रभावी नहीं रह सके, जबकि मराठों की हल्की तलवारें और फुर्तीले घोड़े भारी पड़े।

मनोवैज्ञानिक युद्ध और साहस

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, युद्ध के दौरान जब मराठा सेना थकने लगी थी, तब प्रतापराव और मोरोपंत ने स्वयं आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। उनके अदम्य साहस को देखकर मराठा सैनिकों में नया जोश भर गया।

सल्हेर की इस कुशल रणनीति के बारे में सर जेदुनाथ सरकार जैसे इतिहासकारों ने लिखा है:

“सल्हेर में मराठा सेनापतियों ने जो रणनीति अपनाई, उसने मुगलों की श्रेष्ठता के मिथक को चकनाचूर कर दिया। यह केवल साहस की जीत नहीं थी, बल्कि मोरोपंत और प्रतापराव के बीच के अद्भुत समन्वय (Coordination) की जीत थी।”

सभासद बखर में इस रणनीति का उल्लेख कुछ इस प्रकार मिलता है:

“सेनापतियों ने अपनी सेना को काल-भैरव की तरह मुगलों पर छोड़ दिया। एक तरफ से पेशवा (मोरोपंत) और दूसरी तरफ से सरनौबत (प्रतापराव) ने मुगलों को कैंची की तरह काट डाला।”

सल्हेर के युद्ध की शानदार जीत के बाद, छत्रपति शिवाजी महाराज ने महसूस किया कि भविष्य में मुगलों और आदिलशाह जैसे बड़े साम्राज्यों को पूरी तरह परास्त करने के लिए सेना में केवल साहस ही नहीं, बल्कि एक अनुशासित तंत्र की भी आवश्यकता है।

सल्हेर की विजय के अनुभवों के आधार पर महाराज ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण सैन्य सुधार किए:

घुड़सवार सेना का पुनर्गठन (पागा और शिलेदार)

महाराज ने घुड़सवार सेना को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया:

  • पागा (Bargirs): ये राज्य की नियमित सेना थी। इन्हें घोड़े और हथियार सरकार द्वारा दिए जाते थे। इससे सैनिकों की वफादारी सीधे स्वराज के प्रति सुनिश्चित हुई।

  • शिलेदार: ये वे घुड़सवार थे जिनके पास अपने घोड़े और हथियार होते थे।

वेतन और पदसोपान (Hierarchy) का निर्धारण

सल्हेर के युद्ध के बाद महाराज ने एक व्यवस्थित रैंक सिस्टम लागू किया ताकि युद्ध के दौरान आदेशों का पालन स्पष्ट रूप से हो सके:

  • हवलदार: 25 घुड़सवारों का प्रमुख।

  • जुमलेदार: 5 हवलदारों (125 घुड़सवारों) का प्रमुख।

  • हजारी: 10 जुमलेदारों का प्रमुख।

  • पंचहजारी: 5 हजारी अधिकारियों का प्रमुख।

  • सरनौबत: पूरी घुड़सवार सेना का सर्वोच्च सेनापति (जैसे प्रतापराव गुजर)।

रसद और खुफिया विभाग (Intelligence Unit) का सुदृढ़ीकरण

सल्हेर की जीत में सटीक जानकारी का बड़ा हाथ था। इसके बाद महाराज ने बहिर्जी नाईक के नेतृत्व में अपने जासूसी तंत्र को और भी आधुनिक बनाया। नियम बनाया गया कि सेना जहाँ भी जाएगी, स्थानीय रसद (Supplies) का पूरा भुगतान करेगी ताकि जनता का समर्थन बना रहे।

किलों की सुरक्षा के नए नियम

सल्हेर जैसे ऊंचे किलों के महत्व को देखते हुए महाराज ने ‘त्रिसूत्री’ नियम कड़ा किया। हर किले पर तीन अलग-अलग जातियों/पृष्ठभूमि के अधिकारी नियुक्त किए गए ताकि कोई भी एक व्यक्ति गद्दारी न कर सके:

  1. किलेदार (हवलदार): किले का मुख्य रक्षक।

  2. सबनीस: लेखा-जोखा और प्रशासन देखने वाला।

  3. कारखानीस: अन्न और गोला-बारूद की व्यवस्था करने वाला।

ऐतिहासिक संदर्भ (Reference Quote)

मराठा सैन्य नीति के विशेषज्ञ और इतिहासकार कैप्टन जी.वी. मोदक के अनुसार:

“शिवाजी महाराज ने सल्हेर के बाद यह सिद्ध कर दिया कि एक छोटी लेकिन अत्यधिक अनुशासित और सुसंगठित सेना, एक विशाल लेकिन अव्यवस्थित भीड़ को हरा सकती है। उनके द्वारा किए गए सुधारों ने मराठा सेना को ‘अजेय’ बना दिया।”

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