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बीकानेर हाउस विवाद और कांग्रेस का सेंसरशिप रिकॉर्ड: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठते सवाल

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
9 Min Read

नई दिल्ली।

अक्टूबर 2026 में बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में आयोजित कलाकार रेहान वाड्रा की फोटो प्रदर्शनी ‘नो आइडिया इज फाइनल’ को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। प्रदर्शनी शुरू होने से पहले आयोजकों और बीकानेर हाउस प्रबंधन के बीच उस समय तनाव पैदा हुआ जब अधिकारियों ने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों को दर्शाने वाली कई तस्वीरों पर आपत्ति जताई और उन्हें हटाने को कहा।

कुल 105 तस्वीरों में से लगभग 74 कलाकृतियों पर इस कदम का असर पड़ा। रेहान वाड्रा और उनकी मां, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस फैसले की तीखी आलोचना करते हुए इसे कलात्मक स्वतंत्रता का हनन और युवाओं की आवाज दबाने का प्रयास करार दिया।

हालांकि, बीकानेर हाउस प्रबंधन के अनुसार, 10 जून को भेजे गए मूल प्रस्ताव में प्रदर्शनी का विषय मुख्य रूप से प्रकृति, वन्यजीव, कला और मूर्तिकला बताया गया था, जिसके आधार पर 30 जून को बुकिंग स्वीकार की गई थी। प्रबंधन का पक्ष था कि प्रदर्शनी में अचानक राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें शामिल करना बुकिंग गाइडलाइंस और शर्तों का उल्लंघन था।

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यह घटना न केवल प्रक्रियात्मक नियमों के पालन पर बहस छेड़ती है, बल्कि राजनीतिक दलों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपनाए जाने वाले दोहरे रवैये को भी उजागर करती है।

 

कांग्रेस सरकारों के तहत सेंसरशिप का ऐतिहासिक रिकॉर्ड

जब कांग्रेस नेता वाड्रा प्रदर्शनी पर पाबंदी की आलोचना करते हैं, तो इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस सरकारों के उस लंबे रिकॉर्ड की ओर इशारा करते हैं, जहां कला, फिल्मों, किताबों और गानों पर सरकारी तंत्र के जरिए प्रतिबंध लगाए गए।

जवाहरलाल नेहरू काल: मजरूह सुल्तानपुरी और वैचारिक असहमति

अभिव्यक्ति पर पाबंदी का सिलसिला देश की आजादी के तुरंत बाद शुरू हो गया था:

  • मजरूह सुल्तानपुरी (1949): मशहूर शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को 1949 में एक मजदूर सभा में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना करने वाली कविता सुनाने के कारण जेल भेज दिया गया था। उन्होंने अपने शब्दों के लिए माफी मांगने से इनकार कर दिया था।
  • सैन्य इतिहास पर रोक: 1962 के भारत-चीन युद्ध पर ब्रिगेडियर जॉन दलवी द्वारा लिखी गई किताब ‘हिमालयन ब्लंडर’ (Himalayan Blunder) पर आधिकारिक नैरेटिव को चुनौती देने के कारण पाबंदी लगाई गई।
  • नेहरू की जीवनी (1971): ब्रिटिश इतिहासकार माइकल एडवर्ड्स की किताब ‘नेहरू: ए पॉलिटिकल बायोग्राफी’ के भारत में आयात पर रोक लगा दी गई थी।

आपातकाल (1975-1977): सांस्कृतिक और राजनीतिक दमन का दौर

इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के 21 महीनों के दौरान प्रेस और कलात्मक स्वतंत्रता पर कड़ा पहरा रहा:

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  • ‘किस्सा कुर्सी का’ (1975): अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित यह राजनीतिक व्यंग्य फिल्म मारुति कार प्रोजेक्ट और संजय गांधी पर आधारित मानी गई। इसके ओरिजिनल नेगेटिव और प्रिंट्स को सरकार द्वारा जब्त करके नष्ट कर दिया गया।
  • फिल्म ‘आंधी’ (1975): गुलजार द्वारा निर्देशित इस फिल्म पर इसलिए रोक लगाई गई क्योंकि मुख्य पात्र के हाव-भाव और जीवन शैली की तुलना इंदिरा गांधी से की जा रही थी।
  • किशोर कुमार पर ऑल इंडिया रेडियो बैन: गायक किशोर कुमार द्वारा यूथ कांग्रेस के एक कार्यक्रम में जाने से इनकार करने पर मई 1976 में उनके गानों के ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर प्रसारण पर रोक लगा दी गई।
  • कार्टून और व्यंग्य पत्रिकाएं: आर.के. लक्ष्मण और अबू अब्राहम जैसे कार्टूनिस्टों के कार्टून सेंसर किए गए। व्यंग्य पत्रिका ‘शंकर वीकली’ को दबाव के कारण 1975 में बंद करना पड़ा।

राजीव गांधी काल: साहित्यिक और धार्मिक कृतियों पर प्रतिबंध

  • ‘द सैटेनिक वर्सेस’ (1988): सलमान रुश्दी के इस उपन्यास के आयात पर प्रतिबंध लगाने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। यह कार्रवाई कस्टम एक्ट (सीमा शुल्क अधिनियम) के तहत की गई थी।
  • ‘अंडरस्टैंडिंग इस्लाम थ्रू हदीस’: 1990 के दशक की शुरुआत में लेखक राम स्वरूप की इस शोध पुस्तक के हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों को कानूनी प्रक्रियाओं और शिकायतों के तहत प्रतिबंधित व जब्त किया गया।

 

तुलनात्मक तालिका: प्रमुख प्रतिबंध और विवाद

दौर / समयविषय / कलाकृतिकार्रवाई का स्वरूपवजह / कारण
1949 (नेहरू काल)मजरूह सुल्तानपुरी की कविताकवि को जेल भेजा गयाप्रधानमंत्री नेहरू की राजनीतिक आलोचना
1975 (आपातकाल)फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’प्रिंट व नेगेटिव नष्ट किए गएसत्ता और मारुति प्रोजेक्ट पर तीखा व्यंग्य
1975 (आपातकाल)फिल्म ‘आंधी’ (गुलजार)रिलीज के बाद बैन की गईमुख्य पात्र की इंदिरा गांधी से समानता
1976 (आपातकाल)किशोर कुमार के गीतआकाशवाणी/दूरदर्शन से हटाए गएयूथ कांग्रेस इवेंट में परफॉर्म करने से मना करना
1988 (राजीव गांधी काल)‘द सैटेनिक वर्सेस’ (सलमान रुश्दी)आयात पर पूर्ण बैन (कस्टम एक्ट)धार्मिक भावनाओं और विरोध का हवाला
2026 (वर्तमान)रेहान वाड्रा प्रदर्शनी (बीकानेर हाउस)74 तस्वीरें हटाने की मांगबुकिंग प्रस्ताव और अंतिम कंटेंट में अंतर का दावा

 

सिद्धांत बनाम राजनीतिक अवसरवादिता

बीकानेर हाउस का मामला प्रक्रियात्मक अनुपालन और अभिव्यक्ति की रक्षा दोनों का मिला-जुला उदाहरण पेश करता है। यदि कोई पार्टी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सिद्धांत मानती है, तो उसे सत्ता में रहते हुए भी विरोधी विचारों और आलोचनात्मक कला की रक्षा करनी होगी।

कांग्रेस का बीकानेर हाउस घटना पर आक्रामक रुख अपनाना, उसके अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड के कारण आलोचकों के निशाने पर आ जाता है। कलात्मक स्वतंत्रता को केवल एक राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता; इसे हर परिस्थिति और हर शासनकाल में निष्पक्ष रूप से लागू किया जाना चाहिए।

 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1. बीकानेर हाउस में रेहान वाड्रा की प्रदर्शनी को लेकर क्या विवाद था?

उत्तर: बीकानेर हाउस प्रबंधन ने प्रदर्शनी ‘नो आइडिया इज फाइनल’ से लगभग 74 तस्वीरें हटाने को कहा था। प्रबंधन का कहना था कि मूल प्रस्ताव में वन्यजीव और मूर्तिकला की बात कही गई थी, जबकि बाद में राजनीतिक प्रदर्शनों की तस्वीरें जोड़ी गईं जो वेन्यू की शर्तों के खिलाफ थीं।

Q2. आपातकाल के दौरान किस प्रसिद्ध फिल्म के नेगेटिव नष्ट कर दिए गए थे?

उत्तर: अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ के ओरिजिनल प्रिंट और नेगेटिव आपातकाल के दौरान जब्त कर नष्ट कर दिए गए थे।

Q3. भारत में ‘द सैटेनिक वर्सेस’ पर प्रतिबंध कब और किस सरकार के दौरान लगाया गया था?

उत्तर: अक्टूबर 1988 में राजीव गांधी सरकार ने कस्टम एक्ट के तहत सलमान रुश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेस’ के भारत में आयात पर रोक लगाई थी।

Q4. मजरूह सुल्तानपुरी को किस कारण जेल भेजा गया था?

उत्तर: 1949 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करने वाली कविता सुनाने के लिए मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को जेल भेजा गया था।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख ऐतिहासिक घटनाओं, प्रकाशित रिकॉर्ड्स और सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध राजनीतिक विश्लेषणों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष की छवि को प्रभावित करना नहीं, बल्कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ऐतिहासिक संदर्भ पर एक निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत करना है।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।