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एक त्योहार, अनगिनत परंपराएं: जानिए कैसे दिवाली भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक धागे में पिरोती है

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
8 Min Read

नई दिल्ली।

भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविधता में निहित है, और इस विविधता का सबसे भव्य एवं जीवंत रूप दिवाली के उत्सव में देखने को मिलता है। ऊपर से देखने पर दिवाली पूरे देश में जगमगाते दीयों, आतिशबाजी और मिठाइयों का त्योहार लगती है, लेकिन जब आप गहराई में उतरते हैं, तो पाते हैं कि हर राज्य, हर समुदाय और हर क्षेत्र इस पावन पर्व को अपनी विशिष्ट मान्यताओं, कृषि चक्रों और ऐतिहासिक स्मृतियों के अनुसार मनाता है।

अयोध्या के भव्य सरयू घाटों से लेकर तमिलनाडु की भोर में ‘गंगा स्नान’ तक, और बंगाल के साधना-पंडालों से लेकर सिक्किम के ‘तिहार’ तक—दिवाली भारत के सभ्यतागत ताने-बाने को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य करती है।

 

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उत्तर से दक्षिण तक: कथाओं और मान्यताओं का संगम

संस्कृत का ‘दीपावली’ शब्द ‘दीपा’ (दीपक) और ‘आवली’ (कतार) से मिलकर बना है। हालाँकि, इन दीयों को जलाने का कारण और समय हर जगह अलग-अलग धार्मिक व पौराणिक घटनाओं से जुड़ा है:

  • उत्तर भारत: अयोध्या में 14 वर्षों के वनवास के पश्चात भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण की वापसी पर दीप जलाकर खुशियाँ मनाई जाती हैं। वाराणसी में दिवाली के ठीक 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा पर ‘देव दीपावली’ मनाई जाती है, जो भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर पर विजय का प्रतीक है।
  • दक्षिण भारत: तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में यह उत्सव मुख्य रूप से नरक चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण द्वारा अत्याचारी राक्षस नरकासुर के वध की स्मृति में मनाया जाता है।
  • पूर्वी भारत: पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में अमावस्या की रात महाकाली को समर्पित होती है, जहाँ बुराई के नाश के लिए ‘काली पूजा’ का भव्य आयोजन होता है।

 

क्षेत्रीय परंपराएं: जहाँ संस्कृति और जन–जीवन का मेल होता है

छत्तीसगढ़ का ‘देवरी‘ (चरवाहा दिवस)

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में दिवाली का स्वरूप मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़ा है। यहाँ ‘देवरी’ (देवारी) को ‘चरवाहा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। ग्रामीण जीवन का आधार बने चरवाहों (‘धोराइ’) को सम्मान देने के लिए उन्हें घरों में आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है। शाम को पशुओं को पलाश की जड़ों की मालाओं से सजाया जाता है और गोंड लोक-परंपराओं के अनुसार इशार-गौरा का पूजन किया जाता है।

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तमिलनाडु: ‘गंगा स्नान‘ और थलाई दीपावली

तमिलनाडु में दीपावली सूर्योदय से पूर्व शुरू होती है। घर की वयोवृद्ध महिला परिवार के सभी सदस्यों को तिल के तेल से मालिश करती हैं, जिसके बाद ‘गंगा स्नान’ (पवित्र स्नान) किया जाता है। इसके बाद औषधि गुणों से युक्त पारंपरिक ‘दीपावली लेह्यम’ का सेवन कराया जाता है। नए शादीशुदा जोड़ों के लिए दुल्हन के मायके में पहली दिवाली मनाना ‘थलाई दीपावली‘ कहलाता है।

गोवा में नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन

गोवा में दिवाली की पूर्व संध्या पर गाँव-गाँव में पुआल और कागज़ से 10 से 50 फीट ऊँचे नरकासुर के पुतले बनाए जाते हैं। रात भर झाँकियाँ निकालने के बाद नरक चतुर्दशी की सुबह इन पुतलों का दहन किया जाता है, जो अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश देता है।

ओडिशा की ‘कौन्रिया काठी‘: पूर्वजों को प्रकाश दिखाना

ओडिशा में दिवाली की रात जूट की लकड़ियों (कौन्रिया काठी) को जलाकर आसमान की ओर लहराया जाता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पास हज़ारों लोग अपने दिवगंत पूर्वजों की आत्मा को स्वर्ग का मार्ग दिखाने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

सिक्किम और गोरखा समुदाय का ‘तिहार‘

हिमालयी क्षेत्रों में दिवाली को ‘तिहार’ या ‘यमपंचक’ कहा जाता है। 5 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में मानव के साथ-साथ प्रकृति और जीवों का पूजन होता है:

  • पहला दिन: काग तिहार (कौवा पूजन)
  • दूसरा दिन: कुकुर तिहार (कुत्ता पूजन)
  • तीसरा दिन: गाई तिहार (गाय पूजन)
  • चौथा दिन: गोरु तिहार (बैल पूजन)
  • पाँचवाँ दिन: भाई टीका (भाई-बहन के प्रेम का उत्सव)

 

विविध धर्मों और सम्प्रदायों का साझा पर्व

दिवाली केवल वैदिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के अन्य धर्मों के लिए भी अत्यंत पवित्र अवसर है:

  • जैन धर्म: जैन समुदाय के लिए दिवाली का दिन 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष (निर्वाण कल्याणक) प्राप्ति का पावन दिन है।
  • सिख धर्म: सिख समुदाय इस अवसर को ‘बंदी छोड़ दिवस‘ के रूप में मनाता है। इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी ने ग्वालियर किले से 52 हिंदू राजाओं को मुग़ल क़ैद से मुक्त कराया था। इस खुशी में स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) को दीयों से सजाया जाता है।

 

निष्कर्ष: सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक

दिवाली भारत की उस सभ्यतागत सोच को दर्शाती है जो विभिन्नताओं को मिटाने के बजाय उनका सम्मान करती है। भले ही कहानियाँ अलग हों, पकवान अलग हों, और पूजन की पद्धतियाँ अलग हों—लेकिन सबके केंद्र में एक ही भावना है: तमसो मा ज्योतिर्गमय (अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना)।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. तमिलनाडु में ‘थलाई दीपावली‘ क्या है?

उत्तर: तमिलनाडु में नवविवाहित जोड़े द्वारा विवाह के बाद पहली दिवाली दुल्हन के मायके में मनाने की परंपरा को ‘थलाई दीपावली’ कहा जाता है।

Q2. सिक्किम में ‘कुकुर तिहार‘ क्यों मनाया जाता है?

उत्तर: तिहार उत्सव के दूसरे दिन मनुष्यों के प्रति कुत्तों की वफ़ादारी और सुरक्षा में उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए ‘कुकुर तिहार’ मनाया जाता है।

Q3. सिख धर्म में दिवाली के दिन ‘बंदी छोड़ दिवस‘ क्यों मनाते हैं?

उत्तर: सन 1619 में सिख गुरु, श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को रिहा करवाकर अमृतसर वापस लौटे थे। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है।

 

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भारत के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक लोक कलाओं और उत्सवों की अधिक जानकारी हेतु देखें:

👉 मातृभूमि समाचार – संस्कृति एवं धरोहर

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह आलेख भारत की विभिन्न सांस्कृतिक, क्षेत्रीय और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। आलेख में दिए गए विवरण विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों, क्षेत्रीय लोक–कथाओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।