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रोहिणी आयोग और OBC उप-वर्गीकरण की अनिवार्यता: डेटा, राजनीति और श्रेणी के भीतर न्याय की तलाश

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
7 Min Read

नई दिल्ली|

भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए लागू 27% आरक्षण को लेकर चल रही बहस अब इस बुनियादी सवाल पर आ टिकी है कि क्या आरक्षण का असली लाभ उन अत्यंत वंचित समुदायों तक पहुँच पा रहा है, जिनके लिए इसे बनाया गया था। केंद्रीय सूची में 2,600 से अधिक प्रविष्टियाँ (entries) शामिल हैं, जो विविध सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब इन सभी को एक ही 27% के कोटे में रखा जाता है, तो अधिक संगठित और साधन-संपन्न समूह अधिकांश सीटों और सरकारी नौकरियों पर कब्जा कर लेते हैं, जबकि छोटे और अत्यंत पिछड़े समुदाय हाशिए पर ही रह जाते हैं।

इसी असंतुलन की जांच और आरक्षण के न्यायसंगत बंटवारे हेतु साक्ष्य-आधारित ढांचा तैयार करने के लिए जस्टिस जी. रोहिणी आयोग का गठन किया गया था।

 

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रोहिणी आयोग का गठन, दायरा और अंतिम रिपोर्ट

  • स्थापना व संवैधानिक आधार: 2 अक्टूबर 2017 को भारत के राष्ट्रपति की मंजूरी से संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत 4-सदस्यीय आयोग का गठन किया गया। इसकी अध्यक्षता दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी ने की।
  • अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारी (जनवरी 2020): आयोग को केंद्रीय OBC सूची में मौजूद दोहराव, अस्पष्टताओं, विसंगतियों और लिप्यंतरण (transcription) संबंधी गलतियों को सुधारने का काम भी सौंपा गया।
  • रिपोर्ट प्रस्तुति: 13 बार समय-सीमा विस्तार (extension) प्राप्त करने के बाद, आयोग ने आखिरकार 6 साल के विस्तृत अध्ययन के पश्चात 31 जुलाई 2023 को अपनी अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी।

प्रमुख तथ्य: आयोग के 2018 के विश्लेषण में पाया गया कि 1.3 लाख केंद्रीय नौकरियों और शैक्षणिक दाखिलों में से 97% लाभ केवल 25% OBC समुदायों को मिले। इनमें से लगभग 24.95% लाभ तो सिर्फ 10 बड़ी जातियों के पास गए, जबकि केंद्रीय सूची की 983 जातियों (लगभग 37%) का प्रतिनिधित्व पूरी तरह शून्य रहा।

 

उप–वर्गीकरण का अर्थ और संभावित 4-श्रेणी फॉर्मूला

‘उप-वर्गीकरण’ (Sub-classification) का अर्थ आरक्षण के कुल 27% कोटे को बढ़ाना नहीं है, बल्कि इसे आंतरिक रूप से विभाजित करना है। आयोग द्वारा चर्चित संभावित ढांचे के तहत केंद्रीय सूची की 2,633 प्रविष्टियों को 4 आंतरिक श्रेणियों में बाँटने का प्रस्ताव दिया गया:

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  1. श्रेणी 1: बहुत कम प्रतिनिधित्व वाले 1,674 समुदायों के लिए सुरक्षित हिस्सा (लगभग 2% कोटा)।
  2. श्रेणी 2: 534 जाति समूहों के लिए 6% कोटा।
  3. श्रेणी 3: 328 जाति समूहों के लिए 9% कोटा।
  4. श्रेणी 4: सबसे मजबूत प्रतिनिधित्व वाले 97 प्रमुख समूहों के लिए 10% कोटा।

 

राज्य–स्तरीय प्रयोगों से सीख

केंद्रीय स्तर पर उप-वर्गीकरण लागू करने से पहले कई राज्यों के दीर्घकालिक अनुभवों का अध्ययन आवश्यक है:

  • आंध्र प्रदेश का मॉडल (BC-A से BC-E): आंध्र प्रदेश में 29% पिछड़े वर्ग कोटे को BC-A (7%), BC-B (10%), BC-C (1%), BC-D (7%) और BC-E (4%) जैसी श्रेणियों में बांटा गया, जो यह साबित करता है कि प्रशासनिक रूप से आंतरिक वर्गीकरण संभव है।
  • तमिलनाडु की चुनौतियाँ (MBC/DNC कोटा): तमिलनाडु ने 1989 में अति-पिछड़े वर्गों के लिए 20% पृथक कोटा बनाया। हालांकि, 2020-21 में वन्नियाकुल क्षत्रियों के लिए 10.5% आंतरिक आरक्षण कानून को सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में रद्द कर दिया, क्योंकि राज्य के पास ठोस एम्पेरिकल (अनुभवजन्य) आंकड़ों का अभाव था।
  • कर्नाटक का ढांचा: कर्नाटक ने पारंपरिक 1, 2A, 2B, 3A, 3B श्रेणियों से 2C और 2D जैसी नई श्रेणियों में बदलाव का प्रयास किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बिना ठोस डेटा के वर्गीकरण तेजी से राजनीतिक विवादों में बदल जाता है।

 

संवैधानिक स्थिति और कानूनी आधार

आरक्षित श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का 2024 का ऐतिहासिक फैसला (स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह) अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने माना कि:

  • किसी आरक्षित श्रेणी के भीतर आंतरिक वर्गीकरण संवैधानिक रूप से मान्य है।
  • इसके लिए मापने योग्य आंकड़े (Empirical Data), तार्किक आधार (Intelligible Differentia) और वर्गीकरण के पीछे स्पष्ट कानूनी उद्देश्य होना अनिवार्य है।

 

बार–बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. रोहिणी आयोग की मुख्य जिम्मेदारी क्या थी?

उत्तर: आयोग की मुख्य जिम्मेदारी 27% OBC आरक्षण के लाभों के वितरण का अध्ययन करना, केंद्रीय सूची की विसंगतियों को दूर करना और आरक्षण का समान लाभ पहुँचाने के लिए साक्ष्य-आधारित उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) का ढांचा तैयार करना था।

Q2. रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट कब सौंपी?

उत्तर: आयोग ने 6 साल के अध्ययन के बाद 31 जुलाई 2023 को अपनी अंतिम रिपोर्ट भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को सौंपी।

Q3. क्या उप–वर्गीकरण से OBC का 27% कोटा बढ़ जाएगा?

उत्तर: नहीं, उप-वर्गीकरण से आरक्षण का प्रतिशत नहीं बढ़ता है, बल्कि 27% के मौजूदा कोटे को ही विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व के आधार पर छोटी-छोटी आंतरिक श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

Q4. सर्वोच्च न्यायालय ने उप–वर्गीकरण पर क्या रुख अपनाया है?

उत्तर: ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने माना कि ठोस एम्पेरिकल डेटा और तार्किक वर्गीकरण के आधार पर आरक्षित श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण करना संवैधानिक रूप से वैध है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख विश्लेषणात्मक एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त विचार और आंकड़े आधिकारिक रोहिणी आयोग संदर्भों, राज्य सरकार के दस्तावेजों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक निर्णयों पर आधारित हैं। आयोग की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक होने पर अंतिम आंकड़े और नीतियां परिवर्तन के अधीन हो सकती हैं।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।