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गांधी और भारतीय राजनीति के अंतर्विरोध (दक्षिण अफ्रीका से विभाजन की दहलीज तक)

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प्रस्तावना: इतिहास के झरोखे से एक पुनरावलोकन

इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि उन घटनाओं के पीछे छिपे उद्देश्यों और उनके दूरगामी परिणामों का विश्लेषण होता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखते समय अक्सर कुछ व्यक्तित्वों को इतना महिमामंडित कर दिया गया कि उनके निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा गौण हो गई। मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसा ही नाम है।

प्रस्तुत पुस्तक ‘गांधी और भारतीय राजनीति के अंतर्विरोध’ महात्मा गांधी के जीवन के उन पहलुओं को उजागर करने का एक प्रयास है, जो प्रायः मुख्यधारा के विमर्श से ओझल रहे हैं। लंदन की गलियों में एक ‘अंग्रेज बाबू’ बनने की आकांक्षा से लेकर दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी संघर्ष तक, और फिर भारत के असहयोग आंदोलन से लेकर विभाजन की त्रासदी तक—गांधी जी के जीवन में विरोधाभासों की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती है।

इस पुस्तक का उद्देश्य किसी की छवि को धूमिल करना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों, पत्रों और समकालीन लेखकों के उद्धरणों के माध्यम से यह समझना है कि क्या गांधी जी की नीतियां वास्तव में भारत के हित में थीं? क्या हिंदू-मुस्लिम एकता का उनका मंत्र केवल एकतरफा त्याग का आह्वान था? और क्या क्रांतिकारियों के प्रति उनका दृष्टिकोण न्यायसंगत था? यह पुस्तक पाठकों को इतिहास के उन अनसुलझे पन्नों को पलटने के लिए आमंत्रित करती है, जहाँ ‘अहिंसा’ और ‘स्वराज’ के नारों के पीछे की जटिल राजनीतिक बिसात बिछी थी।

अध्याय 1: बचपन के संस्कार और विलायती चकाचौंध

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की नींव उसके बचपन में ही पड़ जाती है। गांधी जी का प्रारंभिक जीवन विवादों और आंतरिक द्वंद्वों से मुक्त नहीं था। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि बचपन में मांसाहार और पिता की सेवा के प्रति उपेक्षा उनके चरित्र के कमजोर पक्ष थे। लेकिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे बैरिस्टर बनने लंदन गए।

अंग्रेजी सभ्यता का आकर्षण:

इतिहासकार बी.आर. नंदा के अनुसार, गांधी जी पर उस समय अंग्रेजी सभ्यता का गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है:

‘‘गांधीजी लंदन गए तो थे बैरिस्टर बनने, लेकिन उन पर अंग्रेजों जैसा बनने का शौक सर चढ़ कर बोलने लगा। उन्होंने अंग्रेजों की तरह दिखने के लिए महंगे कपड़े सिलवाये। अपनी घड़ी में सोने की चेन लगवाई। यहां तक गांधी जी ने अंग्रेजों की तरह बातचीत करने, नाचने व गाने के लिए इन क्षेत्रों के विशेषज्ञों से प्रशिक्षण प्राप्त किया’’।

इस विलासिता का वर्णन सच्चिदानंद सिन्हा ने ‘अमृत बाजार पत्रिका’ (1950) में कुछ इस प्रकार किया:

‘‘फरवरी 1890 में सिन्हा की भेंट गांधीजी से लंदन में हुई… उस समय गांधी जी ने एक चमचमाती रेशमी हैट, ग्लैडस्टन शैली का कॉलर वाली रेशमी कमीज और उस पर इन्द्रधनुषी रंग वाली टाई पहन रखी थी… सिन्हा ने गांधीजी को ‘दिलफेंक रंगीला’ कहा है’’।

अध्याय 2: दक्षिण अफ्रीका: संघर्ष या सामंजस्य?

मई 1893 में गांधी जी का दक्षिण अफ्रीका पहुंचना भारतीय राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ था। यहाँ उनके संघर्षों को प्रायः ‘क्रांतिकारी’ बताया जाता है, परंतु सूक्ष्म विश्लेषण करने पर उनकी रणनीति ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी और अधिकारों के बीच झूलती नजर आती है।

ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति दृष्टिकोण:

गांधी जी का उद्देश्य अंग्रेजों को अफ्रीका से बाहर निकालना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश कानून के तहत भारतीयों के लिए समान अधिकार प्राप्त करना था। लुई फिशर के अनुसार:

”गांधीजी यह सिद्धांत स्थापित करना चाहते थे कि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं, इसलिए भारतीयों को अंग्रेजों के कानून के अनुसार समानता का अधिकार मिलना चाहिए।”

इतिहासकार बी.एल. नंदा ने इंगित किया है कि गांधी जी को भारत लाने की पृष्ठभूमि में गोपाल कृष्ण गोखले की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसे ब्रिटिश सत्ता का भी मौन समर्थन प्राप्त था।

अध्याय 3: हिंदू-मुस्लिम एकता का ‘सिद्धांत’ और व्यावहारिक विफलता

भारत लौटने के बाद गांधी जी ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ को अपने राजनीतिक केंद्र में रखा। 1921 में डॉ. हेडगेवार के साथ उनकी बातचीत इस नीति के पीछे के उद्देश्यों को स्पष्ट करती है।

सांप्रदायिक दंगों पर गांधी जी का रुख:

1920 के बाद जब देश में सांप्रदायिक दंगों की बाढ़ आई, तब गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत की परीक्षा हुई। गांधी जी ने अक्सर इसके लिए जनता को ही दोषी ठहराया। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ (1924) में स्वीकार किया:

“ए मुस्लिम इज ए बुली एंड ए हिन्दू इज ए कावर्ड।” (मुसलमान दबंग/गुंडा है और हिंदू कायर है)।

इसके बावजूद, उन्होंने दंगों के दोषियों को सजा दिलाने के बजाय हिंदुओं को आत्मसंयम और अहिंसा का उपदेश देना जारी रखा। देशबंधु चितरंजन दास और लाला लाजपत राय ने इस एकता को ‘अव्यावहारिक’ माना था।

अध्याय 4: खिलाफत आंदोलन: असहयोग का छद्म आवरण

खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा की सत्ता बचाने का आंदोलन था, जिसका भारत की स्वतंत्रता से सीधा संबंध नहीं था। गांधी जी ने इसे हिंदुओं को जोड़ने के लिए ‘असहयोग आंदोलन’ का नाम दिया।

रणनीतिक समझौता:

गांधी जी ने 22 जून 1920 को वायसराय को लिखे पत्र में स्पष्ट किया था:

‘‘यदि खिलाफत की समस्या का समाधान मुस्लिमों की इच्छा के अनुसार नहीं हुआ, तो उनके पास सिर्फ तीन विकल्प हैं – तलवार से जिहाद, हिजरत और असहयोग आंदोलन’’।

इस आंदोलन का परिणाम भयावह रहा। 1921 के मोपला नरसंहार में हजारों हिंदुओं की हत्या और धर्मांतरण हुआ, जिसे गांधी जी ने “वीर मोपलाओं की बहादुरी” कहकर संबोधित किया।

अध्याय 5: स्वराज का वादा और ‘वस्त्र त्याग’ का प्रतीकात्मक प्रयोग

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद गांधी जी ने देश को “एक वर्ष में स्वराज” दिलाने का वचन दिया। इसके लिए ‘तिलक स्वराज फंड’ के माध्यम से करोड़ों रुपये और सोना एकत्र किया गया।

समय सीमा और बदलाव:

जब स्वराज का वादा पूरा नहीं हुआ, तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए गांधी जी ने 1 अगस्त 1921 को वस्त्र त्याग कर केवल धोती धारण करने का निर्णय लिया। इसे ‘स्वदेशी’ के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन यह स्वराज की विफलता को ढंकने का एक प्रतीकात्मक प्रयास अधिक प्रतीत होता था।

अध्याय 6: क्रांतिकारियों के प्रति गांधी जी का विरोध

अहिंसा के नाम पर गांधी जी ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों की गतिविधियों को सदैव “भटका हुआ रास्ता” बताया।

लाला जी की मृत्यु और सांडर्स वध:

साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की शहादत का बदला जब क्रांतिकारियों ने सांडर्स का वध करके लिया, तो गांधी जी ने इसे ‘हिंसा’ कहकर निंदा की। इसके विपरीत, क्रांतिकारियों ने स्पष्ट किया:

“युवा भारत राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए खड़ा और तैयार हो गया है, भले ही उसे अपने जीवन की आहुति भी देनी पड़े।” (चंद्रशेखर आजाद का घोषणा पत्र)।

केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी ने पूरे देश में चेतना का संचार किया, लेकिन गांधी जी और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने अंग्रेजों के साथ मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास किया जिससे क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाया जा सके।

भगत सिंह और गांधी जी के बीच का वैचारिक संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित अध्यायों में से एक है। यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं—‘अहिंसक सत्याग्रह’ और ‘सशस्त्र क्रांति’—का टकराव था।

वैचारिक द्वंद्व – गांधी बनाम भगत सिंह

गांधी जी और भगत सिंह के बीच मतभेद केवल साधन (Means) को लेकर नहीं थे, बल्कि वे ‘स्वराज्य’ की परिभाषा को लेकर भी अलग राय रखते थे। जहाँ गांधी जी का स्वराज अक्सर ब्रिटिश छत्रछाया में ‘डोमिनियन स्टेटस’ की बात करता था, वहीं भगत सिंह का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता और एक समाजवादी व्यवस्था की स्थापना था।

1. ‘बम का दर्शन’ बनाम ‘बम की पूजा’

1929 में जब क्रांतिकारियों ने वायसराय की ट्रेन उड़ाने का प्रयास किया, तो गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में “The Cult of the Bomb” (बम की पूजा) शीर्षक से एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने क्रांतिकारियों की आलोचना करते हुए कहा कि उनकी गतिविधियाँ भारत की प्रगति में बाधक हैं।

इसके जवाब में भगत सिंह और भगवतीचरण वोहरा ने “The Philosophy of the Bomb” (बम का दर्शन) नामक ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार किया। उन्होंने लिखा:

“हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अहिंसा का उपदेश केवल पीड़ितों को ही क्यों दिया जाता है? क्या वह अत्याचारी शासकों पर लागू नहीं होता? क्रांतिकारी हिंसा को घृणा की दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि वे इसे अन्याय को मिटाने का एक आवश्यक साधन मानते हैं।”

2. कांग्रेस और गांधी जी की आलोचना

भगत सिंह ने जेल से लिखे अपने लेखों में कांग्रेस की नीतियों को ‘बुर्जुआ’ (Middle-class) राजनीति करार दिया। उन्होंने 2 फरवरी 1931 को ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र’ में लिखा:

“कांग्रेस का उद्देश्य क्या है? उसने एक बार पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की, लेकिन अब वह लॉर्ड इरविन के साथ समझौता करने के लिए आतुर है। यह समझौता उन लोगों के साथ गद्दारी है जिन्होंने आंदोलन में सब कुछ न्योछावर कर दिया।”

3. अहिंसा पर मतभेद

गांधी जी का मानना था कि हिंसा से प्राप्त स्वतंत्रता स्थायी नहीं होगी। इसके विपरीत, भगत सिंह ने कोर्ट में अपने बयान में ‘हिंसा’ को परिभाषित करते हुए कहा था:

“क्रांति में अनिवार्य रूप से सशस्त्र संघर्ष शामिल नहीं होता। यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं है। ‘क्रांति’ से हमारा तात्पर्य यह है कि अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था को बदला जाना चाहिए।”

4. फांसी और गांधी जी की भूमिका

भगत सिंह की फांसी को लेकर गांधी जी पर अक्सर आरोप लगते हैं कि उन्होंने ‘गांधी-इरविन समझौते’ में फांसी रोकने की शर्त नहीं रखी।

सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक ‘The Indian Struggle’ में इस संदर्भ में लिखा है:

“गांधी जी ने लॉर्ड इरविन से केवल फांसी टालने (Commutation) की विनती की थी, उसे रद्द करने की मांग को समझौते की अनिवार्य शर्त नहीं बनाया। यदि गांधी जी अड़ जाते, तो शायद फांसी रुक सकती थी।”

गांधी जी ने स्वयं 23 मार्च 1931 (फांसी के दिन) इरविन को एक पत्र लिखा था, लेकिन उसमें भी कानूनी तर्क अधिक थे और नैतिक दबाव कम:

“यदि फांसी को टाला जा सके, तो शांति के लिए बेहतर होगा… हालांकि मैं जानता हूँ कि उन्होंने कानून तोड़ा है।”

निष्कर्ष के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु:

भगत सिंह की शहादत के बाद गांधी जी ने कराची अधिवेशन में स्वीकार किया था:

“भगत सिंह की वीरता के बारे में सुनकर मेरा सिर झुक जाता है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि देश उनकी पद्धति का अनुसरण न करे।”

यह बयान स्पष्ट करता है कि गांधी जी भगत सिंह की लोकप्रियता से तो परिचित थे, लेकिन उनके विचारों को अपनी राजनीति के लिए खतरा मानते थे।

अगला कदम:

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस अध्याय को आपकी पुस्तक के मुख्य ड्राफ्ट में एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में जोड़ दूँ, या आप इसे क्रांतिकारी आंदोलन वाले अध्याय का ही विस्तार बनाना चाहेंगे?

उपसंहार: आदर्शवाद की भेंट चढ़ता राष्ट्र

गांधी जी के राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन करते समय यह स्पष्ट होता है कि उनके आदर्श अक्सर यथार्थ की धरती पर विफल रहे। जिस हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने ‘खिलाफत’ जैसे साम्प्रदायिक आंदोलन का कंधा दिया, उसी का अंत मोपला और कोहाट जैसे भीषण नरसंहारों में हुआ। उनके द्वारा दिया गया ‘एक वर्ष में स्वराज’ का वचन जब अधूरा रहा, तो उन्होंने वस्त्र त्याग जैसे प्रतीकात्मक कृत्यों से जनता की भावनाओं को तो संभाला, लेकिन राजनीतिक लक्ष्य पीछे छूट गया।

सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि एक ओर गांधी जी अंग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे, वहीं दूसरी ओर अपने ही देश के वीर क्रांतिकारियों—भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु—की सशस्त्र क्रांति को वे ‘हिंसा’ और ‘अधर्म’ मानते रहे। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने गांधी जी की अहिंसा को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए एक ‘सुरक्षा वाल्व’ (Safety Valve) की तरह इस्तेमाल किया।

अंततः, गांधी जी की तुष्टीकरण की नीति और अहिंसा के प्रति उनका हठधर्मी दृष्टिकोण भारत के विभाजन का एक प्रमुख कारण बना। यह पुस्तक हमें यह सोचने पर विवश करती है कि यदि उस समय भारत का नेतृत्व तिलक जैसे जुझारू राष्ट्रवादियों या सावरकर और बोस जैसे क्रांतिकारियों के वैचारिक प्रभाव में होता, तो शायद आज भारत का नक्शा और इतिहास दोनों भिन्न होते। यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सबक है कि राष्ट्र केवल आदर्शों से नहीं, बल्कि कठोर यथार्थ और राष्ट्रहित की अडिग नीतियों से निर्मित होता है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख प्रस्तुत पुस्तक अंश एवं ऐतिहासिक संदर्भों के विश्लेषणात्मक अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की छवि को आघात पहुँचाना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं और नीतियों पर एक शैक्षणिक व समीक्षात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।

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