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आरएसएस का प्रारंभिक इतिहास (1925–1950): बीजारोपण से संगठन के वैश्विक वटवृक्ष बनने की महागाथा

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नई दिल्ली | 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नींव 1925 में नागपुर के मोहिते बाड़े में रखी गई थी। मात्र 17-18 युवाओं से शुरू हुआ यह संगठन आज अपने शताब्दी वर्ष (Centenary Year 2025-2026) के ऐतिहासिक पड़ाव पर पहुँच चुका है। 1925 से 1950 तक के 25 वर्षों का यह दौर केवल संगठन के विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, वैचारिक सुदृढ़ता और राष्ट्र-पुनर्निर्माण की एक अभूतपूर्व यात्रा रही है।
आइए, विस्तार से समझते हैं कि कैसे एक छोटे से विचार ने आज भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार दिया।

1. डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार और ‘हिंदू राष्ट्र’ का बीजारोपण (1925)

डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी राजनीतिक विश्लेषक थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनुशीलन समिति के क्रांतिकारी गतिविधियों से लेकर कांग्रेस के असहयोग आंदोलन (1921) तक, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के हर पहलू को गहराई से समझा।
जेल की कालकोठरी और तत्कालीन सामाजिक बिखराव को देखकर डॉ. हेडगेवार एक निष्कर्ष पर पहुँचे:
“जब तक राष्ट्र का आधार—उसका समाज—संगठित, अनुशासित और चारित्रिक रूप से मजबूत नहीं होगा, तब तक कोई भी स्वतंत्रता स्थायी नहीं रह सकती।”
उन्होंने तर्क दिया कि भारत कोई ‘नया निर्मित राष्ट्र’ नहीं, बल्कि एक प्राचीन ‘हिंदू राष्ट्र’ है। 1925 की ऐतिहासिक विजयदशमी के दिन नागपुर के मोहिते बाड़ा में बिना किसी प्रचार या वित्तीय सहायता के मात्र सत्रह युवाओं के साथ इस विचार का बीजारोपण किया गया।

2. संगठन की कार्यपद्धति के 5 मूलभूत स्तंभ

डॉ. हेडगेवार ने महसूस किया कि नारों के स्थान पर एक मजबूत ‘तंत्र’ और ‘व्यक्ति निर्माण’ की आवश्यकता है। इसके लिए उन्होंने 5 सिद्धांत प्रतिपादित किए:
  1. व्यक्ति निर्माण (The Man-Making Process): “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण।” संस्थाओं के बजाय चरित्रवान स्वयंसेवकों का निर्माण।
  2. प्रत्यक्ष संपर्क एवं आत्मीयता (Personal Touch): बिना विज्ञापनों के, घर-घर जाकर ‘चैतन्य के संस्पर्श’ से कार्यकर्ताओं से जुड़ना।
  3. नित्य शाखा (Daily Assembly): प्रतिदिन एक घंटे खुले मैदान में खेल, अनुशासन, सूर्य नमस्कार और प्रार्थना के माध्यम से संस्कारों को स्थायी बनाना।
  4. स्व-वित्तपोषण एवं गुरु दक्षिणा: व्यक्ति पूजा के स्थान पर भगवा ध्वज को सर्वोच्च गुरु मानकर वर्ष में एक बार समर्पित गुप्त दान।
  5. प्रसिद्धी परांगमुखता: प्रचार से दूर रहकर ‘नींव का पत्थर’ बनकर मौन भाव से समाज कार्य करना।

3. सांगठनिक विकास और नामकरण (1926–1929)

17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के आवास पर आयोजित एक बैठक में सर्वसम्मति से संगठन का नाम ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ चुना गया।
  • गणवेश: अनुशासन और चुस्ती-फुर्ती के लिए खाकी शर्ट, खाकी हाफ पैंट, काली टोपी, चमड़े की बेल्ट और जूते निर्धारित किए गए।
  • प्रचारक व्यवस्था: 1927 से ओटीसी (Officers Training Camp / संघ शिक्षा वर्ग) की शुरुआत हुई। मेधावी स्वयंसेवकों को उच्च शिक्षा के बहाने बनारस (BHU) और अन्य विश्वविद्यालयों में भेजकर संघ का अखिल भारतीय विस्तार शुरू किया गया।
  • ध्वज व गुरु पूजन: 1928 में गुरु पूर्णिमा पर भगवा ध्वज को आधिकारिक रूप से गुरु स्वीकार किया गया।

4. स्वतंत्रता संग्राम, सत्याग्रह और द्वितीय सरसंघचालक (1930–1946)

जंगल सत्याग्रह (1930)

1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में संघ को आधिकारिक रूप से दूर रखा गया ताकि संगठन पर प्रतिबंध न लगे, लेकिन स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत भागीदारी की पूर्ण अनुमति दी गई। डॉ. हेडगेवार ने सरसंघचालक का पद डॉ. परांजपे को सौंपा और स्वयं यवतमाल के जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर 9 महीने का कठोर कारावास काटा।

महात्मा गांधी का वर्धा शिविर दौरा (1934)

1934 में वर्धा में संघ के शिविर का दौरा करने जब महात्मा गांधी पहुँचे, तो वे यह देखकर चकित रह गए कि ब्राह्मण और दलित स्वयंसेवक बिना किसी जातिगत भेदभाव के एक साथ भोजन कर रहे थे। उन्होंने संघ की इस सामाजिक समरसता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

द्वितीय सरसंघचालक: श्री गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर)

1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) ने संघ का नेतृत्व संभाला। उन्होंने संगठन को गहरा दार्शनिक आधार और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की स्पष्ट परिभाषा दी। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान स्वयंसेवकों ने व्यक्तिगत स्तर पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और भूमिगत क्रांतिकारियों को शरण दी।

5. विभाजन की विभीषिका, राहत कार्य और कश्मीर विलय (1947)

पंजाब रिलीफ कमेटी

1947 के विभाजन के दौरान भड़की भीषण हिंसा के समय संघ ने ‘पंजाब रिलीफ कमेटी’ का गठन किया। स्वयंसेवकों ने जान जोखिम में डालकर लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों को सुरक्षित भारत पहुँचाया, अमृतसर स्टेशन पर भोजन-दवाइयाँ उपलब्ध कराईं और कुरुक्षेत्र व दिल्ली में विशाल राहत शिविर चलाए।

कश्मीर का विलय (17 अक्टूबर 1947)

कश्मीर के महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच बने असमंजस को दूर करने के लिए गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के आग्रह पर श्री गुरुजी 17 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर पहुँचे। उन्होंने महाराजा को पाकिस्तानी खतरे के प्रति सचेत किया और भारत में विलय के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
इसके बाद 26 अक्टूबर को विलय पत्र पर हस्ताक्षर हुए। इतना ही नहीं, भारतीय वायुसेना के विमान उतर सकें, इसके लिए संघ के स्वयंसेवकों ने गोलाबारी के बीच रातों-रात श्रीनगर हवाई पट्टी की मरम्मत की।

6. अग्निपरीक्षा: प्रतिबंध, ऐतिहासिक पत्राचार और सत्याग्रह (1948–1949)

30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की दुखद हत्या के बाद संघ पर 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया और श्री गुरुजी सहित हजारों स्वयंसेवक गिरफ्तार कर लिए गए।
  • पत्राचार: जेल से श्री गुरुजी ने प्रधानमंत्री नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल से पत्राचार किया। सरदार पटेल ने माना कि संघ का हत्या से कोई संबंध नहीं है तथा संघ के सेवा कार्यों की सराहना की, लेकिन प्रतिबंध हटाने के लिए लिखित संविधान की शर्त रखी।
  • 1948 का सत्याग्रह: 9 दिसंबर 1948 से शुरू हुए स्वतंत्र भारत के इस पहले सबसे बड़े नागरिक अधिकार आंदोलन में 77,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी गिरफ्तारियाँ दीं।
  • प्रतिबंध की समाप्ति: 12 जुलाई 1949 को सरकार ने बिना शर्त प्रतिबंध हटा लिया और संघ का लिखित संविधान स्वीकृत हुआ।

7. संघ के तीन देवतुल्य मार्गदर्शक एवं अनुषांगिक संगठन (1950 तक)

1950 तक संघ केवल ‘शाखा’ तक सीमित न रहकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में विचार-विस्तार करने लगा था:

तीन प्रमुख आधारस्तंभ

  1. अप्पाजी जोशी (रामचंद्र गणेश जोशी): डॉ. हेडगेवार के ‘दाहिने हाथ’ और संकटमोचक, जिन्होंने वर्धा शिविर का सफल आयोजन किया और सत्याग्रह के समय संगठन को संभाला।
  2. भैयाजी दाणी (प्रभाकर बलवंत दाणी): संघ के दूसरे सरकार्यवाह, जिन्होंने 1931 में काशी (BHU) में संघ की पहली बाहरी शाखा खोली और प्रोफेसर एम.एस. गोलवलकर (श्री गुरुजी) को संघ से जोड़ा।
  3. बाबासाहेब आप्टे (उमाकांत केशव आप्टे): संघ के प्रथम आधिकारिक प्रचारक, जिन्होंने ‘बौद्धिक’ प्रशिक्षण पद्धति विकसित की और ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ की नींव रखी।

1950 तक स्थापित संगठन

  • राष्ट्र सेविका समिति (1936): लक्ष्मीबाई केलकर (मौसी जी) द्वारा स्थापित महिलाओं की स्वतंत्र संस्था।
  • अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद – ABVP (1949): शिक्षा जगत में छात्र शक्ति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने हेतु गठित।
  • भारतीय जनसंघ (1950-51): डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और श्री गुरुजी के विमर्श के बाद राजनीति में संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका तय करने हेतु रखी गई नींव।

8. संघ की प्रार्थना और प्रतिज्ञा का क्रमिक विकास

प्रार्थना की यात्रा

  • 1925–1939: प्रारंभिक दौर में मराठी और हिंदी के अंशों वाली मिश्रित प्रार्थना बोली जाती थी।
  • 1939 (सिंदी शिविर): अखिल भारतीय स्वरूप देने के लिए नरहरि नारायण भिड़े की सहायता से पूर्णतः संस्कृत प्रार्थना तैयार की गई।
  • 1940: वर्तमान प्रसिद्ध संस्कृत प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” सार्वजनिक रूप से सामूहिक रूप से गाई जाने लगी।

प्रतिज्ञा (Oath) में बदलाव

  • 1925–1928: “हिंदू संगठन और हिंदू धर्म के संरक्षण” पर केंद्रित।
  • 1928–1939: स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव में “राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति” शब्द जोड़ा गया।
  • 1939 के बाद: स्वतंत्रता के बाद भी शाश्वत राष्ट्र कार्य जारी रखने के उद्देश्य से “सर्वतोमुख उन्नति” (चहुंमुखी विकास) शब्द को अंगीकार किया गया।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. संघ की स्थापना कब और कहाँ हुई थी?
उत्तर: संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 (विजयदशमी) को नागपुर के मोहिते बाड़ा में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा की गई थी।
Q2. RSS के पहले और दूसरे सरसंघचालक कौन थे?
उत्तर: संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक डॉ. के.बी. हेडगेवार थे (1925–1940) तथा द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) थे (1940–1973)।
Q3. संघ पर पहला प्रतिबंध कब और क्यों लगा था?
उत्तर: संघ पर पहला प्रतिबंध 4 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगाया गया था, जिसे जांच के बाद 12 जुलाई 1949 को बिना शर्त हटा लिया गया।
Q4. संघ का लिखित संविधान कब अस्तित्व में आया?
उत्तर: 1948-49 के प्रतिबंध के उपरांत सरकार की शर्तों के अनुसार संघ ने अपना लिखित संविधान तैयार किया, जिसके बाद जुलाई 1949 में प्रतिबंध समाप्त हुआ।

Disclaimer (अस्वीकरण)

यह लेख ऐतिहासिक अभिलेखों, पुस्तकों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रामाणिक संदर्भों के आधार पर शैक्षणिक व सूचनात्मक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक या सामाजिक समूह के प्रति पूर्वाग्रह व्यक्त करना नहीं है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।