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जब महमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ पर आक्रमण कर उसे लूटा और तोड़ा था

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महमूद ग़ज़नवी द्वारा सोमनाथ मंदिर पर किया गया आक्रमण भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विनाशकारी घटना मानी जाती है। यह आक्रमण न केवल धन की लूट के लिए जाना जाता है, बल्कि इसने मध्यकालीन भारत के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य पर भी गहरा प्रभाव डाला।

आक्रमण की पृष्ठभूमि

महमूद ग़ज़नवी, जो आधुनिक अफगानिस्तान के ग़ज़नी प्रांत का शासक था, ने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए। उसका मुख्य उद्देश्य भारत की अपार धन-संपदा को लूटना और अपने साम्राज्य को शक्तिशाली बनाना था। 1025-1026 ईस्वी में किया गया उसका 16वाँ आक्रमण गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर था।

सोमनाथ मंदिर का महत्व

प्राचीन काल से ही सोमनाथ मंदिर की गणना 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर की जाती थी। यह मंदिर अपनी भव्यता, वास्तुकला और अतुलनीय संपत्ति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग हवा में तैरता था (चुंबकीय शक्ति के कारण), और मंदिर के खजाने में हीरे, जवाहरात और सोने का विशाल भंडार था।

युद्ध और घेराबंदी

जब महमूद की विशाल सेना ने सोमनाथ पर धावा बोला, तब वहां के राजपूत शासकों और स्थानीय निवासियों ने डटकर मुकाबला किया। इतिहासकार बताते हैं कि लगभग 50,000 हिंदू योद्धाओं ने मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। अंततः, महमूद की सेना ने मंदिर की सुरक्षा दीवार को तोड़ दिया और भीतर प्रवेश किया।

मंदिर का विध्वंस और लूट

  • उसने प्रतिष्ठित शिवलिंग को खंडित कर दिया।

  • मंदिर के गर्भगृह और स्तंभों को नष्ट कर दिया गया।

  • हजारों मन सोना, चांदी और कीमती रत्न लूट लिए गए।

  • मंदिर के चंदन के बने द्वारों को भी वह अपने साथ ग़ज़नी ले गया।

आक्रमण का प्रभाव

  • आर्थिक क्षति: भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत को अपूरणीय क्षति हुई।

  • धार्मिक आघात: इस घटना ने भारतीय जनमानस की धार्मिक भावनाओं को गहरी चोट पहुँचाई।

  • राजनीतिक परिणाम: इसने उत्तर-पश्चिमी भारत की रक्षा पंक्तियों की कमजोरी को उजागर कर दिया, जिससे भविष्य में अन्य विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।

पुनर्निर्माण की परंपरा

सोमनाथ मंदिर की यह विशेषता रही है कि जितनी बार इसे नष्ट किया गया, उतनी ही बार इसका पुनरुद्धार हुआ। महमूद के जाने के बाद राजा भीमदेव और राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। स्वतंत्रता के पश्चात, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से आज का आधुनिक और भव्य मंदिर फिर से अपने गौरव के साथ खड़ा है।

महमूद ग़ज़नवी ने 1000 ईस्वी से 1027 ईस्वी के बीच भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए, इनमें से कुछ प्रमुख आक्रमण :

सीमावर्ती नगरों पर आक्रमण (1000 ईस्वी)

महमूद का पहला आक्रमण भारत के सीमावर्ती कस्बों पर हुआ। उसने कई किलों को जीता और वहां अपने गवर्नर नियुक्त किए।

राजा जयपाल के विरुद्ध युद्ध (1001 ईस्वी)

यह महमूद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आक्रमण था। पेशावर के पास हिंदू शाही राजा जयपाल और महमूद के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जयपाल की हार हुई और उसे बंदी बना लिया गया। इस अपमान से दुखी होकर जयपाल ने आत्मदाह कर लिया था।

भटिंडा की विजय (1004-1005 ईस्वी)

महमूद ने भटिंडा के राजा विजय राय को पराजित किया। राजा ने अंत तक मुकाबला किया लेकिन पराजय देखकर आत्महत्या कर ली।

मुल्तान पर आक्रमण (1006 ईस्वी)

महमूद ने मुल्तान के शासक फतेह दाऊद के खिलाफ आक्रमण किया। इसी दौरान उसने आनंदपाल (जयपाल के पुत्र) को भी पराजित किया।

आनंदपाल के विरुद्ध ‘वहिंद’ का युद्ध (1008 ईस्वी)

आनंदपाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर और कन्नौज के राजाओं के साथ मिलकर एक संघ बनाया, लेकिन महमूद की अनुशासित सेना और हाथियों के बिदक जाने के कारण आनंदपाल की हार हुई। यह महमूद की भारत में सत्ता स्थापित करने की दिशा में बड़ी जीत थी।

नगरकोट की लूट (1009 ईस्वी)

कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के नगरकोट मंदिर पर आक्रमण कर महमूद ने भारी मात्रा में सोना-चांदी और खजाना लूटा। यह पहली बार था जब उसने किसी बड़े हिंदू मंदिर को निशाना बनाया था।

थानेश्वर पर आक्रमण (1014 ईस्वी)

उसने हरियाणा के थानेश्वर पर हमला किया और वहां के प्रसिद्ध ‘चक्रस्वामी मंदिर’ को नष्ट किया और वहां से बेशुमार संपत्ति लूटी।

मथुरा और कन्नौज का अभियान (1018-1019 ईस्वी)

यह उसका सबसे बड़ा सैन्य अभियान माना जाता है। उसने मथुरा की सुंदरता और वहां के मंदिरों को नष्ट किया। इसके बाद उसने कन्नौज के राजा राज्यपाल पर आक्रमण किया, जो बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ।

कालिंजर का अभियान (1021-1022 ईस्वी)

महमूद ने चंदेल राजा विद्याधर के विरुद्ध युद्ध किया। हालांकि, यह घेराबंदी एक संधि के साथ समाप्त हुई और महमूद को काफी धन प्राप्त हुआ।

सोमनाथ मंदिर (1025 ईस्वी) – सबसे प्रसिद्ध

जैसा कि पहले चर्चा की गई, यह उसका 16वाँ और सबसे विनाशकारी आक्रमण था, जहाँ उसने मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया।

अंतिम आक्रमण (1027 ईस्वी)

महमूद का अंतिम आक्रमण सिंध के जाटों के विरुद्ध था। जब वह सोमनाथ से लौट रहा था, तब जाटों ने उसकी सेना को परेशान किया था, जिसका बदला लेने के लिए उसने यह आखिरी हमला किया।

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