नई दिल्ली।
स्वतंत्रता के आठ दशकों बाद भी भारत का एक बड़ा वर्ग कागजों पर ‘अदृश्य’ बना हुआ है। औपनिवेशिक दौर में समुदायों पर लगाया गया ‘जन्मजात अपराधी’ का ठप्पा कानूनी तौर पर 31 अगस्त 1952 को हटा दिया गया था, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण आज भी 8 से 15 करोड़ लोग सांख्यिकीय और योजनाओं के स्तर पर हाशिए पर हैं। आगामी 2027 की जनगणना भारत के लिए इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का एक बड़ा अवसर है।
औपनिवेशिक हथियार: बेंटिक, स्लीमैन और 1871 का कानून
ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के स्वतंत्र खानाबदोश समुदायों, कारीगरों और व्यापारियों को नियंत्रित करने के लिए योजनाबद्ध कदम उठाए:
- ठगी और डकैती विभाग (1835): गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक और विलियम हेनरी स्लीमैन ने घुमंतू लोहारों और कारीगरों को “वंशानुगत अपराधी” करार देकर समाज से बहिष्कृत किया।
- आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871): टी.वी. स्टीफेंस द्वारा लागू इस कानून ने पश्चिमी अपराध विज्ञान को भारतीय जातियों पर थोप दिया—जिसमें यह माना गया कि आपराधिकता आनुवंशिक होती है।
- सांस्कृतिक व आर्थिक विनाश: ब्रिटिश नमक एकाधिकार और वन कानूनों ने येरुकुला और संसी जैसे समुदायों की आजीविका छीन ली। साल्वेशन आर्मी द्वारा संचालित श्रम शिविरों में इनसे जबरन मजदूरी कराई गई।
आजादी के बाद का दौर: विमुक्ति दिवस और खोखले कानून
भारतीय नेताओं के विरोध और 1949 की अय्यंगार समिति की रिपोर्ट के बाद 31 अगस्त 1952 को यह कानून निरस्त हुआ। पूर्व लक्षित समूह इस दिन को विमुक्ति दिवस (Liberation Day) के रूप में मनाते हैं।
हालाँकि, यह राहत अधूरी रही:
- संवैधानिक अनुसूची का अभाव: संविधान के अनुच्छेद 341 (SC) और 342 (ST) में DNT (Denotified Tribes) के लिए समर्पित ढांचा नहीं रखा गया।
- आदतन अपराधी कानून (Habitual Offenders Act): 1952 के बाद राज्यों द्वारा बनाए गए इन कानूनों के जरिए स्थानीय पुलिस ने पुराने औपनिवेशिक रजिस्टरों के आधार पर DNT परिवारों पर रात में छापे और गिरफ्तारियां जारी रखीं।
सांख्यिकीय उपेक्षा: प्रमुख आयोग और उनकी रिपोर्ट
1951 के बाद दस-वर्षीय जनगणना में SC/ST के अलावा अलग-अलग जातियों का डेटा जुटाना बंद कर दिया गया, जिससे ये समुदाय राष्ट्रीय डेटाबेस से गायब हो गए।
| आयोग / समिति | वर्ष | मुख्य निष्कर्ष व कमियां |
| काका कालेलकर आयोग | 1953 | पूर्व-आपराधिक जनजातियों की समस्याओं को स्वीकार किया, पर अलग अनुसूची नहीं बनाई। |
| लोकुर समिति | 1965 | ST पहचान हेतु “भौगोलिक पृथक्करण” का पैमाना रखा, जिससे गांवों से जुड़े घुमंतू DNT बाहर हो गए। |
| मंडल आयोग | 1980 | DNTs को विशाल OBC वर्ग में मिला दिया, जिससे वे ताकतवर जातियों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए। |
| बालकृष्ण रेणके आयोग | 2008 | DNT/NT आबादी ~10.74 करोड़ आंकी और माना कि संविधान निर्माता इन्हें भूल गए थे। |
| भीकू रामजी इदाते आयोग | 2018 | 1,235 से 1,400 समुदायों की पहचान की। 173 खानाबदोश समुदाय आरक्षण से पूरी तरह बाहर पाए गए (उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 28)। |
2027 की जनगणना: पारंपरिक मॉडल की कमियां और समाधान
भारत की पारंपरिक जनगणना पद्धति पूरी तरह घर–केंद्रित (House-centric) होती है, जो तीन प्रकार के घुमंतू समूहों की गणना में असमर्थ रहती है:
- ऋतुप्रवासी पशुपालक: (जैसे गुज्जर, रबारी, धनगर)
- पारंपरिक कलाकार/मनोरंजनकर्ता: (जैसे नट, कालबेलिया, डोम)
- घुमक्कड़ कारीगर: (जैसे गडुलिया लोहार)
स्थायी पता न होने के कारण इन्हें जाति प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड या बैंक खाते नहीं मिल पाते, जिससे वे सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।
2027 जनगणना के लिए आवश्यक कदम:
- तकनीकी नवाचार: जियो-एआई (GeoAI) मैपिंग, गतिशील भू-स्थानिक गणना (Geo-spatial Enumeration) और रियल-टाइम मोबाइल ट्रैकिंग का उपयोग।
- उप–कोटा (Sub-quotas): महाराष्ट्र के VJNT मॉडल की तर्ज पर आरक्षण के भीतर अलग उप-वर्गीकरण लागू करना।
- डिजिटल संग्रह: कर्नाटक विकास निगम की तर्ज पर मौखिक वंशावली रिकॉर्ड्स (जैसे हेलावा समुदाय) का डिजिटलीकरण।
- वैधानिक दर्जा: ‘विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के लिए विकास और कल्याण बोर्ड’ (DWBDNC) को पूर्ण वैधानिक दर्जा प्रदान करना।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1: DNT और NT समुदायों में क्या अंतर है?
Ans: DNT (Denotified Tribes) वे समुदाय हैं जिन्हें 1871 के कानून के तहत ‘आपराधिक’ घोषित किया गया था और 1952 में सूची से हटाया गया। NT (Nomadic Tribes) वे घुमंतू समुदाय हैं जो आजीविका के लिए लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान प्रवास करते हैं।
Q2: विमुक्ति दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
Ans: विमुक्ति दिवस हर वर्ष 31 अगस्त को मनाया जाता है। इसी दिन 1952 में भारत सरकार ने केंद्रीय आपराधिक जनजाति अधिनियम को आधिकारिक रूप से रद्द किया था।
Q3: 2027 की जनगणना इन समुदायों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
Ans: यह जनगणना आधुनिक जियो-मैपिंग और मोबाइल ट्रैकिंग तकनीकों के जरिए 8 से 15 करोड़ घुमंतू नागरिकों की सटीक गणना कर उन्हें प्रशासनिक पहचान और अंत्योदय योजनाओं का लाभ दिलाने का ऐतिहासिक अवसर है।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी आयोगों (जैसे रेणके और इदाते आयोग) की रिपोर्टों और जनगणना संबंधी संदर्भों पर आधारित एक विश्लेषणात्मक आलेख है। इसका उद्देश्य सामाजिक और सांख्यिकीय विषयों पर जागरूकता फैलाना है।
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