बेंगलुरु।
कर्नाटक में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म परिवर्तन से जुड़े विवादों का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रतिनिधिमंडल ने राज्य सरकार और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार तथा मुख्य सचिव को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर वर्ष 2022 में लागू किए गए कर्नाटक धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम (Karnataka Protection of Right to Freedom of Religion Act) को वापस न लेने या इसके प्रावधानों को कमजोर न करने की पुरजोर मांग की है।
VHP का तर्क है कि यह कानून बल प्रयोग, छल-कपट, प्रलोभन और जबरन कराए जाने वाले गैर-कानूनी धर्मांतरण को रोकने के लिए अत्यंत आवश्यक है। संगठन ने चेतावनी दी है कि कानून वापस लेने या ढील देने से सामाजिक ताने-बाने और कानून व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
VHP के ज्ञापन के मुख्य बिंदु
- सामाजिक सुरक्षा: VHP के अनुसार, कानून का मुख्य मकसद कमजोर वर्गों, महिलाओं और नाबालिगों को प्रलोभन या दबाव में धर्मांतरित होने से बचाना है।
- कानूनी समीक्षा की मांग: सरकार से आग्रह किया गया है कि किसी भी तरह का फैसला लेने से पहले इसके कानूनी और सामाजिक दुष्परिणामों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए।
क्या है कर्नाटक का 2022 का धर्मांतरण विरोधी कानून?
यह कानून 2022 में तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा लागू किया गया था। इसके तहत निम्नलिखित गतिविधियों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया गया है:
- बलपूर्वक या जबरन धर्म परिवर्तन।
- धोखाधड़ी, गलत जानकारी या गुमराह करके धर्मांतरण।
- आर्थिक प्रलोभन, मुफ्त शिक्षा, इलाज या विवाह के झूठे वादे से धर्म परिवर्तन।
कानून में सजा और जुर्माने के प्रावधान
| श्रेणी / अपराध | सजा | जुर्माना |
| सामान्य मामलों में | 3 से 5 वर्ष की जेल | ₹25,000 |
| नाबालिग, महिला या SC/ST का धर्मांतरण | 3 से 10 वर्ष की जेल | ₹50,000 |
| सामूहिक धर्मांतरण (Mass Conversion) | 3 से 10 वर्ष की जेल | ₹1,00,000 |
कांग्रेस सरकार के सामने राजनीतिक और कानूनी चुनौती
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद से ही इस कानून की समीक्षा और इसे निरस्त करने को लेकर कैबिनेट स्तर पर चर्चाएं चलती रही हैं। कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा कार्यकाल के कई कानूनों की समीक्षा का वादा किया था।
हालांकि, कानून को पूरी तरह निरस्त करने या संशोधन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया में विभिन्न धार्मिक समूहों, सामाजिक संगठनों और विपक्ष के रुख को ध्यान में रखते हुए सरकार फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रही है।
ईसाई संगठनों और नागरिक समूहों का पक्ष
दूसरी ओर, राज्य के कई ईसाई संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों ने संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए इस कानून को वापस लेने की मांग की है। उनका दावा है कि कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग निर्दोष लोगों और धार्मिक संस्थानों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q1: कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून कब लागू हुआ था?
Ans: यह कानून वर्ष 2022 में तत्कालीन भाजपा सरकार के कार्यकाल में ‘कर्नाटक धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम’ के रूप में लागू किया गया था।
Q2: VHP की मुख्य मांग क्या है?
Ans: विश्व हिंदू परिषद (VHP) की मांग है कि राज्य सरकार इस कानून को निरस्त न करे और इसके दंडात्मक प्रावधानों को कमजोर न करे।
Q3: कानून के तहत सामूहिक धर्मांतरण पर क्या सजा है?
Ans: सामूहिक धर्मांतरण के दोषी पाए जाने पर 3 से 10 वर्ष तक की जेल और ₹1,00,000 का जुर्माना तय किया गया है।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, कानूनी दस्तावेजों और विश्व हिंदू परिषद (VHP) द्वारा दिए गए ज्ञापन के तथ्यों पर आधारित है। मातृभूमि समाचार किसी भी पक्ष या धार्मिक विचारधारा का समर्थन नहीं करता है और निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करता है।
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