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‘वोट-बैंक’ से ‘विकास-बैंक’ तक: डेटा-आधारित कल्याणकारी योजनाओं का नया युग

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
9 Min Read

नई दिल्ली।

उत्तर प्रदेश के एक दूरदराज गाँव में दो भूमिहीन मजदूर रहते हैं। एक दलित समाज से आता है और दूसरा किसी अन्य जाति से। दोनों के पास रहने के लिए एक-एक कमरे का कच्चा मकान है, खाना बनाने के लिए पारंपरिक ईंधन का इस्तेमाल होता आया है और बीते एक दशक तक दोनों में से किसी के पास बैंक खाता भी नहीं था।

दशकों तक भारतीय राजनीति ने इन्हें सिर्फ अलग-अलग ‘वोट–बैंक’ के खानों में बांटकर देखा। चुनाव आते ही जातिगत वादों के साथ इन्हें रिझाने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने भी इन्हें इनकी मूल पहचान—यानी ‘गरीब’—के रूप में नहीं देखा।

आज 2047 के ‘विकसित भारत’ का विजन इस पुराने जातिगत समीकरण को बदलकर ‘विकास–बैंक’ और ‘अंत्योदय’ (समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान) के सिद्धांत पर काम कर रहा है। इसका सीधा नियम है: वंचना (अभाव) को डेटा से पहचानो और बिना जाति पूछे हर जरूरतमंद तक सरकारी योजना का लाभ पहुँचाओ।

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जाति का राजनीतिकरण: 1967 से ‘मंडल दौर’ तक

भारतीय चुनावी राजनीति में जाति एक केंद्रीय कारक कैसे बनी, इसकी शुरुआत 1967 के चौथे आम चुनाव से मानी जाती है जब कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ।

  • राजनीतिक श्रेणी के रूप में उभार: डॉ. राम मनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं ने पिछड़ी जातियों और किसान लामबंदी को एक मजबूत राजनीतिक मंच प्रदान किया। समाजशास्त्री क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलोट की पुस्तक ‘इंडियाज़ साइलेंट रेवोल्यूशन’ में इसे हिंदी पट्टी का राजनीतिक लोकतंत्रीकरण कहा गया, जिसने पहचान को चुनावी समीकरण का आधार बना दिया।
  • मंडल आयोग और 1990 का दशक: अगस्त 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण लागू करने से जातिगत राजनीति अपने चरम पर पहुँच गई।
  • ‘क्रीमी लेयर’ की शुरुआत: ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को सही ठहराते हुए “क्रीमी लेयर” की अवधारणा पेश की। यह न्यायपालिका का एक स्पष्ट संकेत था कि जातिगत पहचान और वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन हमेशा एक समान नहीं होते।

 

श्रेणी पर ‘कब्ज़े’ (Capture) की समस्या और उप–वर्गीकरण

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जब किसी पूरी श्रेणी को एकसमान मानकर लाभ दिया जाता है, तो उस श्रेणी के भीतर जो समूह सामाजिक या राजनीतिक रूप से अधिक संगठित होते हैं, वे अधिकतर अवसरों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। इससे सबसे गरीब और वंचित समुदाय (जैसे मुसहर या वाल्मीकि) पीछे छूट जाते हैं।

  • जस्टिस जी. रोहिणी आयोग (2017): आयोग के विश्लेषण और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, OBC आरक्षण का लगभग 97% लाभ केवल 25% उप-जातियों तक सिमट कर रह गया था, जबकि सूची में शामिल 37% समुदायों (983 उप-जातियों) की उपस्थिति न के बराबर रही।
  • सुप्रीम कोर्ट का लैंडमार्क फैसला (अगस्त 2024): दविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने 6:1 के बहुमत से माना कि अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के भीतर भी ‘उप-वर्गीकरण’ (Sub-classification) किया जा सकता है, ताकि सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) का लाभ सबसे निचले पायदान पर खड़े परिवारों तक पहुँचे।

 

वंचना का डेटा और नीति आयोग का बहुआयामी दृष्टिकोण

सच्चा अंत्योदय जाति के गणित से नहीं, बल्कि ‘अभाव के आंकड़े’ से संभव होता है। भारत सरकार ने इसी आधार पर अपनी लक्षित कल्याणकारी नीतियों की रूपरेखा तैयार की है:

SECC-2011 (सामाजिक–आर्थिक जाति जनगणना)

ग्रामीण विकास मंत्रालय की इस जनगणना में 17.97 करोड़ ग्रामीण परिवारों का अध्ययन किया गया। इसमें ऑटोमैटिक एक्सक्लूजन (जैसे मोटर वाहन, सरकारी नौकरी, आयकर दाता होना) के जरिए 7.07 करोड़ संपन्न परिवारों को बाहर किया गया और 7 तरह की वंचनाओं (Deprivations) के आधार पर वास्तविक गरीबों की पहचान की गई।

नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (National MPI)

नीति आयोग का MPI 12 गैर-जातिगत मानकों पर आधारित है—जैसे स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, संपत्ति और बैंक खाता।

  • गरीबी में ऐतिहासिक गिरावट: नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बहुआयामी गरीबी 2013-14 के 29.17% से घटकर 2022-23 में 11.28% पर आ गई है। इससे लगभग 24.82 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश (5.94 करोड़) और बिहार (3.77 करोड़) सबसे आगे रहे हैं।
  • विश्व बैंक की रिपोर्ट (2026): ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ 2026′ के अनुसार, 2011 से 2023 के दौरान निम्न-मध्यम आय गरीबी रेखा ($4.20 प्रतिदिन) के नीचे रहने वाली भारतीय आबादी 57.7% से घटकर 16.1% रह गई है।

 

मुख्य चार योजनाएं: डेटा–आधारित समावेशी विकास

योजना का नामपात्रता का आधारप्रमुख आंकड़े और प्रभाव
PM जन धन योजनाजाति-निरपेक्ष (बैंकिंग सुविधा न होना)अगस्त 2026 तक 59.09 करोड़ खाते खोले गए, जिनमें 55.7% महिलाएं और 77.8% ग्रामीण/अर्ध-शहरी आबादी शामिल है।
PM आवास योजना (ग्रामीण)SECC वंचना सूची2.67 करोड़ से अधिक घर निर्मित। कुल घरों का लगभग 44% (59.58 लाख SC और 58.57 लाख ST परिवार) सीधे वंचित वर्ग तक पहुँचा।
आयुष्मान भारत (PM-JAY)SECC डेटा + 70 वर्ष से अधिक के सभी नागरिकसितंबर 2026 तक 48.51 करोड़ आयुष्मान कार्ड जारी किए गए और 13.25 करोड़ से अधिक मुफ़्त इलाज दिए गए।
PM उज्ज्वला योजना (PMUY)SECC + 14-बिंदु स्व-घोषणाजनवरी 2025 तक 10.33 करोड़ मुफ़्त एलपीजी कनेक्शन प्रदान किए जा चुके हैं।

निष्कर्ष: SECC डेटा के अनुसार SC/ST परिवार कुल वंचित आबादी का लगभग 43% हैं। इसलिए जब योजना का आधार ‘अभाव’ होता है, तो दलित और आदिवासी परिवारों को स्वतः ही प्राथमिकता मिलती है, और साथ ही अन्य वर्गों के भूमिहीन व गरीब परिवार भी वंचित नहीं रहते।

 

पूरक व्यवस्था: सामाजिक न्याय और भौतिक कल्याण का संतुलन

जाति-केंद्रित नीतियां और डेटा-आधारित वंचना नीतियां एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं, बल्कि पूरक हैं:

  1. सामाजिक भेदभाव का निवारण: जाति-आधारित कानून (जैसे SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम) और राजनीतिक प्रतिनिधित्व सामाजिक विषमता और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए अनिवार्य हैं।
  2. भौतिक कल्याण: पक्का मकान, स्वास्थ्य सुरक्षा, स्वच्छ ईंधन और राशन जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का एकमात्र आधार ‘अभाव’ होना चाहिए, ताकि हर समाज का अंतिम व्यक्ति सशक्त हो सके।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: ‘वोट–बैंक’ से ‘विकास–बैंक’ का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है राजनीति और शासन के मॉडल में बदलाव—जहाँ जातियों को केवल चुनाव जीतने के वोट-बैंक के रूप में देखने के बजाय, डेटा के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सभी गरीबों तक बुनियादी सुविधाओं (विकास) को पहुँचाया जाता है।

Q2: क्या डेटा–आधारित योजनाओं से SC/ST और OBC वर्गों को नुकसान होता है?

उत्तर: नहीं। डेटा दिखाता है कि भारत में वंचित परिवारों का एक बड़ा हिस्सा SC/ST और अत्यंत पिछड़े वर्गों से आता है। इसलिए वंचना के आधार पर दी जाने वाली योजनाओं का सबसे अधिक लाभ स्वतः ही इन वर्गों को मिलता है, जबकि अन्य जातियों के गरीब भी छूटने से बच जाते हैं।

Q3: नीति आयोग का National MPI क्या है?

उत्तर: यह राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक है जो केवल आय के बजाय 12 बुनियादी मानकों (स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर, बिजली, मकान आदि) के आधार पर गरीबी का आकलन करता है।

 

संबंधित लेख और महत्वपूर्ण लिंक्स

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अस्वीकरण (Disclaimer):

यह लेख उपलब्ध सामाजिक–आर्थिक आंकड़ों, नीति आयोग की रिपोर्टों और विश्लेषणात्मक संदर्भों के आधार पर सामान्य जानकारी एवं जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।