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भारत-अमेरिका वार्ता: विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रूबियो के बीच टैरिफ और रक्षा पर अहम चर्चा

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नई दिल्ली. भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को और प्रगाढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच हाल ही में (13 जनवरी, 2026) एक अहम फोन वार्ता हुई। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब दोनों देश व्यापारिक टैरिफ और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा कर रहे हैं।

1. व्यापार और आर्थिक साझेदारी

दोनों नेताओं के बीच बातचीत का सबसे प्रमुख मुद्दा द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Bilateral Trade Agreement) रहा। पिछले कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए भारी टैरिफ (खासकर रूसी तेल खरीद के संदर्भ में) के कारण संबंधों में कुछ खिंचाव देखा गया था।

  • सकारात्मक संकेत: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इस बातचीत को अत्यंत सकारात्मक बताया और संकेत दिया कि व्यापार वार्ता के “अगले चरण” पर काम शुरू हो चुका है।

  • Pax Silica गठबंधन: चर्चा के दौरान भारत को ‘Pax Silica’ (सिलिकॉन आपूर्ति श्रृंखला के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाला गठबंधन) में शामिल करने पर भी जोर दिया गया, जिससे भारत की सेमीकंडक्टर निर्माण क्षमता को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी।

2. रक्षा और परमाणु ऊर्जा सहयोग

रक्षा क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग “साझा हितों” पर आधारित है।

  • रणनीतिक सुरक्षा: दोनों मंत्रियों ने हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए रक्षा संबंधों को और मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की।

  • परमाणु ऊर्जा: रूबियो ने भारत द्वारा हाल ही में पारित परमाणु ऊर्जा विधेयक (SHANE Act) की सराहना की। इससे अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के नागरिक परमाणु क्षेत्र में निवेश के नए अवसर खुलेंगे।

3. महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals)

भविष्य की तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ की सुरक्षित सप्लाई चेन पर भी चर्चा हुई। भारत और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करना चाहते हैं।

4. आगामी मुलाकात की संभावना

इस फोन वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने अगले महीने (फरवरी 2026) एक व्यक्तिगत मुलाकात (In-person meeting) की संभावनाओं पर भी चर्चा की है। यह मुलाकात प्रस्तावित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है।

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