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इतिहास के हाशिए से: सरदार पटेल की अनकही कहानी और आधुनिक भारत का निर्माण

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
9 Min Read
इतिहास अक्सर विजेताओं या लंबे समय तक सत्ता में रहने वालों के दृष्टिकोण से लिखा जाता है। यही कारण है कि भारत के ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व हमारे सामने हमेशा एक विशाल, स्थिर और एकीकरण करने वाले नेता के रूप में तो आता है, लेकिन उनके वे रणनीतिक निर्णय और कड़े कदम अक्सर हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं, जिन्होंने भारत को सचमुच एक अखंड राष्ट्र बनाया। आइए, उस महामानव की उस यात्रा पर विस्तार से चर्चा करें जिसे मुख्यधारा के विमर्श में अक्सर गौण कर दिया गया।

1946 का चुनाव: जब लोकतंत्र पर भारी पड़ा सरदार का त्याग

आधुनिक भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल हमेशा यही रहा है कि “अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते, तो क्या होता?” इसकी जड़ें 1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में हैं। यह स्पष्ट था कि जो भी इस चुनाव में जीतेगा, वह अंतरिम सरकार का नेतृत्व करेगा और स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा।
लोकतांत्रिक जनादेश पूरी तरह से सरदार पटेल के पक्ष में था। 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों (PCC) में से 12 ने स्पष्ट रूप से पटेल का नाम प्रस्तावित किया था। दूसरी ओर, जवाहरलाल नेहरू को एक भी समिति का समर्थन प्राप्त नहीं था। इसके बावजूद, महात्मा गांधी का मानना था कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेहरू भारत का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। गांधीजी के एक इशारे और भेजी गई एक ‘पर्ची’ पर सरदार पटेल ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना नाम वापस ले लिया। उनके पास पूर्ण बहुमत था, लेकिन राष्ट्र को नेतृत्व के संकट और आपसी टकराव से बचाने के लिए उन्होंने ‘नंबर दो’ की भूमिका सहर्ष स्वीकार की।

1947 का दिल्ली संकट: ‘गजवा-ए-हिन्द’ की साजिश और एक सर्जिकल स्ट्राइक

अगस्त और सितंबर 1947 के दौरान दिल्ली केवल एक राजधानी नहीं, बल्कि बारूद का ढेर बनी हुई थी। एक तरफ विभाजन का दर्द था, और दूसरी तरफ दिल्ली के भीतर ही तख्तापलट की एक गहरी साजिश रची जा रही थी। खुफिया रिपोर्टों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के जमीनी कार्यकर्ताओं से मिली सटीक सूचनाओं के अनुसार, दिल्ली के कुछ खास इलाकों को गुप्त रूप से सशस्त्र दुर्ग में बदला जा रहा था। उद्देश्य था भारत सरकार को पंगु बनाना।
जब 10 सितंबर 1947 के आसपास एक बड़े ‘विस्फोट’ की गुप्त सूचना पटेल तक पहुंची, तो उन्होंने बिना समय गंवाए कमान अपने हाथ में ली। शांति और अपील की राजनीति को किनारे रखते हुए पटेल ने आधी रात को सेना और पुलिस के साथ मिलकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी कार्रवाई की। सघन छापेमारी में भारी मात्रा में आधुनिक हथियार और ट्रांसमीटर बरामद हुए। पटेल का स्पष्ट आदेश था कि राजधानी की सुरक्षा सर्वोपरि है। उनकी इसी तत्परता ने दिल्ली को एक और भयानक ‘बंटवारे’ और गृहयुद्ध से बचा लिया।

कश्मीर विलय: श्री गुरुजी और पटेल का कूटनीतिक ‘मास्टरस्ट्रोक’

अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तानी कबायली हमले की साजिश रच रहे थे और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ‘स्वतंत्र’ रहने के दुविधापूर्ण विचार में उलझे थे, तब कूटनीतिक संवाद लगभग टूट चुका था। महाराजा का कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर नेहरू के प्रति अविश्वास जगजाहिर था।
इस विकट परिस्थिति में सरदार पटेल ने एक अलग रास्ता चुना। वे जानते थे कि डोगरा राजा हरि सिंह केवल एक ही व्यक्ति की बात सुन सकते हैं— आरएसएस के सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी)। पटेल के विशेष आग्रह पर श्री गुरुजी 17 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर पहुंचे। उन्होंने महाराजा को स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ जाने या स्वतंत्र रहने का परिणाम घाटी का पूर्ण विनाश होगा। गुरुजी ने पटेल की ओर से महाराजा को उनके सम्मान की रक्षा का पूरा आश्वासन दिया। इसी मुलाकात ने कश्मीर के भारत में विलय की वास्तविक मनोवैज्ञानिक नींव रखी। बाद में, जब कबायलियों ने हमला किया, तब संघ के स्वयंसेवकों ने सेना के पहुंचने से पहले हवाई पट्टी की मरम्मत और रक्षा में अद्वितीय योगदान दिया।

कांग्रेस और आरएसएस के विलय का अधूरा विजन

सरदार पटेल भारत को वैचारिक ध्रुवीकरण से बचाना चाहते थे। गांधीजी की हत्या के बाद जब आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटा, तो पटेल ने एक दूरदर्शी कदम उठाया। वे मानते थे कि आरएसएस के लाखों अनुशासित और राष्ट्रवादी युवा अगर कांग्रेस के राजनीतिक मंच से जुड़ जाएं, तो देश में वामपंथी अराजकता और कांग्रेस के भीतर पनप रही गुटबाजी को समाप्त किया जा सकता है।
पटेल के प्रयासों से 10 नवंबर 1949 को कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें संघ के स्वयंसेवकों को कांग्रेस की सदस्यता लेने की अनुमति दी गई। यह भारत की राजनीति को ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के साथ जोड़ने का एक अभूतपूर्व प्रयास था। लेकिन, जैसे ही नेहरू विदेश से लौटे, उन्होंने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। राजनीतिक असुरक्षा और वैचारिक मतभेदों के चलते कुछ ही हफ्तों में यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया। पटेल का वह ‘ग्रैंड विजन’ अधूरा रह गया।

यदि पटेल प्रधानमंत्री होते…

15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि एक ऐसी व्यावहारिक और राष्ट्र-प्रथम कार्यशैली का अंत था जिसमें ‘तुष्टिकरण’ के लिए कोई जगह नहीं थी। आज जब हम 21वीं सदी के भारत में आंतरिक सुरक्षा, सीमा विवादों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर बात करते हैं, तो पटेल के विचार सबसे अधिक प्रासंगिक लगते हैं। सरदार पटेल को ‘भारत रत्न’ भले ही दशकों बाद मिला, लेकिन वे हमेशा से भारत के हृदय रत्न रहे हैं और रहेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 1946 में बहुमत होने के बावजूद सरदार पटेल प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने?
1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में 15 में से 12 प्रांतीय समितियों ने पटेल का समर्थन किया था। परंतु, महात्मा गांधी के हस्तक्षेप और उनके प्रति अपनी अटूट निष्ठा के कारण, पटेल ने स्वेच्छा से अपना नामांकन वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
2. 1947 में दिल्ली में सरदार पटेल ने कौन सा बड़ा संकट टाला था?
सितंबर 1947 में दिल्ली में भारी मात्रा में हथियार जमा कर सरकार का तख्तापलट करने की गुप्त साजिश रची गई थी। संघ के कार्यकर्ताओं की सूचना पर पटेल ने पुलिस और सेना की मदद से 10 सितंबर को सघन छापेमारी की और राजधानी को गृहयुद्ध की आग में जलने से बचा लिया।
3. कश्मीर के विलय में माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) की क्या भूमिका थी?
जब महाराजा हरि सिंह विलय के लिए अनिच्छुक थे, तब सरदार पटेल के विशेष आग्रह पर श्री गुरुजी ने 17 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर जाकर महाराजा से मुलाकात की। उन्होंने महाराजा को पाकिस्तान के इरादों से अवगत कराया और पटेल की ओर से सुरक्षा का आश्वासन देकर उन्हें भारत के पक्ष में मोड़ा।
4. क्या सरदार पटेल आरएसएस को कांग्रेस में शामिल करना चाहते थे?
हां, सरदार पटेल का मानना था कि आरएसएस के अनुशासित स्वयंसेवकों की ऊर्जा का उपयोग राष्ट्र निर्माण में होना चाहिए। 1949 में उनके प्रयास से कांग्रेस ने आरएसएस सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव भी पारित किया था, जिसे बाद में जवाहरलाल नेहरू के कड़े विरोध के कारण वापस ले लिया गया।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, तत्कालीन राजनेताओं के संस्मरणों, पत्रों और ऐतिहासिक विश्लेषणों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि इतिहास के उन महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाना है जिन पर सार्वजनिक विमर्श में कम चर्चा की जाती है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।