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जब छत्रपति ने शत्रु की पुत्रवधू में देखी अपनी माँ: राष्ट्रवाद और नैतिकता का वह अनकहा अध्याय

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
9 Min Read
नई दिल्ली | 
17वीं शताब्दी का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा था, जहाँ एक ओर सदियों पुरानी समृद्ध सभ्यता थी और दूसरी ओर उसे समूल नष्ट करने पर उतारू मजहबी कट्टरता। उत्तर से दक्षिण तक, औरंगजेब और दक्कन की सल्तनतों के शासनकाल में भारतीय जनता दमन और उत्पीड़न से जूझ रही थी। काशी विश्वनाथ, मथुरा के केशवदेव और सोमनाथ जैसे हजारों पवित्र मंदिरों का विध्वंस, 1679 का अपमानजनक ‘जजिया कर’, और महिलाओं की मर्यादा पर लगातार होते प्रहारों ने जनमानस को निराशा के अंधकार में धकेल दिया था।
ऐसी हताशा के बीच सह्याद्रि की कंदराओं से एक सिंहगर्जना गूँजी— ‘हिन्दवी स्वराज्य’। यह केवल सत्ता परिवर्तन का नारा नहीं, बल्कि आत्म-विस्मृति में सोए हुए राष्ट्र का सांस्कृतिक पुनर्जागरण था।

17वीं शताब्दी का भारत और दमन का स्वरूप

मुगल और सल्तनत काल में हिंदुओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाने के लिए प्रशासनिक, धार्मिक और सामाजिक स्तर पर सुनियोजित प्रयास किए गए।
  • जजिया एवं तीर्थयात्रा कर: गैर-मुस्लिमों को अपनी ही पावन धरती पर धार्मिक अनुष्ठान करने और सांस लेने के लिए अपमानजनक कर चुकाने पड़ते थे।
  • धार्मिक व सांस्कृतिक आघात: आस्था के केंद्रों को ध्वस्त कर उनकी मूर्तियों को अपमानित किया गया, सार्वजनिक रूप से होली और दिवाली मनाने पर पाबंदी लगा दी गई।
  • असुरक्षित महिला सुरक्षा: शादी-ब्याह के मंडपों से कन्याओं का अपहरण और उन्हें हरम में डाल देना उस दौर की सबसे पीड़ादायक सच्चाई बन चुकी थी।

नारी सम्मान और नैतिकता का नया मापदंड

छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिद्ध किया कि सेना का बल केवल शस्त्रों में नहीं, बल्कि चरित्र और धर्म में निहित होता है।

1. रांझा के पाटिल को ‘चौरंग’ दंड

जब शिवाजी महाराज के अपने ही पाटिल बाबाजी गुजर ने एक विधवा स्त्री पर दुराचार किया, तो महाराज ने कठोर न्याय देते हुए उसके दोनों हाथ और पैर काटने (‘चौरंग’) का आदेश दिया। इससे यह कड़ा संदेश गया कि स्वराज्य में स्त्री-अपमान का केवल एक ही दंड है।

2. कल्याण के सूबेदार की बहू का प्रसंग

1657-58 में जब सेनापति आबाजी सोनदेव ने कल्याण के सूबेदार को हराकर उसकी अत्यंत सुंदर बहु को उपहार स्वरूप शिवाजी के समक्ष प्रस्तुत किया, तो महाराज ने सम्मान से झुककर कहा:
“अशाच अमुची आई असती सुंदर रूपवती, आम्ही ही सुंदर झालो असतो…”
(अर्थात: यदि हमारी माँ भी इतनी ही सुंदर होतीं, तो हम भी उतने ही सुंदर होते।)
महाराज ने उस महिला को ससम्मान साड़ी-चोली भेंट की और सुरक्षित उनके परिवार के पास वापस भिजवा दिया। यह उस दौर की बर्बर हरम-संस्कृति पर नैतिकता का सबसे बड़ा तमाचा था।

रायरेश्वर की शपथ और ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की नींव

वर्ष 1645 (वैशाख की सप्तमी) को मात्र 15-16 वर्ष की आयु में शिवाजी महाराज ने पुणे के भोर स्थित रायरेश्वर महादेव मंदिर में अपने निष्ठावान मावला साथियों के साथ अपनी उंगली काटकर शिवलिंग पर रक्त अर्पित किया और प्रतिज्ञा ली:
“यह राज्य मेरा या आपका नहीं, यह ‘हिन्दवी स्वराज्य’ होगा और यह ईश्वर की इच्छा है।”
राजमाता जिजाऊ के दिए रामायण और महाभारत के संस्कारों तथा शाहजी राजे के मार्गदर्शन में उन्होंने सह्याद्रि के साधारण किसानों और चरवाहों (मावलों) को संगठित कर एक ऐसी अभेद्य लोकशक्ति खड़ी की, जिसने विशाल सल्तनतों की नींव हिला दी।

संस्कृत राजमुद्रा का उद्घोष

फारसी के प्रभुत्व को सीधी चुनौती देते हुए शिवाजी महाराज ने अपनी आधिकारिक संस्कृत राजमुद्रा जारी की:
“प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता। शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते॥”
(अर्थ: प्रतिपदा के चंद्रमा की तरह बढ़ने वाली और पूरे विश्व द्वारा वंदनीय, शाहजी के पुत्र शिवाजी की यह मुद्रा लोक-कल्याण के लिए सुशोभित है।)

प्रमुख युद्ध विजय: गनिमी कावा (छापामार नीति) का पराक्रम

  1. अफजल खान का वध (1659): मंदिरों को तोड़ने और आतंक फैलाने आए बीजापुर के विशालकाय सेनापति अफजल खान का प्रतापगढ़ की तलहटी में ‘बघनख’ (Tiger Claws) से पेट फाड़कर अंत किया।
  2. शाइस्ता खान की फजीहत (1663): औरंगजेब के मामा शाइस्ता खान के डेढ़ लाख सैनिकों के बीच रात में लाल महल में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की, जिसमें उसकी उंगलियाँ कट गईं और उसे भागना पड़ा।
  3. सूरत अभियान एवं आगरा से पलायन (1664-1666): मुगलों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए सूरत का खजाना प्राप्त किया और आगरा में औरंगजेब की कैद से फलों की टोकरियों में छिपकर निकलने की ऐतिहासिक रणनीति बनाई।
  4. सिंहगढ़ का युद्ध (1670): तानाजी मालुसरे के अद्वितीय बलिदान से कोन्ढाणा किला जीता और महाराज ने कहा— “गढ़ आला पण सिंह गेला” (गढ़ तो आया, पर सिंह चला गया)।

प्रशासनिक सुधार और सुशासन

छत्रपति शिवाजी केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि दूरदर्शी प्रशासक थे:
  • अष्टप्रधान मंडल: शासन के कुशल संचालन के लिए 8 मंत्रियों की परिषद बनाई (पेशवा, अमात्य, सचिव, मंत्री, सेनापति, सुमंत, न्यायाधीश, पंडितराव)।
  • राजव्यवहार कोष: अरबी-फारसी शब्दों का प्रभाव खत्म करने के लिए संस्कृत आधारित प्रशासनिक शब्दावली विकसित की।
  • भारतीय नौसेना के जनक (Father of Indian Navy): पुर्तगालियों और सिद्दियों के समुद्री खतरों से निपटने के लिए कोंकण तट पर सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग और खांदेरी जैसे जलदुर्गों का निर्माण करवाया।
  • रैयतवारी राजस्व व्यवस्था: जमींदारों-जागीरदारों की मध्यस्थता खत्म कर सीधे किसानों से संपर्क साधा। आपदा के समय लगान माफी और कर्ज की व्यवस्था की।

धर्मोद्धार और ‘घर वापसी’ (शुद्धिकरण)

महाराज ने धार्मिक कट्टरता के सामने न झुकते हुए समाज में आत्मविश्वास की पुनर्गठन लहर चलाई:
  1. रूढ़ियों को तोड़ा: औरंगजेब द्वारा जबरन धर्मांतरित किए गए अपने सेनापति नेताजी पालकर और रिश्तेदार बजाजी निंबालकर का वैदिक रीति से शुद्धिकरण करवाकर उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में सम्मानपूर्वक शामिल किया।
  2. मंदिरों का जीर्णोद्धार: गोवा के प्राचीन सप्तकोटेश्वर मंदिर सहित कई क्षतिग्रस्त देवस्थानों का पुनर्निर्माण कराया और नियमित पूजा-अर्चन हेतु आर्थिक अनुदान दिया।
  3. गौ-रक्षा एवं विद्वानों का संरक्षण: स्वराज्य में गौ-वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और काशी के गागा भट्ट जैसे प्रकांड विद्वानों को आमंत्रित कर 1674 में विधिवत छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक करवाया।

निष्कर्ष: राष्ट्र का अमर प्रकाशपुंज

छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन सुशासन, सर्वधर्म-समभाव, नारी-सम्मान और राष्ट्रीय स्वाभिमान का जीवंत दर्शन है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में शून्य से सृष्टि का सृजन कर आने वाली पीढ़ियों को ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वराज’ का वास्तविक अर्थ सिखाया। आज भी उनका चरित्र अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले हर नागरिक के लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का अर्थ एक ऐसे स्वतंत्र शासन से है, जहाँ इस भूमि से जुड़ी संस्कृति, धर्म और नागरिकों का सम्मान सुरक्षित रहे और कोई विदेशी आक्रांता उनकी मर्यादा पर प्रहार न कर सके।
Q2. छत्रपति शिवाजी महाराज ने रायरेश्वर मंदिर में क्या प्रतिज्ञा ली थी?
उत्तर: वर्ष 1645 में 15-16 वर्ष की आयु में शिवाजी महाराज ने रायरेश्वर महादेव मंदिर में अपनी उंगली का रक्त चढ़ाकर ‘हिन्दवी स्वराज्य’ स्थापित करने की ऐतिहासिक शपथ ली थी।
Q3. शिवाजी महाराज को ‘भारतीय नौसेना का जनक’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: उन्होंने 17वीं शताब्दी में समुद्री सीमाओं की रक्षा के महत्व को समझा और पुर्तगालियों, डच एवं सिद्दियों से रक्षा हेतु अपनी स्वदेशी नौसेना और सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग जैसे जलदुर्गों की स्थापना की।
Q4. अष्टप्रधान मंडल क्या था?
उत्तर: यह शिवाजी महाराज द्वारा गठित 8 मंत्रियों की एक प्रशासनिक परिषद थी, जिसमें पेशवा (प्रधान), अमात्य (वित्त), सेनापति, न्यायाधीश आदि विभाग सुशासन सुनिश्चित करने के लिए बांटे गए थे।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह आलेख 17वीं शताब्दी के भारत, छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन, उनके युद्ध अभियानों और प्रशासनिक कार्यों के ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी जाति, धर्म या समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और सुशासन के सिद्धांतों का निष्पक्ष प्रस्तुतीकरण करना है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।