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क्या अविमुक्तेश्वरानंद ‘शंकराचार्य’ नहीं हैं? प्रयागराज प्रशासन के नोटिस और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरा सच

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प्रयागराज: संगम की रेती पर चल रहे माघ मेले में इस समय अध्यात्म से ज्यादा ‘अधिकारों’ की जंग तेज हो गई है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य कहे जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच विवाद ने अब कानूनी और राजनीतिक रूप ले लिया है। जहाँ एक ओर शंकराचार्य धरने पर बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन ने उनकी पदवी की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. ताजा विवाद: प्रशासन का 24 घंटे का नोटिस

आज (20 जनवरी 2026) की सबसे बड़ी खबर यह है कि प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

  • नोटिस की मुख्य बात: प्रशासन ने उनसे पूछा है कि वे किस आधार पर खुद को ‘ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य’ बता रहे हैं?

  • सुप्रीम कोर्ट का हवाला: नोटिस में उच्चतम न्यायालय के उस आदेश का जिक्र है जिसमें उनके पट्टाभिषेक (Consecration) पर रोक लगाई गई थी। प्रशासन का कहना है कि मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है, ऐसे में वे इस पदवी का उपयोग आधिकारिक प्रोटोकॉल के लिए नहीं कर सकते।

2. मौनी अमावस्या पर क्या हुआ? (विवाद की जड़)

रविवार (18 जनवरी) को मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व पर विवाद तब शुरू हुआ जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पारंपरिक पालकी और रथ के साथ संगम स्नान के लिए निकल रहे थे।

  • पुलिस की कार्रवाई: भारी भीड़ (4.5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु) का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा।

  • धक्का-मुक्की और चोट: शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई। आरोप है कि पुलिस ने लाठीचार्ज किया जिससे कई शिष्य घायल हुए और शंकराचार्य का ‘छत्र’ भी टूट गया।

  • अनिश्चितकालीन धरना: अपमान का आरोप लगाते हुए उन्होंने संगम स्नान नहीं किया और त्रिवेणी मार्ग स्थित अपने शिविर के बाहर ही जमीन पर धरने पर बैठ गए। उन्होंने अन्न-जल त्यागने की घोषणा भी की है।

3. ‘मेला प्रशासन उन्हें शंकराचार्य नहीं मानता’

कमिश्नर और मेला अधिकारियों का रुख इस बार बेहद सख्त है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि:

  1. जमीन का आवंटन किसी ‘शंकराचार्य’ के नाम पर नहीं, बल्कि एक संस्था के नाम पर किया गया है।

  2. प्रशासन का दावा है कि उन्होंने 3 घंटे तक स्वामी जी से निवेदन किया, लेकिन उन्होंने सुरक्षा प्रोटोकॉल मानने से इनकार कर दिया।

  3. प्रशासन का तर्क है कि “आदि गुरु की परंपरा में कोई भी स्नान के लिए जिद नहीं करता।”

यह भी पढ़ें : अन्न-जल त्यागने के फैसले से पीछे हटे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, प्रशासन के नोटिस ने बढ़ाया विवाद

4. गरमाई सियासत: अखिलेश यादव की एंट्री

इस विवाद ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात कर उनका हालचाल जाना और प्रशासन के व्यवहार को “अशोभनीय” बताया। विपक्ष इसे सरकार की “संतों के प्रति असहिष्णुता” करार दे रहा है।

पृष्ठभूमि: ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का उत्तराधिकार

विवाद की शुरुआत तब हुई जब 11 सितंबर 2022 को द्वारका-शारदा पीठ और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हुआ। उन्होंने वसीयत के जरिए दो उत्तराधिकारियों की घोषणा की थी:

  • स्वामी सदानंद सरस्वती: द्वारका-शारदा पीठ के लिए।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती: ज्योतिष पीठ (बदरिकाश्रम) के लिए।

साल 2020-2022: हाईकोर्ट में लंबित विवाद

स्वामी स्वरूपानंद के जीवित रहते ही स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने ज्योतिष पीठ के पद पर अपना दावा ठोक रखा था।

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले ही एक आदेश में स्वामी वासुदेवानंद के दावे को खारिज कर दिया था, लेकिन उन्हें तब तक ‘छत्र-चंवर’ इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी जब तक नए शंकराचार्य का चयन शास्त्र सम्मत तरीके से न हो जाए।

अक्टूबर 2022: सुप्रीम कोर्ट का ‘स्टे’ (बड़ा मोड़)

स्वामी स्वरूपानंद के निधन के तुरंत बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक (राज्याभिषेक) की तैयारी शुरू हुई।

  • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: अक्टूबर 2022 में, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की पीठ ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक समारोह पर अंतिम रोक (Stay) लगा दी। हालंकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शंकराचार्य लिखने से मना नहीं किया है।

  • कोर्ट का तर्क: अदालत ने कहा कि जब तक ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद का मुख्य विवाद सुलझ नहीं जाता, तब तक नया पट्टाभिषेक नहीं किया जा सकता।

साल 2023: ‘शंकराचार्य’ शब्द के इस्तेमाल पर बहस

पूरे 2023 के दौरान मामला सुप्रीम कोर्ट में चलता रहा। विपक्षी पक्ष (स्वामी वासुदेवानंद) ने तर्क दिया कि अविमुक्तेश्वरानंद खुद को ‘शंकराचार्य’ लिखकर कोर्ट की अवमानना कर रहे हैं।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकीलों का कहना था कि यह एक धार्मिक पदवी है जो वसीयत और परंपरा से मिली है, न कि कोई सरकारी पद।

साल 2024: कानूनी स्थिति और मौजूदा संकट

साल 2024 के अंत तक, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को वृहद पीठ (Larger Bench) को भेजने या इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने आदेशों की समीक्षा करने की बात कही।

  • वर्तमान कानूनी स्थिति: तकनीकी रूप से, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ‘शंकराचार्य’ पद पर अभिषेक को अदालत ने अभी तक मान्यता नहीं दी है। इसी कानूनी पेच के करण प्रयागराज मेला प्रशासन उन्हें ‘शंकराचार्य’ के रूप में प्रोटोकॉल देने से इनकार कर रहा है।

विवाद का मुख्य बिंदु (Summary Table)

पक्ष मुख्य तर्क
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत और कुछ साधु उन्हें वैध शंकराचार्य बनाता है।
प्रशासन/विपक्षी सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक पर रोक लगाई है, इसलिए वे आधिकारिक तौर पर ‘शंकराचार्य’ नहीं कहला सकते।
शास्त्र सम्मत मत कुछ विद्वानों का मानना है कि चारों पीठों के शंकराचार्यों की सहमति के बिना चयन अधूरा है।

यह केवल एक जमीन या सुविधा का विवाद नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की सर्वोच्च गद्दी की वैधता की लड़ाई है। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम फैसला नहीं सुनाता, प्रयागराज जैसे आयोजनों में इस तरह के टकराव देखने को मिलते रहेंगे।

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