मुंबई. भारतीय रुपये में आ रही ऐतिहासिक गिरावट ने अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। 20 जनवरी 2026 को डॉलर के मुकाबले रुपया ₹91.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पैसे निकालने (FII Outflow) के कारण रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। मंगलवार सुबह शुरुआती कारोबार में रुपया $90.98$ से गिरकर $91.01$ प्रति डॉलर तक जा लुढ़का।
1. आम आदमी की जेब पर सीधा असर: क्यों महंगी होगी आपकी ‘थाली’?
रुपये के कमजोर होने का मतलब है कि भारत को विदेशों से सामान मंगाने के लिए अब ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे।
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महंगा ईंधन: भारत अपनी जरूरत का 80% कच्चा तेल आयात करता है। डॉलर महंगा होने से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे, जिसका सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ेगा। नतीजा—सब्जी, दूध और किराना सामान महंगा हो जाएगा।
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इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल: स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स के पुर्जे विदेशों से आते हैं। रुपया गिरने से इनकी कीमतों में 5-10% की बढ़ोतरी हो सकती है।
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विदेश यात्रा और शिक्षा: अगर आपका बच्चा विदेश में पढ़ रहा है या आप विदेश घूमने की योजना बना रहे हैं, तो अब आपको कॉलेज फीस और टिकट के लिए ज्यादा रुपये चुकाने होंगे।
2. आयात-निर्यात (Trade) पर असर: किसे नफा, किसे नुकसान?
| सेक्टर | असर | कारण |
| आईटी (IT) और फार्मा | फायदा | इन कंपनियों की कमाई डॉलर में होती है, इसलिए रुपया गिरने से इनका मुनाफा बढ़ेगा। |
| निर्यात (Textiles/Agro) | फायदा | भारतीय सामान विदेशी बाजार में सस्ता और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। |
| तेल और गैस | नुकसान | आयात बिल बढ़ने से व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ेगा। |
| ऑटोमोबाइल | नुकसान | आयातित कलपुर्जों की लागत बढ़ने से गाड़ियां महंगी होंगी। |
3. विशेषज्ञों की राय और सरकार का कदम
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की नई व्यापार नीतियों (जैसे ग्रीनलैंड/टैरिफ विवाद) ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा की है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है, जिसका उपयोग वह रुपये की गिरावट को थामने के लिए कर सकता है।
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