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अक्षय तृतीया का अद्भुत रहस्य: जब हजारों साल बाद एक साथ ‘परम उच्च’ होते हैं सूर्य और चंद्रमा

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नई दिल्ली | सोमवार, 20 अप्रैल 2026

Akshaya Tritiya Rare Planetary Alignment: हिंदू धर्म और भारतीय ज्योतिष में अक्षय तृतीया का दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों में वर्णित ‘वास्तविक’ अक्षय तृतीया वैसी नहीं है जैसी हम हर साल मनाते हैं? ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, एक ऐसा अत्यंत दुर्लभ संयोग है जो हजारों वर्षों में केवल एक बार घटित होता है, जब सूर्य और चंद्रमा अपनी ‘परम उच्च’ अवस्था में होते हैं।

क्या है अक्षय तृतीया का ‘परम उच्च’ गणित?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अक्षय तृतीया का पूर्ण फल तब मिलता है जब वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि हो और आकाश मंडल में राजा और रानी (सूर्य और चंद्रमा) अपनी सर्वोच्च शक्ति के बिंदुओं पर हों।

  1. सूर्य का मेष राशि में 10 डिग्री पर होना: सूर्य मेष राशि में उच्च के होते हैं, लेकिन उनकी शक्ति का शिखर (Deep Exaltation) तब होता है जब वे सटीक 10 डिग्री पर पहुँचते हैं।

  2. चंद्रमा का वृष राशि में 3 डिग्री पर होना: चंद्रमा वृष राशि में उच्च के होते हैं, लेकिन उनकी पूर्ण शीतलता और शुभता 3 डिग्री पर ‘परम उच्च’ मानी जाती है।

हजारों सालों में एक बार आने वाला महायोग

विशेषज्ञों का मानना है कि तिथि (तृतीया) के साथ-साथ इन दोनों ग्रहों का इन सटीक अंशों (degrees) पर एक साथ मिलना गणितीय रूप से एक असाधारण घटना है। आमतौर पर हर साल सूर्य मेष में और चंद्रमा वृष में तो होते हैं, लेकिन उनका इन विशिष्ट डिग्री पर एक साथ होना ‘युगादि’ (युगों के आरंभ) जैसा प्रभाव पैदा करता है।

“शास्त्रों के अनुसार, इसी परम दुर्लभ स्थिति में सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। जब ब्रह्मांड के दो सबसे महत्वपूर्ण ग्रह अपनी उच्चतम क्षमता पर होते हैं, तो उस समय किया गया कोई भी कार्य वास्तव में ‘अक्षय’ हो जाता है।”

इस स्थिति का महत्व क्यों है?

  • आध्यात्मिक ऊर्जा: इस योग में साधना करने से आध्यात्मिक सिद्धियां शीघ्र प्राप्त होती हैं।

  • अक्षय फल: इस विशेष क्षण में दान, तप और खरीदारी का फल कभी समाप्त नहीं होता।

  • दुर्लभता: यह संयोग केवल एक कैलेंडर तिथि नहीं, बल्कि एक दिव्य खगोलीय घटना है।

आम अक्षय तृतीया से कितनी अलग?

सामान्यतः, हम वैशाख शुक्ल तृतीया को ही अक्षय तृतीया मान लेते हैं क्योंकि सूर्य और चंद्रमा अपनी उच्च राशियों में गोचर कर रहे होते हैं। हालांकि, ‘परम उच्च’ अंशों का मिलना एक सूक्ष्म गणना है। आधुनिक काल में हम जिस अक्षय तृतीया को मनाते हैं, वह उस महान ऊर्जा का एक वार्षिक प्रतिनिधि स्वरूप है, जो हमें सकारात्मकता और समृद्धि का अवसर प्रदान करती है।

निष्कर्ष: यदि आप भी इस अक्षय तृतीया पर निवेश या शुभ कार्य की योजना बना रहे हैं, तो याद रखें कि यह केवल सोने की खरीदारी का दिन नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्तियों के मिलन का उत्सव है। ज्योतिषीय दृष्टि से ऐसी दुर्लभ स्थितियां हमें प्रकृति और काल (Time) की अनंत गहराई को समझने का मौका देती हैं।

साभार : ज्योतिषाचार्य श्याम जी शुक्ल

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।