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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ममता बनर्जी की याचिका अर्जेंट लिस्टिंग के लिए स्वीकार, तृणमूल कांग्रेस के नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न फ्रीज मामले में सुनवाई जल्द

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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कोलकाता । 
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए एक बड़े भूचाल के बीच देश की शीर्ष अदालत से ममता बनर्जी गुट को एक अहम राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ (Grass and Flowers) को फ्रीज करने के चुनाव आयोग (ECI) के अंतरिम फैसले को चुनौती देने वाली ममता बनर्जी की याचिका पर त्वरित सुनवाई (Urgent Listing) के लिए सहमति व्यक्त की है।

कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने रखा पक्ष

सोमवार, 21 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही शुरू होते ही वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष ममता बनर्जी की इस विशेष याचिका का उल्लेख किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने अदालत से गुहार लगाई कि आगामी उपचुनावों के बेहद करीब होने के कारण इस विषय पर तत्काल सुनवाई होना अति आवश्यक है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने सिब्बल की दलीलों को स्वीकार करते हुए मामले को जल्द से जल्द लिस्ट करने का आश्वासन दिया।

आखिर क्या है पूरा विवाद?

तृणमूल कांग्रेस के भीतर पिछले कुछ समय से दो गुटों के बीच पार्टी के मूल अस्तित्व, नाम और पहचान को लेकर खींचतान जारी है:
  • पार्टी में दो फाड़: एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला मुख्य धड़ा है, वहीं दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाला विद्रोही गुट पार्टी पर अपना दावा ठोक रहा है।
  • चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला: विवाद को देखते हुए चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत अंतिम फैसला आने तक मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और पारंपरिक प्रतीक ‘फूल और घास’ के इस्तेमाल पर दोनों पक्षों के लिए अंतरिम रोक (Freeze) लगा दी थी।
  • नये नाम और प्रतीक का आवंटन:
    • ममता बनर्जी गुट: आयोग ने इस गुट को नया नाम ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और चुनाव चिह्न ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player) आवंटित किया।
    • विरोधी (विद्रोही) गुट: विरोधी धड़े को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और चिह्न ‘लिफाफा’ (Envelope) दिया गया।

6 अक्टूबर के उपचुनाव पर असर

पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर महत्वपूर्ण उपचुनाव प्रस्तावित हैं। चुनाव आयोग की यह अंतरिम व्यवस्था इन्हीं चुनावों को ध्यान में रखते हुए लागू की गई थी।
ममता बनर्जी का तर्क है कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना और पहचान उनके दशकों के राजनीतिक संघर्ष से जुड़ी है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले पार्टी का मूल नाम और चिह्न फ्रीज करने से मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा होगा, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत है।

अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्जेंट लिस्टिंग की मांग स्वीकार करने का अर्थ केवल इतना है कि केस पर प्राथमिकता से सुनवाई होगी। इससे चुनाव आयोग के आदेश पर स्वतः कोई स्टे (Stay) नहीं लगा है।
आगामी सुनवाई में शीर्ष अदालत चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और विरोधी गुट का पक्ष सुनेगी, जिसके बाद ही मूल चिह्न की बहाली या अंतरिम राहत देने पर कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1. सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की याचिका पर क्या आदेश दिया है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने याचिका को खारिज न करते हुए अर्जेंट लिस्टिंग के लिए स्वीकार कर लिया है, यानी इस पर जल्द ही विस्तृत सुनवाई की जाएगी।
Q2. चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस को कौन सा नया चुनाव चिह्न दिया है?
उत्तर: आयोग ने ममता बनर्जी के गुट को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player) तथा विरोधी धड़े को ‘लिफाफा’ (Envelope) चिह्न आवंटित किया है।
Q3. पश्चिम बंगाल में उपचुनाव कब और किन सीटों पर हैं?
उत्तर: 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने तय हैं।

Disclaimer (अस्वीकरण)

यह लेख मुख्य रूप से समसामयिक राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रमों पर आधारित विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। कानूनी प्रक्रियाएं अदालत के आगामी फैसलों और आधिकारिक चुनाव आयोग अधिसूचनाओं के अधीन हैं।

संबंधित रिपोर्ट और विस्तृत कवरेज के लिए पढ़ें:

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।