वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) 2026 की बैठक में ग्रीनलैंड और वैश्विक व्यापार को लेकर दो बड़े और चौंकाने वाले ऐलान किए हैं। इन फैसलों ने न केवल यूरोप बल्कि भारत जैसे बड़े निर्यातक देशों के लिए भी नई संभावनाएं और चुनौतियां पेश की हैं।
यहाँ इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:
1. ग्रीनलैंड डील और ‘फ्रेमवर्क’ का ऐलान
ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका और नाटो (NATO) के बीच ग्रीनलैंड को लेकर एक “भविष्य के समझौते की रूपरेखा” (Framework) तैयार हो गई है।
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सैन्य बल का प्रयोग नहीं: ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, “मैं बल प्रयोग नहीं करना चाहता, अमेरिका बस ग्रीनलैंड नाम की एक जगह मांग रहा है।”
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सुरक्षा और खनिज: इस समझौते का मुख्य उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा को मजबूत करना और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। साथ ही, ग्रीनलैंड के प्रचुर खनिज संसाधनों पर नियंत्रण भी अमेरिका की प्राथमिकता है।
2. यूरोपीय देशों पर टैरिफ न लगाने का फैसला
ग्रीनलैंड सौदे पर हुई सकारात्मक प्रगति के बाद ट्रंप ने यूरोप के खिलाफ अपना ‘टैरिफ युद्ध’ फिलहाल टाल दिया है।
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टैरिफ वापस लिए: डेनमार्क, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी समेत 8 यूरोपीय देशों पर 1 फरवरी 2026 से लागू होने वाला 10% से 25% तक का अतिरिक्त टैरिफ अब नहीं लगाया जाएगा।
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बाजार में राहत: इस घोषणा के बाद वैश्विक शेयर बाजारों और विशेषकर यूरोपीय बाजारों में भारी उछाल देखा गया है।
3. भारत के निर्यात पर असर (Impact on Indian Exports)
ट्रंप की इस “यूरोप-फर्स्ट” राहत का भारत के निर्यात पर मिला-जुला असर पड़ने की संभावना है:
सकारात्मक प्रभाव:
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वैश्विक मांग में स्थिरता: यूरोप पर टैरिफ न लगने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता आएगी। यदि यूरोप की अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है, तो भारतीय सामानों (विशेषकर टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग गुड्स) की मांग बनी रहेगी।
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चीन-प्लस-वन रणनीति: यदि अमेरिका यूरोप को राहत दे रहा है लेकिन चीन पर सख्ती बरकरार रखता है, तो भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में जगह बनाने का बड़ा मौका होगा।
नकारात्मक और चुनौतीपूर्ण प्रभाव:
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कठोर प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय देशों को टैरिफ से राहत मिलने का मतलब है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों को अब यूरोपीय उत्पादों से कड़ी कीमत-प्रतिस्पर्धा (Price Competition) का सामना करना पड़ेगा।
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भारत पर ‘टैरिफ हंटर’ की नजर: ट्रंप प्रशासन पहले ही भारतीय उत्पादों पर 50% तक के ऊंचे टैरिफ लगा चुका है (रूस से तेल खरीदने और व्यापार असंतुलन के नाम पर)। यूरोप को राहत मिलने के बाद अब अमेरिका का पूरा ध्यान भारत जैसे अन्य व्यापारिक साझेदारों पर केंद्रित हो सकता है ताकि उन पर टैरिफ कम करने का दबाव बनाया जा सके।
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MSME क्षेत्र को झटका: भारत के रत्न-आभूषण (Gems & Jewellery) और चमड़ा उद्योग जो पहले से ही अमेरिकी टैरिफ से जूझ रहे हैं, उन्हें बजट 2026 में सरकार से विशेष राहत की उम्मीद है।
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