वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में शांति और पुनर्निर्माण के लिए गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) इस समय वैश्विक कूटनीति का केंद्र बना हुआ है। 22 जनवरी 2026 को स्विट्जरलैंड के दावोस (World Economic Forum) में इस बोर्ड के चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें पाकिस्तान की मौजूदगी और इजरायल की आपत्तियों ने भारत के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर दी है।
ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: एक नया वैश्विक सत्ता केंद्र?
डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र (UN) को दरकिनार कर एक समानांतर व्यवस्था के रूप में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की नींव रखी है।
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उद्देश्य: गाजा का शासन चलाना, वहां पुनर्निर्माण करना और हमास का निशस्त्रीकरण सुनिश्चित करना।
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संरचना: ट्रंप इसके अध्यक्ष हैं। इसमें अमेरिका के अलावा इजरायल, मिस्र, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों को शामिल किया गया है।
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विवाद: इस बोर्ड में शामिल होने के लिए 1 अरब डॉलर की ‘मेंबरशिप फीस’ और ट्रंप के व्यक्तिगत नियंत्रण को लेकर कई यूरोपीय देशों ने दूरी बनाई है।
पाकिस्तान की एंट्री और इजरायल का कड़ा विरोध
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावोस में इस चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिसे पाकिस्तान अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है। लेकिन इस पर इजरायल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है:
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इजरायल की आपत्ति: इजरायल का मानना है कि पाकिस्तान के हमास और अन्य कट्टरपंथी संगठनों के साथ वैचारिक संबंध रहे हैं। ऐसे में गाजा के पुनर्निर्माण और सुरक्षा (ISF) में पाकिस्तान की भूमिका इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है।
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मजबूरी का सौदा: जानकारों के अनुसार, बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप के दबाव और UN के विकल्प के तौर पर इस बोर्ड को स्वीकार तो किया है, लेकिन वे पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की भूमिका से असहज हैं।
भारत के लिए धर्मसंकट: ‘झंझट’ या ‘अवसर’?
भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता मिला है, लेकिन भारत अब तक इससे दूर रहा है। भारत की चुप्पी के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:
1. पाकिस्तान के साथ मंच साझा करना
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे बोर्ड का हिस्सा बनना है जहाँ पाकिस्तान को ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश किया जा रहा है। भारत का मानना है कि जो देश खुद आतंकवाद का केंद्र है, वह गाजा में शांति कैसे ला सकता है?
2. संयुक्त राष्ट्र की अनदेखी
भारत हमेशा से बहुपक्षीय संस्थानों (Multilateralism) और UN के चार्टर का समर्थक रहा है। ट्रंप की यह निजी ‘शांति सेना’ और बोर्ड UN की प्रासंगिकता को खत्म करने की कोशिश है, जिसे अपनाना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से कठिन है।
3. आर्थिक और कूटनीतिक जोखिम
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भारी निवेश: इस बोर्ड की सदस्यता के लिए भारी वित्तीय योगदान की मांग की गई है।
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बैलेंसिंग एक्ट: भारत के इजरायल और अरब देशों, दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं। इस बोर्ड में शामिल होने या न होने का असर इन द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।
क्या होगा भारत का अगला कदम?
फिलहाल भारत ‘इंतजार करो और देखो’ (Wait and Watch) की नीति अपना रहा है। जहाँ पाकिस्तान ट्रंप को खुश करने के लिए इस ‘झंझट’ में कूद पड़ा है, वहीं भारत अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को दांव पर नहीं लगाना चाहता।
विशेष टिप: यदि पाकिस्तान की सेना को गाजा में ‘शांति सेना’ के रूप में तैनात किया जाता है, तो यह भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से एक नई चिंता का विषय होगा क्योंकि इससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ सकती है।
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