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सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: कैंसर की ₹2,700 की दवा ₹27,000 में क्यों? जानिए PTR और MRP का पूरा खेल

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
8 Min Read

नई दिल्ली |

कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इलाज का खर्च किसी दुस्वप्न से कम नहीं होता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने देश में जीवनरक्षक दवाओं की वास्तविक लागत और उन पर छपी अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच के विशाल अंतर पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

अदालत के समक्ष एक याचिका की सुनवाइयों के दौरान ऐसा चौंकाने वाला उदाहरण प्रस्तुत किया गया, जिसने पूरे देश के फार्मास्युटिकल सेक्टर (Pharmaceutical Sector) की प्राइसिंग पॉलिसी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला? 10 गुना मुनाफे का गणित

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ के सामने एक कैंसर रोधी दवा (Anti-Cancer Drug) का उदाहरण रखा गया।

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  • Price to Retailer (PTR): वह कीमत जिस पर दवा निर्माता या डिस्ट्रीब्यूटर किसी केमिस्ट/रिटेलर को दवा उपलब्ध कराता है — ₹2,700
  • Maximum Retail Price (MRP): दवा के पैकेट पर छपा अधिकतम बिक्री मूल्य — ₹27,000

यानी रिटेलर को मिलने वाले मूल्य और आम जनता से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच सीधे 10 गुना (1000%) का अंतर देखा गया। अदालत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई परिवार अपने किसी प्रियजन की जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तब दवाओं के ऐसे बेतहाशा दाम उन्हें अपनी जमा-पूंजी, गहने और यहां तक कि घर-जमीन बेचने पर मजबूर कर देते हैं।

ध्यान दें: यह ₹2,700 बनाम ₹27,000 का आंकड़ा अदालत के समक्ष प्रस्तुत एक विशिष्ट उदाहरण था। इसे सभी कैंसर रोधी दवाओं की एक समान दर या शत-प्रतिशत दवाओं का नियम नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह गैर-नियंत्रित (Non-Scheduled) दवाओं के प्राइसिंग मार्जिन को दर्शाने वाली एक केस स्टडी है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए 4 मुख्य सवाल

  1. शुरुआती MRP का आधार क्या है? यदि निर्माता किसी दवा को ₹2,700 में बेचने के बाद भी लाभ कमा रहा है, तो उसकी MRP ₹27,000 तय करने की अनुमति किस आधार पर दी जाती है?
  2. गैर-शेड्यूल्ड दवाएं (Non-Scheduled Drugs): जो दवाएं राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) के अंतर्गत नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा नियंत्रित नहीं की जातीं, उनकी शुरुआती कीमतें तय करने में पारदर्शिता का अभाव क्यों है?
  3. सरकारी खजाने और आयुष्मान भारत पर बोझ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मरीज आयुष्मान भारत (PM-JAY) या अन्य केंद्र/राज्य स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज कराते हैं, तब इन अत्यधिक महंगी दवाओं का बिल अंततः सरकारी खजाने से ही चुकाया जाता है। यह सीधे तौर पर करदाताओं (Taxpayers) के पैसे का नुकसान है।
  4. जेनेरिक दवाओं की अनिवार्यता: डॉक्टरों द्वारा ब्रांडेड दवाओं के बजाय जेनेरिक दवाएं लिखने (Generic Prescriptions) और मेडिकल डिवाइसेज के दामों को नियंत्रित करने की व्यवस्था पर ठोस नियम क्यों लागू नहीं हो रहे?

 

केंद्र सरकार का पक्ष: जन औषधिऔर सस्ती दवाओं का प्रयास

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार आम नागरिकों तक सस्ती दवाएं पहुंचाने के लिए निरंतर कार्यरत है।

  • प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP): देश भर में खुले जन औषधि केंद्रों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं बाजार मूल्य से 50% से 90% तक कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।
  • भविष्य की रणनीति: सरकार ने संकेत दिए हैं कि गैर-शेड्यूल्ड दवाओं के शुरुआती मूल्य निर्धारण (Initial MRP capping) के नियमों में सुधार और नई मूल्य-नियंत्रण नीतियों पर विचार चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 29 सितंबर 2026 को तय की है, जिसमें केंद्र सरकार को मूल्य-नियंत्रण और जेनेरिक नीतियों पर ठोस जवाब या प्रस्ताव दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।

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आसान भाषा में समझें: PTR, MRP और दवा नियंत्रण शब्दावली

शब्दपूर्ण रूपसरल अर्थ / व्याख्या
PTRPrice to Retailerवह थोक दर जिस पर दवा कंपनी/स्टॉकिस्ट मेडिकल स्टोर (रिटेलर) को दवा बेचती है।
PTSPrice to Stockistवह दर जिस पर कंपनी अपने मुख्य स्टॉकिस्ट/डिस्ट्रीब्यूटर को दवा सप्लाई करती है।
MRPMaximum Retail Priceपैकेट पर अंकित अधिकतम मूल्य, जिससे अधिक पर रिटेलर ग्राहक से पैसे नहीं ले सकता।
Scheduled Drugsशेड्यूल्ड दवाएंNLEM सूची में शामिल दवाएं, जिनकी MRP पर NPPA का सीधा मूल्य-नियंत्रण होता है।
Non-Scheduledगैर-शेड्यूल्ड दवाएंवे दवाएं जो सीधी मूल्य नियंत्रण सूची में नहीं आतीं; कंपनियां सालाना 10% तक दाम बढ़ा सकती हैं, पर शुरुआती MRP पर कड़े नियम नहीं हैं।

मरीजों के लिए राहत की राह: जन औषधि केंद्र

यदि आप या आपके परिवार में कोई गंभीर बीमारी के इलाज से गुजर रहा है, तो ब्रांडेड दवाओं के भारी-भरकम बिल से बचने के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं:

  1. जेनेरिक विकल्प पूछें: अपने चिकित्सक से परामर्श लें कि क्या दवा का साल्ट (Salt/Composition) जेनेरिक रूप में उपलब्ध है।
  2. निकटतम जन औषधि केंद्र खोजें: अपने शहर के ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र’ से कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों की उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं बेहद कम दरों पर प्राप्त करें।

 

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की निष्पक्षता और किफायती दवाओं से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण रिपोर्ट पढ़ने के लिए Matribhumi Samachar पर विजिट करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. PTR और MRP के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों होता है?

उत्तर: शेड्यूल्ड (नियंत्रित) दवाओं में मार्जिन निश्चित होता है, लेकिन गैर-शेड्यूल्ड (Non-Scheduled) दवाओं के मामले में कंपनियां मार्केटिंग, रिसर्च और डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन के नाम पर अपनी इच्छानुसार शुरुआती MRP तय कर देती हैं। इसी खामी पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है।

Q2. कैंसर की दवाएं इतनी महंगी क्यों होती हैं?

उत्तर: दवा कंपनियों का दावा है कि कैंसर रोधी अनुसंधान (R&D) और क्लिनिकल ट्रायल्स में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। हालांकि, भारत में पेटेंट दवाओं के अलावा जेनेरिक साल्ट्स पर भी अत्यधिक मार्जिन वसूले जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

Q3. इस मामले की अगली सुनवाई कब है?

उत्तर: भारत के सुप्रीम कोर्ट में इस जनहित मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी सुनवाई और जनहित में जारी समाचार विवरणों पर आधारित एक सूचनात्मक रिपोर्ट है। इसमें दर्शाए गए ₹2,700 और ₹27,000 के आंकड़े केवल अदालत के समक्ष प्रस्तुत एक उदाहरण के रूप में हैं। किसी भी बीमारी या दवा के उपयोग से पहले हमेशा प्रमाणित डॉक्टर (Medical Professional) की सलाह लें।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।