नई दिल्ली।
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 14 अक्टूबर 2026 को एक ऐतिहासिक अध्याय जोड़ा गया। केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) ने IDBI बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की कुल 60.72% हिस्सेदारी फेयरफैक्स ग्रुप (Fairfax Group) की कनाडाई कंपनी को बेचकर 52,878 करोड़ रुपये जुटाने की मंजूरी दे दी।
यह सौदा भारतीय वित्तीय बाजार के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) है। जहां आलोचक इसे राष्ट्रीय संपत्ति को ‘फायर सेल’ (सस्ते दामों में बेचना) करार दे रहे हैं, वहीं वित्तीय आंकड़ों और नियामकीय सुधारों की रोशनी में यह सौदा एक घाटे में डूबे संस्थान को सफलतापूर्वक उबारकर बड़े मुनाफे में बदलने की अद्भुत कहानी है।
IDBI बैंक का इतिहास: विकास वित्तीय संस्थान (DFI) से कमर्शियल बैंक तक
1 जुलाई 1964 को स्थापित इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (IDBI) का मूल उद्देश्य आजाद भारत के औद्योगिक और बुनियादी ढांचा (Infrastructure) क्षेत्रों को दीर्घकालिक कर्ज देना था। 1976 में इसका नियंत्रण RBI से केंद्र सरकार को स्थानांतरित किया गया।
IDBI ने देश के कई प्रमुख वित्तीय संस्थानों की नींव रखी:
- EXIM बैंक (1982)
- SIDBI (1990)
- नेशनल स्टॉक एक्सचेंज – NSE (1992)
- NSDL (1996)
बैंकिंग क्षेत्र के बदलते स्वरूप को देखते हुए, वर्ष 2004 में इसे एक कमर्शियल बैंक (IDBI Ltd.) में बदल दिया गया और बाद में इसका विलय IDBI बैंक में कर दिया गया।
संकट से उबरने का सफर: 28% Bad Loans से रिकॉर्ड प्रॉफिट तक
इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को दिए गए भारी कर्ज और आर्थिक सुस्ती के कारण 2018 तक IDBI बैंक का ग्रॉस NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) 28% से अधिक (सितंबर 2018 में 31.78%) हो गया। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने मई 2017 में बैंक को Prompt Corrective Action (PCA) ढांचे के तहत ला दिया।
2019 में LIC ने 21,624 करोड़ रुपये का निवेश कर 51% हिस्सेदारी ली, जिसके बाद RBI ने इसे ‘प्राइवेट सेक्टर बैंक’ के रूप में वर्गीकृत किया। सरकार की 4R रणनीति (Recognition, Resolution, Recapitalisation, Reforms) के तहत मार्च 2026 तक बैंक की स्थिति में अभूतपूर्व सुधार दर्ज किया गया:
| प्रमुख वित्तीय संकेतक | संकट का दौर (2018) | सुधार के बाद (मार्च 2026) |
| ग्रॉस NPA (Bad Loans) | 31.78% | 2.32% |
| नेट NPA | 17.30% | 0.15% |
| कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CAR) | बेहद कमजोर | 26.65% |
| वार्षिक शुद्ध लाभ (Net Profit) | भारी घाटा | ₹9,513 करोड़ |
कैबिनेट मंजूरी के मुख्य बिंदु: क्या यह ‘फायर सेल’ है?
इस सौदे को केवल निजीकरण के बजाय रणनीतिक पुनर्गठन माना जा रहा है:
- प्रीमियम मूल्यांकन (Premium Valuation): फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की बोली, दो स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा तय 75.99 रुपये की न्यूनतम दर और तत्कालीन बाजार भाव 70.38 रुपये से काफी अधिक है।
- सरकार और LIC की हिस्सेदारी: इस सौदे के बाद भी सरकार (~15%) और LIC (~19%) मिलकर बैंक का लगभग एक-तिहाई हिस्सा (34%) अपने पास रखेंगे।
- कड़े नियामकीय नियम (RBI Regulations): खरीदार फेयरफैक्स के लिए 5 साल का लॉक-इन, 3 साल तक ब्रांड नाम IDBI बनाए रखना और 15 वर्षों में हिस्सेदारी घटाकर 26% (RBI प्रमोटर कैप) पर लाना अनिवार्य है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. IDBI बैंक में फेयरफैक्स कितनी हिस्सेदारी खरीद रहा है?
उत्तर: फेयरफैक्स ग्रुप (Fairfax Group) की सहायक कंपनी ‘10955230 कनाडा इंक’ कुल 60.72% हिस्सेदारी खरीद रही है, जिसमें सरकार की 30.48% और LIC की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है।
Q2. क्या सरकार IDBI बैंक से पूरी तरह बाहर हो गई है?
उत्तर: नहीं, सरकार के पास लगभग 15% और LIC के पास लगभग 19% हिस्सेदारी बनी रहेगी। दोनों संस्थाएं मिलकर अभी भी बैंक में लगभग 34% (एक-तिहाई) की शेयरधारक रहेंगी।
Q3. IDBI बैंक को PCA (Prompt Corrective Action) से कब बाहर निकाला गया?
उत्तर: RBI ने मार्च 2018 के भारी बैड लोन संकट के बाद बैंक में आए सुधारात्मक बदलावों को देखते हुए 10 मार्च 2021 को IDBI को PCA ढांचे से बाहर किया।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख केवल सूचनात्मक एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत आंकड़े और विवरण आधिकारिक कैबिनेट निर्णयों और बैंकिंग रिपोर्टों पर आधारित हैं। इसे किसी भी प्रकार की वित्तीय या निवेश सलाह के रूप में न देखा जाए।

