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अखंडता का यथार्थ: विभाजन और पाकिस्तान पर डॉ. आंबेडकर और सावरकर के अंतर्संबंध

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डॉ. बी.आर. आंबेडकर की पुस्तक थॉट्स ऑन पाकिस्तान का आवरण पृष्ठ का सांकेतिक चित्र

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में डॉ. बी.आर. आंबेडकर और विनायक दामोदर सावरकर को प्रायः दो विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा जाता है। जहाँ सावरकर ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्र’ के प्रणेता थे, वहीं आंबेडकर ‘संवैधानिक न्याय’ और ‘दलित चेतना’ के मसीहा। किंतु, जब हम 1940 के दशक के भारत और ‘पाकिस्तान’ के प्रश्न को देखते हैं, तो इन दोनों महापुरुषों के विचारों में एक ऐसी वैचारिक समानता उभरती है, जो तत्कालीन कांग्रेस की ‘तुष्टिकरण’ और ‘भावुक एकता’ की नीति से बिल्कुल अलग थी।

1. डॉ. आंबेडकर की ‘सर्जिकल’ दृष्टि: थॉट्स ऑन पाकिस्तान

डॉ. आंबेडकर ने 1940 में ‘Pakistan or the Partition of India’ पुस्तक लिखी। यह पुस्तक विभाजन के पक्ष या विपक्ष में कोई भावुक अपील नहीं थी, बल्कि एक सांख्यिकीय और राजनीतिक विश्लेषण था।

  • जनसंख्या की पूर्ण अदला-बदली: आंबेडकर का सबसे विवादास्पद और स्पष्ट विचार यह था कि यदि विभाजन होता है, तो वह ‘अधूरा’ नहीं होना चाहिए। उन्होंने तुर्की और ग्रीस का उदाहरण देते हुए कहा कि जनसंख्या की पूर्ण अदला-बदली (Transfer of Population) ही सांप्रदायिक दंगों का स्थायी समाधान है। उनका तर्क था कि सीमाओं के भीतर अल्पसंख्यकों की उपस्थिति भविष्य में गृहयुद्ध का कारण बनेगी।

  • सेना की सुरक्षा का प्रश्न: आंबेडकर ने चेतावनी दी कि अविभाजित भारत की सेना में मुसलमानों (विशेषकर पंजाब और उत्तर-पश्चिम के) का अनुपात उनकी जनसंख्या से कहीं अधिक है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि मुस्लिम लीग के प्रभाव में यह सेना रही, तो स्वतंत्र भारत कभी सुरक्षित नहीं रहेगा। अतः, भारत को अपनी रक्षा के लिए एक ‘सजातीय’ सेना की आवश्यकता है।

2. सावरकर का ‘दो राष्ट्र’ यथार्थवाद

सावरकर ‘अखंड भारत’ के प्रबल समर्थक थे, लेकिन वे राजनीति में यथार्थवाद (Realism) के पक्षधर थे।

  • राष्ट्र की परिभाषा: सावरकर ने 1937 के हिंदू महासभा के अधिवेशन में कहा था कि भारत में हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र (Nations) बन चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि यही बात मोहम्मद अली जिन्ना ने भी कही थी, लेकिन सावरकर का उद्देश्य हिंदुओं को इस खतरे के प्रति सचेत करना था कि एक ही भौगोलिक इकाई में दो परस्पर विरोधी संस्कृतियां संघर्ष की स्थिति में हैं।

  • तुष्टिकरण का विरोध: सावरकर का मानना था कि कांग्रेस द्वारा अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली विशेष रियायतें (Weightage) हिंदुओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हैं। वे ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ और ‘समान नागरिक अधिकार’ के पक्षधर थे, न कि विशेष सांप्रदायिक अधिकारों के।

3. वैचारिक समानताएं: जहाँ आंबेडकर और सावरकर एकमत थे

यद्यपि दोनों के अंतिम उद्देश्य भिन्न थे, किंतु विभाजन के संकट पर उनके निष्कर्ष आश्चर्यजनक रूप से समान थे:

अ. सामाजिक और सांस्कृतिक भिन्नता की स्वीकृति

दोनों नेताओं ने स्पष्ट रूप से माना कि हिंदू और मुस्लिम पहचान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से भिन्न दिशाओं में जा रही है। आंबेडकर ने इसे अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा कि इस्लाम का ‘भाईचारा’ केवल मुसलमानों तक सीमित है, जबकि सावरकर ने इसे ‘पवित्र भूमि’ (पुण्यभू) के सिद्धांत से जोड़ा।

ब. तुष्टिकरण की आलोचना

आंबेडकर ने मुस्लिम लीग की मांगों के आगे झुकने की कांग्रेस की नीति को “राजनीतिक फिरौती” (Political Ransom) कहा। सावरकर ने भी इसी विचार को दोहराते हुए कहा कि हिंदुओं के हितों की बलि देकर ली गई एकता स्थायी नहीं हो सकती।

स. राष्ट्रवाद और सैन्यीकरण

दोनों ही भारत की रक्षा क्षमता को लेकर चिंतित थे। सावरकर ने “हिंदुओं का सैन्यीकरण” करने का आह्वान किया, ताकि देश अपनी रक्षा स्वयं कर सके। आंबेडकर ने भी इसी तर्क पर पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार करना बेहतर समझा ताकि भारत की सेना के भीतर आंतरिक विद्रोह का खतरा समाप्त हो जाए।

4. जाति व्यवस्था: राष्ट्र निर्माण की साझा बाधा

एक और कम चर्चित समानता यह थी कि दोनों ने जाति व्यवस्था को भारत की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना।

  • सावरकर ने ‘सप्त-बंदी’ (भोजन, बेटी, व्यवसाय आदि पर प्रतिबंध) को तोड़कर हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास किया ताकि वे किसी भी आक्रमण का सामना कर सकें।

  • आंबेडकर ने ‘जाति के विनाश’ (Annihilation of Caste) को अनिवार्य बताया, क्योंकि उनके अनुसार जाति आधारित समाज कभी एक शक्तिशाली ‘राष्ट्र’ नहीं बन सकता।

इतिहास के पन्नों में डॉ. आंबेडकर और सावरकर को भले ही प्रतिद्वंद्वी दिखाया गया हो, लेकिन ‘पाकिस्तान’ और ‘विभाजन’ के मुद्दे पर दोनों ही कठोर यथार्थवादी थे। आंबेडकर ने तर्क और सुरक्षा के आधार पर विभाजन की अनिवार्यता को स्वीकार किया, जबकि सावरकर ने ‘दो राष्ट्र’ की सच्चाई को पहचानते हुए हिंदुओं को संगठित होने की चेतावनी दी। इन दोनों महापुरुषों का मानना था कि एक “कमजोर और विभाजित केंद्र” वाला अखंड भारत रहने से बेहतर है कि एक “मजबूत और संगठित भारत” बने।

सारांश कनौजिया, संपादक

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